July 25, 2026
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    'न हस्ताक्षर, न मुहर, ऐसे ही हो रहा अनुबंध', MP के किसान बोले- यही चलता रहा तो हम हो जाएंगे तबाह

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    होशंगाबाद / एजेंसी / पिछले दिनों मध्य प्रदेश और केन्द्र सरकार ने जोर-शोर से प्रचार किया था कि होशंगाबाद जिले के पिपरिया अनुमंडल में कैसे नया कृषि कानून किसानों के हितों की रखवाली करने वाला बनकर उभरा है और कैसे प्रशासन ने फौरन कार्रवाई करते हुए किसानों को नए कानून के तहत 24 घंटे के अंदर न्याय दिलाया? कैसे किसानों से अनुबंध के बावजूद फॉर्चून राईस लिमिटेड ने धान नहीं खरीदी तब एसडीएम कोर्ट ने नए कृषि कानून "किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) अनुबंध मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम 2020" (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अधिनियम) के प्रावधान के अनुसार कंपनी को खरीद के आदेश दिए? लेकिन क्या ये हकीकत है, क्या वाकई किसानों को न्याय मिला? अनुराग द्वारी की ग्राउंड रिपोर्ट से सरकारी दावों की हकीकत जानिए, उन्हीं किसानों की जुबानी, जिनके नाम पर ये प्रचार किया गया.
    भौंखेड़ी कलां के पुष्पराज सिंह, जिनकी शिकायत पर ही कार्रवाई हुई थी, ने 40 एकड़ में धान लगाया था... वैसे स्पष्ट कर दें कि ये कांग्रेस के पदाधिकारी रहे हैं. मुख्यमंत्री ने भी इनके नाम का जिक्र किया था. पुष्पराज का कहना है कि किसान उनके उदाहरण से सबक ले सकते हैं, वो कभी अनुबंध पर खेती की सलाह नहीं देंगे. वो अब नये कृषि कानूनों का विरोध करते हैं. सिंह ने कहा, "हम पिछले 4 साल से खेती कर रहे हैं लेकिन अनुबंध पर कभी दिक्कत नहीं आई. इस साल करार ये था कि मंडी का जो भी रेट होगा, उससे 50 रु. अधिक पर लेंगे. जब रेट 2300-2400 रुयपे था, तब दिक्कत नहीं थी. जैसे ही 2950 रेट निकला वैसे ही 3000 पर खरीदी करना था लेकिन फॉर्चून के अलावा जितनी कंपनियां थीं, सबके फोन बंद हो गये.
    पुष्पराज ने कहा, "मुख्यमंत्री शिवराज जी जो कह रहे हैं कि न्याय दिलाया, न्याय की बात तो तब आती जब कंपनी ने बेईमानी की होती या वो हमारी गिरफ्त से भाग गई होती तो किससे न्याय दिलाया? हमारा जो बिल है वो अन्नपूर्णा ट्रेडर्स के नाम पर है लेकिन इस पर ना तो बिल नंबर है, ना टिन नंबर. इसमें सबसे बड़ा नुकसान ये भी है कि वो दवा की जो किट देते हैं, वो भी लेना है चाहे उसकी ज़रूरत हो या नहीं हो. इधर ज्यादा दे रहे हो, उधर दवा के माध्यम से ज्यादा वसूल भी रहे हो." पुष्पराज ने कहा कि सरकार कह रही है कि किसान कहीं भी माल ले जाकर बेच सकते हैं लेकिन जब 200 क्विंटल धान पैदावार हुई तो क्या हम उसे बेचने केरल जाएंगे. उन्होंने कहा कि छोटे किसान अनुंबध की खेती में बर्बाद हो जाएंगे, पंजाब में आंदोलन चल रहा है इसलिये घबराहट में शिवराज जी ट्वीट कर रहे हैं.
    गाड़ाघाट के ब्रजेश पटेल, इन्होंने भी फॉर्चून कंपनी से अनुबंध किया था. 20 एकड़ में धान लगाया था, अब अपने खलिहान में रखने को मजबूर हैं. कंपनी ने धान उठाने से मना कर दिया ये कहकर कि धान में हैक्सा ( एक किस्म के कीटनाशक) की मात्रा आ गई है. 2 बार लैब टेस्ट करवाया लेकिन एक बार भी रिपोर्ट नहीं दी. आरोप है इस बार रिपोर्ट देने के बदले 8000 रुपये मांग रहे हैं. ब्रजेश का कहना है कि कंपनी बहाने बना रही है, अब कभी अनुबंध नहीं करेंगे. ये पूसा-वन क्वॉलिटी का धान उगाते हैं, अब कह रहे हैं मंडी में ही बेचेंगे, मंडी में आश्वासन रहता है.
    पटेल ने कहा कि जो अनुबंध मिला वो एक पन्ने का है, जिसमें कंपनी का कोई सील-हस्ताक्षर नहीं हैं, जिस दुकान से दवा-खाद लेते हैं उसका नाम है लेकिन हस्ताक्षर उसके भी नहीं. उन्होंने कहा कि कंपनी का कोई प्रतिनिधि बात भी नहीं करता. पटेल ने कहा कि अनुबंध का फायदा ये होता कि हमें उपज मंडी नहीं ले जाना पड़ता लेकिन अब ये ठग रहे हैं. हालांकि, पिछली बार धान का रेट कम था तो फायदा हुआ था. नए कानून के बाद ये देखने को मिल रहा है कि उसका कोई फायदा नहीं, अब धोखाधड़ी हो रही है. जब बड़े पैमाने पर कानून लागू होगा तो बहुत नुकसान होगा.
    इसी गांव के किसान घनश्याम पटेल ने दूसरी कंपनी वीटी के साथ अनुबंध किया. इनका धान भी कंपनी ने रिजेक्ट कर दिया है. अनुबंध के नाम पर एक पन्ने के भी कागज नहीं है. कहते हैं ये खाद, दवा, कीटनाशक की पर्ची ही इनके लिये अनुबंध का सर्टिफिकेट था, अब कहते हैं मंडी में ही धान बेचेंगे. घनश्याम ने कहा कि कंपनी वालों ने कोई कागज नहीं दिया, आधार कार्ड की फोटोकॉपी ली थी. वीटी वालों के एजेंट आते हैं. पिछले साल फॉर्चून से अनुबंध किया था. कोई कागज़ नहीं है हमारे पास शिकायत करने के लिये. मोदीजी से कह रहे हैं कि अगर मंडियां खुली रहेंगी तो वहां बेच लेंगे, लेकिन कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग आया तो हम जैसे किसान बर्बाद हो जाएंगे, जब पिपरिया वाले हमारे साथ ऐसा कर रहे हैं तो बाहर वालों पर तो हमें कोई भरोसा नहीं है.

    गाड़ाघाट के कई किसानों की व्यथा एक जैसी है, कुछ का धान खरीदा गया है, कुछ का नहीं. किसान कहते हैं दो तीन साल से दाम चढ़े नहीं थे तो खरीद में कोई दिक्कत नहीं थी. इस साल जैसे ही 2950 का रेट मंडी में गया, कंपनी के प्रतिनिधियों ने फोन बंद कर दिया. ऐसे कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से अब वो तौबा करते हैं.
    आपबीती सुनाने वाले सारे किसानों ने जिसकी दुकान से अनुबंध का फॉर्म लिया था वो हैं, आशीष सोडानी. ये किरदार इस कहानी में बहुत अहम है. कई किसानों के अनुबंध पर इनका नाम है, हस्ताक्षर या सील नहीं. ये फॉर्चून के मुलाजिम नहीं है. पिपरिया में खाद, बीज की एग्रो सर्विस सेंटर के नाम से बड़ी दुकान है. ये कहते हैं कंपनी इनके और किसानों के रिश्तों को भुना रही थी, इस घटना से सबक मिला है. अब वो भी ऐसे अनुबंध के भागीदार नहीं होंगे. सोडानी कहते हैं, "कंपनी को सीधे किसान से बात करने में आसानी नहीं होती, उन्हें किसानों पर भरोसा नहीं होता है इसलिए यहां हमारी भूमिका होती है. इस बार मुझे भी डर लगा है, कानूनी रूप से लिखा हुआ ज्यादा अच्छा होता है."
    पिपरिया में किसानों के नाम पर वाहवाही लूटने वाले एसडीएम साहब और कलेक्टर साहब से जब एनडीटीवी संवाददाता ने ये पूछने की कोशिश की कि नया कानून सितंबर के आखिरी हफ्ते में लागू हुआ और कॉन्ट्रैक्ट जून-जुलाई में ही हो गया था तो आखिर सरकार जो नए कानून का ढिंढोरा पीट रही है क्या वो कानून संसद से पारित होने और राष्ट्रपति का हस्ताक्षर लागू होने से पहले हा लागू हो गया? कलेक्टर साहब को कई बार फोन लगाया, मैसेज किया.. उनके दफ्तर में घंटा भर बैठे रहे लेकिन वो नहीं मिले और जवाब नहीं दे सके.
    खैर कृषि मंत्री से बात हो गई. वो खुद मानते हैं कि लालफीताशाही है. अब जब कृषि मंत्री लाल फीताशाही का रोना रोते हैं तो पिपरिया के किसी भौंखेड़ी कलां या गाड़ाघाट के किसान की क्या हैसियत होगी ये समझना मुश्किल नहीं है. कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा. "लड़ाई लड़ना पड़ता है, ये सिस्टम जो है लालफीताशाही बहुत खतरनाक है. हम किसानों को विश्वास दिला रहे हैं, एक्ट के अंदर जो समझौता होगा किसान सोच समझकर करें. दोनों के लिये बाध्य होगा. पिपरिया में जैसे ही एसडीएम ने राय मांगी हमने फौरन दी फिर कार्रवाई हुई. किसानों को ऐसे अनुबंध नहीं करना चाहिये. किसानों के हित में होगा, हर चीज किसान के लिये होगी ये किसानों की सरकार है हम न्याय दिलाएंगे.

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