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June 06, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

       मेलबॉक्स / शौर्यपथ / कोरोना वायरस से जहां सभी देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा रही है, वहीं भारत के सामने नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं। अपनी कमियों को पहचानने के साथ-साथ यह हमें आत्मनिर्भर बनने का मौका भी दे रहा है। हालांकि, यह आत्मनिर्भरता केवल औद्योगिक क्षेत्रों से नहीं आ सकती, इसकी बुनियाद बेहतर शिक्षा में छिपी है। आज हमारे देश में युवा और शिक्षित लोगों की कमी नहीं है, फिर भी वे इतने योग्य नहीं कि देश को आत्मनिर्भर बना सकें। लिहाजा आत्मनिर्भर बनने के लिए सबसे पहले हमें गुणवत्तापूर्ण और व्यावहारिक शिक्षा की ओर बढ़ना होगा। शोध के क्षेत्र में प्रोत्साहन ज्यादा जरूरी है। देश के सभी शिक्षण संस्थानों में निरंतर प्रायोगिक कक्षाएं होनी चाहिए। आज हमारे देश में विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ज्यादा उत्साहित रहते हैं, वे शोध के क्षेत्र में जाने से कतराते हैं। इस सोच को बदलने की दिशा में सरकार को काम करना चाहिए। शोध-कार्यों को बढ़ावा देकर ही आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ा जा सकता है।
प्रतीक राज, झांसी

और सजगता जरूरी
कोविड-19 से निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को सरकार ने चरणबद्ध तरीके से खोलने का एलान कर दिया है। लॉकडाउन की वास्तविक पाबंदियां अब सिर्फ कंटेनमेंट जोन में ही लगेंगी। मगर अब हम सबकी जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं। हमें ठीक ढंग से दो गज की दूरी का पालन करना होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से देश में संक्रमण और मौत के आंकडे़ जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, वे चिंताजनक हैं। चूंकि अर्थव्यवस्था को खोलना भी जरूरी है, इसलिए सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है कि लोग खुद पर अनुशासन रखें। खतरा अभी टला नहीं है।
काव्यांशी मिश्रा, मैनपुरी

साल एक, काम अनेक
मोदी सरकार 2.0 के एक साल पूरे हो चुके हैं। बीते एक वर्ष में सरकार कई मुद्दों पर विपक्ष के निशाने पर रही, लेकिन उसने कई ऐसे काम भी किए, जो आम जनता के हित में रहे। मोदी सरकार की सबसे खास बात यह है कि उसके मंत्री भ्रष्टाचार से दूर हैं। इसके अलावा, बरसों से चले आ रहे तीन तलाक को खत्म करके सरकार ने मुस्लिम वर्ग की महिलाओं को बड़ी राहत दी। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 रद्द करके अलगाववादियों द्वारा देश को विभाजित करने के प्रयासों को भी उसने एक झटके में नाकाम कर दिया। देश की अर्थव्यवस्था को प्रगति-पथ पर आगे बढ़ाना, सभी वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलना और उनके हित में काम करना, गरीबों के लिए अपने ही क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं तलाशना, देश में चल रहे आंतरिक विवादों को निष्पक्ष होकर सुलझाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सफल कूटनीति द्वारा ताकतवर राष्ट्रों के बीच अच्छे संबंध बनाना सरकार के ऐसे कार्य हैं, जो बहुत ही प्रशंसनीय हैं।
अभिषेक सिंह, जौनपुर

दुव्र्यवहार दुखद
महानगरों से लौटने वाले प्रवासियों के साथ कई गांवों में दुव्र्यवहार की खबरें आ रही हैं। ऐसा देखा जा रहा है कि ग्रामीणों के साथ-साथ जन-प्रतिनिधि भी उन्हें गांवों में प्रवेश से रोक रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की जांच के उपरांत, जिन्हें होम क्वारंटीन की सलाह दी गई है, उन्हें भी गांवों से बाहर रहने को कहा जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? घर लौटे प्रवासियों के साथ इस तरह की बदसुलूकी क्यों की जा रही है? जागरूकता के अभाव में वे ऐसा कर रहे हैं। सरकारी अधिकारी गण ऐसे ग्रामीणों और जन-प्रतिनिधियों को बताएं कि संदिग्ध मात्र से कोई कोरोना का मरीज नहीं हो जाता, और फिर, कोरोना के कई मरीज तो घर में भी ठीक हो सकते हैं। घर लौटे प्रवासियों के साथ ऐसा रूखा व्यवहार बंद होना चाहिए।
भूपेंद्र सिंह रंगा, हरियाणा

 

     ओपिनियन / शौर्यपथ / सन् 1972 की गरमियों की एक शाम। लू के थपेडे़ अभी नरम पड़े ही थे कि हम कुछ लड़के छात्रावास से निकले और पीछे बैंक रोड पर स्थित फिराक गोरखपुरी के बंगले की तरफ बढ़ चले। उस गरमी में यह हमारा रोज का कार्यक्रम था। उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में गरमियों की छुट्टियों में सभी हॉस्टल खाली करा दिए जाते थे और केवल उन छात्रों को, जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं का फॉर्म भरा हो, समर हॉस्टल में रुककर अपनी तैयारी का मौका मिलता था। इस बार समर हॉस्टल गंगा नाथ झा छात्रावास था, जिसके ठीक पीछे फिराक का निवास था। अपने जीवन में ही किंवदंती बन चुके उनका बैठका साहित्य, संस्कृति, भाषा और समाज जैसे विषयों पर खुद को समृद्ध करने का सबसे बड़ा अड्डा था।
फिराक साहब की महफिल अभी सजी नहीं थी और हम छात्र वहां पहुंचने वाले पहले ही थे। उस दिन बात भारतीय गांवों पर छिड़ गई। जाहिर है, इन सत्रों में ज्यादातर बोलते फिराक ही थे और हमारी भूमिका श्रोता की अधिक होती थी, पर उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि हम भड़क गए। अपने हाथ का जाम स्टूल पर रखते हुए, उंगलियों में फंसे सिगरेट की राख खास अंदाज में झाड़कर और कंचों-सी आंखें अंदर तक धंसे कोटरों में घुमाते हुए उन्होंने जो कहा, वह किसी बम विस्फोट से कम नहीं था। उनके अनुसार, भारत के गांवों को नष्ट कर देना चाहिए। इनके बने रहने तक देश जहालत, गंदगी और पिछडे़पन से मुक्त नहीं हो सकता। इनकी जगह पचास हजार से एक लाख की आबादी वाले छोटे नगर बसने चाहिए, जिनमें मुख्य गतिविधियां कृषि आधारित उद्योगों के इर्द-गिर्द घूमती हों। हम सभी शहरों में आ तो गए थे, पर हमारी जड़ें गांवों में थीं। हम उन पर टूट पडे़, पर फिराक तो फिराक ही थे।
उन्होंने हमें उन ऐतिहासिक बहसों के बारे में बताया, जो भारतीय गांवों को लेकर चली थीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण थी महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज्य’ या ‘ग्राम स्वराज्य’ और गांव को लेकर उनके प्रेम पगे अव्यावहारिक आग्रहों पर डॉ आंबेडकर की तीखी और जमीनी यथार्थ से जुड़ी प्रतिक्रिया। गांधी के लिए गांव स्वर्ग थे और जो कुछ कुरूप तत्कालीन भारतीय समाज में था, वह सिर्फ आधुनिक तकनीक की वजह से था। उनका सपना था कि गांव आत्मनिर्भर हों। वे अपनी जरूरत की सारी चीजें खुद पैदा करें, उनका स्थापत्य व अदालती निजाम भी स्थानीय हो और खेती-किसानी में उन्हीं यंत्रों का प्रयोग हो, जिन्हें गांव के बढ़ई या लोहार बनाते हों। उनके अनुसार, रेलवे को इसलिए बंद कर देना चाहिए, क्योंकि उससे हैजा फैलता है।
अब इस पर बहस करने की जरूरत नहीं है कि यदि गांधी के आदर्श गांव की परिकल्पना मान ली गई होती, तो हमारी खाद्य सुरक्षा का क्या होता, पर हमारे लिए आंबेडकर की प्रतिक्रिया आज भी प्रासंगिक है। गांधी के स्वर्ग को सिरे से खारिज करते हुए आंबेडकर ने भारतीय गांवों को साक्षात नरक बताया। कलेजा चीर देने वाली तड़प के साथ उन्होंने लिखा कि गांधी अगर ‘अछूत’ परिवार में पैदा हुए होते, तब उन्हें इस स्वर्ग की असलियत पता चलती। जिनका गांवों से जीवित संबंध है, वे आज भी महसूस करते हैं कि आंबेडकर के समय का ‘अछूत’, ‘हरिजन’ की यात्रा करते हुए ‘दलित’ जरूर हो गया है, पर गांव अभी भी उसके लिए नरक ही है।
फिराक गोरखपुरी के साथ बिताई वह शाम आज एक खास वजह से याद आ रही है। हमारी समकालीन स्मृति में कोरोना के मारे महानगरों से अपने गांव क्षत-विक्षत लौटते लाखों मजदूरों के विजुअल्स हमेशा के लिए टंक गए हैं। उनकी यातना और पीड़ा पर मैं पहले ही लिख चुका हूं, यहां मकसद उस विमर्श को रेखांकित करना है, जो उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी घोषणा से शुरू हुआ है। ज्यादातर लौटने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं और जिन राज्यों के विकास के लिए उन्होंने अपना खून-पसीना बहाया था, विदाई के समय उनका व्यवहार काफी हद तक अमानवीय था, इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि यूपी सरकार ऐसी स्थिति से दुखी और नाराज होती, पर ऐसे में उसकी योजना को देखना जरूरी होगा।
पहले तो यह समझना होगा कि शहरों की ओर पलायन सिर्फ आर्थिक कारणों से नहीं होता। शहर और बाजार दलितों व पिछड़ों को मनुष्य की पहचान देते हैं। गांवों में अभी भी दक्षिण टोला मौजूद है। आज भी किसी दलित को उसकी जाति के तोडे़-मरोड़े नाम से ही पुकारा जाता है, मां-बाप का दिया नाम तो उसे शहर में आकर याद आता है। दक्षिण टोला से निकलकर वे शहरों में किसी गंदे नाले या रेल लाइन के किनारे झुग्गी-झोपड़ी के नरक में सिर्फ इसलिए नहीं रहते कि वहां उन्हें आर्थिक सुरक्षा मिलती है, बल्कि इससे अधिक उन्हें मनुष्य जैसी पहचान भी मिलती है। कोरोना शुरुआत में तो हवाई जहाजों से उतरा, पर संक्रमण की आदर्श स्थितियों के कारण जल्द ही महानगरों के स्लम उसके प्रसार स्थल बन गए। अनियोजित और अमानवीय शहरी विकास के कारण हमारे नगरों में गगनचुंबी इमारतें, साफ-सुथरी सड़कें और हरे-भरे पार्क हैं, और उनके ठीक बगल में बजबजाते नालों पर किसी तरह से सिर छिपाने भर की जगह वाली कच्ची बस्तियां। आजादी के बाद कभी नहीं हुआ कि मनुष्यों के रहने लायक शहर बसाने के प्रयास किए जाएं। स्लमों को हटाकर वहां साफ-सुथरी रिहाइशें बसाने की कोशिशें नहीं की गईं। इसकी जगह स्लम में बिजली, पानी जैसी सुविधाएं देने की बातें राजनीतिक-आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद थीं, इसलिए उसी की बातें होती रहीं।
ऐसे में, किसी सरकार का यह सोचना कि वह चालीस लाख से अधिक श्रमिकों को गांवों में ही रोक लेगी और उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार दे देगी, यह देखने वाली बात होगी। पूरी दुनिया में शहरीकरण बढ़ रहा है और भारत में भी अब लगभग आधी आबादी शहरों में रहती है। भविष्य अंतत: शहरों का ही है। गांव में रोककर इन लाखों लोगों को रोजगार देने की जगह उन्हें फिराक गोरखपुरी की सलाह पर गौर करना चाहिए और गांवों का मोह त्यागकर छोटे-छोटे नगर बसाने की सोचना चाहिए। ये नगर साफ-सुथरे मकानों, सड़कों, सीवर, ड्रेनेज, पेयजल और हरियाली वाले रिहाइशी इलाके होंगे, जो वर्ण-व्यवस्था की गलाजत से मुक्ति दिलाकर उन्हें मानवीय बनाएंगे। इनमें छोटे-छोटे उद्योग-धंधे होने चाहिए, जो रोजगार भी दें व पर्यावरण भी बचाएं। पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर ही कई मिनी नोएडा बसाए जा सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)विभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी

 

कोरोना महामारी संकट में जनजागरूकता लाने में अहंभूमिका निभाने वाले श्रमजीवी पत्रकार एवं प्रेसकर्मी के साथ मोदी सरकार कर रही है गलत व्यवहार
कोरोना महामारी संकट से श्रमजीवी पत्रकार एवं प्रेसकर्मी भी प्रभावित
पत्रकारों को भी भूली मोदी सरकार, ना मुद्रा योजना का मिला लाभ, ना 20 लाख करोड़ पैकेज से कोई राहत
कोरोना महामारी संकट में लोकतंत्र को चौंथा स्तम्भ भी प्रभावित, 20 लाख करोड़ के पैकेज में मीडिया जगत के लिये भी प्रावधान नहीं

   रायपुर / शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि मोदी सरकार के द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज में लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ के सिपाहियों के लिए कोई इंतजाम नहीं होना दुर्भाग्य जनक एवं निंदनीय है। कोरोना महामारी संकट काल में आमजनता को जागरूक करने जन-जन तक खबरों को पहुंचाने में अपने जान को जोखिम में डालने परिवार की चिंता किए बगैर महती भूमिका निभाने वाले मीडिया संस्थान, श्रमजीवी पत्रकार और प्रेस कर्मियों का उपयोग कर मोदी सरकार उनको भूल गई।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि मोदी सरकार के द्वारा शुरू की गई मुद्रा योजना का लाभ भी श्रमजीवी पत्रकार और प्रेस कर्मियों को नहीं मिला था। ठीक वैसे ही कोरोना संकट काल में 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज में मीडिया संस्थान, श्रमजीवी पत्रकार, प्रेस कर्मियों के लिए कोई आर्थिक मद्द नहीं है, जो मोदी सरकार के श्रमजीवी पत्रकारों और प्रेस कर्मियों के वर्तमान एवं भविष्य को लेकर गैर जिम्मेदार होने को दर्शाती है। कोरोना महामारी संकटकाल में देशभर के लगभग एक करोड़ श्रमजीवी पत्रकार और प्रेसकर्मी एवं उनके परिवार के चार करोड़ सदस्यों के सामने भी जीवनयापन का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। मीडिया संस्थानों की माली हालत खराब होने का प्रभाव श्रमजीवी पत्रकार और प्रेस कर्मियों की नौकरी पर भी पड़ा है और पड़ेगा। दुर्भाग्य है कि पत्रकारों के साथ-साथ मीडिया संस्थाओं को भी मोदी सरकार भूल गयी है।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि दुर्भाग्य जनक है। लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ के सहारे राजनीति करने वाले मोदी सरकार को उसी चतुर्थ स्तंभ के सिपाहियों के न तो वर्तमान को लेकर कोई चिंता है ना ही इनके आने वाले भविष्य को लेकर कोई चिंतन 20 लाख करोड़ के पैकेज में किया गया।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने मोदी सरकार से मांग करते हुए कहा कि कठिन समय में श्रमजीवी पत्रकार एवं प्रेस कर्मियों और उनके परिवारों के लिए कोरेना महामारी संकटकाल में सीधी आर्थिक मदद के लिए न्याय योजना शुरू कर श्रमजीवी पत्रकार एवं प्रेस कर्मियों को भी उस दायरे में लाए और सम्मानजनक राहत राशि प्रतिमाह उनको प्रदान करें। लोकतंत्र का चतुर्थ स्तंभ सरकार और जनता के बीच संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण और सशक्त माध्यम है। आज लोकतंत्र के सिपाही ही आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं ऐसे कठिन समय में सरकार और जनता के बीच के संवाद को प्रचारित प्रसारित करने वाले के बारे में चिंता करने की आवश्यकता है।
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि मोदी सरकार को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकार के द्वारा श्रमजीवी पत्रकार के हित में लिए अनेक निर्णयों से सीख लेनी चाहिए। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार ने पत्रकार कल्याण कोष से गंभीर बीमारी आदि की दशा में दी जानी वाली आर्थिक सहायता राशि को 50 हजार रुपया से बढ़ाकर 2 लाख रुपया किया है। बीते साल 57 पत्रकारों को लगभग 19.50 लाख रूपए की आर्थिक सहायता दी गई थी। वरिष्ठ सेवानिवृत्त पत्रकारों के लिए वरिष्ठ मीडिया कर्मी सम्मान निधि योजना संचालित की है। इस योजना में आयु सीमा 62 वर्ष से घटाकर 60 वर्ष एवं सम्मान राशि रूपए 5 हजार से बढ़ाकर रूपए 10 हजार और सम्मान निधि देने की अवधि 5 वर्ष से बढ़ाकर आजीवन कर दी है।

    दुर्ग / शौर्यपथ / अमृत मिशन योजना के नाम पर वार्ड 53 पोटिया कला वार्ड में तीन व्यक्तियों के द्वारा कुछ घरों में जाकर पैसे की मांग मिले । इसकी जानकारी वार्ड के पार्षद नेता प्रतिपक्ष अजय वर्मा को होने के उपरांत उन्होंने उन तीनों व्यक्तियों को वार्ड निवासियों के साथ घेराबंदी कर पकड़ा। और उनसे पूछताछ की उन्होंने इसकी जानकारी निगम आयुक्त इंद्रजीत बर्मन को दिए । आयुक्त के निर्देश पर अमृत मिशन योजना के अधिकारियों ने तत्काल उन व्यक्तियों की पतासाजी की है पता चला की वे तीनों पुलगांव में अमृत मिशन योजना के तहत कार्य कर रहे हैं ऐसा बता रहे थे । और इस वार्ड में भी बहुत जल्द कार्य चालू हो रहा है अत: हम लोगों को भोजन आदि के लिए पैसे देवें ।
अमृत मिशन के अधिकारियों ने बताया मिशन में काम करने वाले ऐसे किसी भी व्यक्ति को कहीं से भी जाकर पैसा लेने के निर्देश नहीं दिए गए हैं जिनके द्वारा भी अमृत मिशन के नाम से पैसे की मांग की जा रही है वह बिल्कुल गलत है । उन्होंने शहर के समस्त आम जनता से अनुरोध कर कहा है कि पूरे शहर के वार्डो में अमृत मिशन योजना के तहत पाइप लाइन विस्तार और नया पाइप लाइन में कनेक्शन का काम निरंतर किया जा रहा है योजना में काम करने वाले श्रमिकों के लिए लाक डाउन के दौरान फंसे लोगों के लिए हमारी ओर से व्यवस्था की गई है यदि अमृत मिशन का कोई भी कर्मचारी, श्रमिक खाना या भोजन के नाम से पैसे की मांग करते हैं तो बिल्कुल भी ना दें।
अमृत मिशन कार्य के नाम से पैसा मांगने वाले तीनों व्यक्तियों को पार्षद नेता प्रतिपक्ष अजय वर्मा के नेतृत्व में पकड़ा गया तथा आयुक्त के निर्देश पर उन्हें पदमनाभपुर स्थित थाना को सौंप दिया गया जहां से उन तीनों को जेल भेज दिया गया । बताया गया कि तीनों व्यक्ति शराब के नशे में धुत थे ।

   दुर्ग / शौर्यपथ / एमजीएम सीनियर सेकंडरी स्कूल भिलाई संकट काल के दौरान उत्तपन्न होने वाली पर्कृतिक आपदाओं और महामारी के विरुद्ध लड़ने में हमेशा से ही एक उत्साही सेनानी की तरह कार्य करता रहा है . यह उल्लेखनीय है कि एमजीएम स्कूल भिलाई इस कठिन समय में अपना योगदान देकर महामारी व प्रक्रितक आपदाओ के दौरान जरुरतमंदो के लिए आवश्यक मदद पहुचाने में हमेशा संवेदनशील रहा है .
परम्परानुसार एमजीएम बिरादरी ने covid - 19 के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लेते हुए मुख्यमंत्री सहायता कोष में योगदान दिया है और इसे जिला कलेक्टर दुर्ग को सौप दिया गया . स्कूल से सीधे योगदान के अलावा एमजीएमस्टाफ ने भी स्वेक्षा से इस विपरीत परिस्थिति में अपना एक दिन का वेतन दान किया . प्रबंधक bishop of the school his Grace josheph Mar Dionysius ,एमजीएम स्कूल के उपाध्यक्ष Very Rev. Thomas Ramban, एमजीएम चर्च के सहायक विकार Father Shinu Cherian , Mr. Prince MA Hon..Correspondent of the school ,Mr.Viji Candy , Mr. K.P. Santosh ,Mr. Shabu Jhon माननीय कमिटी मेम्बर्स व एमजीएम स्कूल के प्राचार्य Prof. Dr. B.D Thakaran , Mr. Shaji Chacko फेकल्टी मेम्बर्स की उपस्थिति में जिला कलेक्टर को चेक सौपा .
यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि एमजीएम सीनियर सेकेंडरी स्कूल समाज में हो रही प्राकृतिक आपदाओ के प्रति हमेशा संवेदनशील रहा है और समय समय पर स्थितियों की मांग के अनुसार उचित योगदान दिया है .

नई दिल्ली / शौर्यपथ / गैर-सब्सिडी LPG सिलिंडरों के दामों में सोमवार को जबरदस्त वृद्धि की गई है, जिसके बाद मेट्रो शहरों में लोगों को कुकिंग गैस पर अब पहले से कहीं ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे. कुछ मेट्रो शहरों में तो लोगों को प्रति सिलिंडर पर पहले के मुकाबले 37 रुपए तक ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे. गैस के दामों में यह बड़ी बढ़ोत्तरी तीन महीनों से लगातार घटते दामों के बाद आई है.
अगर मेट्रो शहरों की बात करें तो इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून यानी सोमवार से दिल्ली में गैर-सब्सिडी पर खरीदे जाने वाले प्रति कुकिंग गैस सिलिंडर (14.2 किलोग्राम) के रेट में 11.50 रुपए की बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं कोलकाता में 31.50 रुपए प्रति सिलिंडर, मुंबई में 11.50 रुपए प्रति सिलिंडर और चेन्नई में 37 रुपए प्रति सिलिंडर बढ़े हैं.

1 जून से दिल्ली में फिलहाल 581.50 रुपए की दर से मिल रहे गैर-सब्सिडी पर मिलने वाले सिलिंडर की एक रिफिलिंग पर अब 593 रुपए खर्च करना होगा. मुंबई में 579 रुपए का सिलिंडर 590.50 रुपए, कोलकाता में 584.50 रुपए की दर से बिक रहा सिलिंडर अब 616 रुपए में बिकेगा. वहीं चेन्नई में 569.50 रुपए की दर से बिक रहे सिलिंडर के लिए 606.50 रुपए खर्च करना पड़ेगा.

बता दें कि फिलहाल सरकार एक घर के लिए सालाना 14.2 किलोग्राम के 12 सिलिंडर सब्सिडी पर देती है. इसके बाद कोई उपभोक्ता अलग से सिलिंडर खरीदता है तो उसे बाजार में चल रहे दामों के हिसाब से पैसे खर्चने होते हैं. ये भी ध्यान रखने की बात है कि सरकार की सब्सिडी अंतरराष्ट्रीय बाजार में चल रहे क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल के दामों और फॉरेन एक्सचेंज पर निर्भर करती है.

 

नई दिल्ली / शौर्यपथ / राजीव गांधी हेल्थ साइंसेज यूनिवर्सिटी के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में शामिल हुए पीएम मोदी ने छात्रों को संबोधित किया. अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि देश की स्वास्थ्य सेवाएं तेजी से बदल रही हैं. उन्होंने कहा कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में कोरोना वॉरियर्स की भूमिका अहम है, दुनिया देख रही है कि भारत किस प्रकार इस खतरनाक वायरस से युद्ध कर रहा है. उन्होंने कहा कि वायरस अदृश्य हो सकता है लेकिन हमारे कोरोना योद्धा अजेय हैं. डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी बिना वर्दी वाले सैनिक हैं.
पीएम मोदी ने कोरोना वॉरियर्स के खिलाफ हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि मैं स्पष्ट कह देना चाहता हूं कि फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ बुरा व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. पीएम मोदी ने कहा कि हमें मानवता से जुड़े विकास की ओर देखना होगा. इस मौके पर उन्होंने आयुष्मान योजना का भी जिक्र किया, उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत दुनिया की सबसे बड़ी हेल्थ स्कीम है. दो साल से कम में ही इसका फायदा 1 करोड़ लोग उठा चुके हैं. महिलाएं और गांव के लोग सबसे ज्यादा लाभार्थी हैं.

पीएम मोदी ने कहा कि 22 और AIIMS खुल चुके हैं और भारत इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है. उन्होंने कहा कि पिछले पांच साल में देश में एमबीबीएस की 30 हजार सीटें बढ़ गई हैं और पोस्ट ग्रैजुएशन की सीटों में 15 हजार की बढ़ोतरी हुई है.

 

खाना खजाना / शौर्यपथ /1. एप्पल-एग केक

सामग्री :

2 सेब कटे हुए, 1 चम्‍मच दालचीनी पावडर, 3 अंडे, आधा कप कि‍शमि‍श, आधा कप शक्‍कर, आधा चम्‍मच नमक, 4 मटजो शीट्स, पाव कप वनस्‍पति‍ तेल।

वि‍धि ‍:

सबसे पहले ओवन को 350 डि‍ग्री फेरनहाइट पर गरम करें और 8 बाय 8 की बेकिंग डि‍श में तेल लगाकर रख लें। मटजो शीट्स को टुकड़ों में तोड़ लें और पानी में नरम होने तक भि‍गोकर रखें। बाद में पानी से नि‍काल लें।


एक बाउल में अंडा, शक्‍कर, नमक, तेल और दालचीनी को एक साथ फेंट लें। इसमें भि‍गोया हुआ मटजो डालकर अच्‍छी तरह मि‍ला लें। अब इसमें सेब और इलायची डालें। अब इस मि‍श्रण को तैयार बेकिंग डि‍श में डालें और 45 मि‍नट तक बेक करें। एप्‍पल एग केक तैयार है।

2 . एग-लेमन केक

सामग्री :

2 नींबू का रस, 4 अंडे, तीन पाव मैदा, 2 चम्‍मच बेकिंग पावडर, 1 चम्‍मच नमक, 1 कप मक्खन, 3 चम्‍मच आइसिंग शुगर, 1 कप शक्‍कर।

वि‍धि :

सबसे पहले आइसिंग शुगर को मक्खन में अच्छी तरह मि‍ला लें। अब इसमें मैदा, बेकिंग पावडर, नमक और अंडे को फोड़कर मि‍लाएं। अब इसे ओवन में 50 मि‍नट तक 400 डि‍ग्री फेरनहाइट पर बेक करें। शक्‍कर और नींबू को उबाल लें। केक को ओवन से नि‍कालने के बाद उस पर उबला हुआ नींबू का रस डाल दें और ठंडा करके परोसें।


3. डिलीशियस ओट्स केक
सामग्री :

1 प्याला ओट्स, 1 प्याला मैदा, 1 बड़ा चम्मच क्रीम, पाव प्याला ब्राउन शुगर, 1 गिलास दही की छाछ, आधा प्याला मक्खन पिघला हुआ, 1 छोटा चम्मच बेकिंग पावडर।

विधि :

सर्वप्रथम ओट्स को एक घंटा छाछ में भिगो दें। अब उपरोक्त सारी सामग्री को अच्छी तरह फेंटकर भिगोए हुए ओट्‍स में मिला दें।

फिर चिकनाई वाली मफिंग ट्रे में सारी सामग्री डाल दें और ओवन को 180 डिग्री सेंटीग्रेड पर गरम करके ट्रे उसमें रख दें। अब 15 मिनट बेक कर ओट्स केक पेश करें।

4. फेस्टिव कोको केक

सामग्री :

मिल्क मेड 1 टिन, मैदा 250 ग्राम, मक्खन 100 ग्राम, कोको पावडर 3 चम्मच, सिरका 1 बड़ा चम्मच, सोड़ा 1 चम्मच, क्रीम 1 कप, चेरी 1 कप, मेवे (कटे हुए) 1 कप।

विधि :

सबसे पहले मिल्क मेड को चम्मच से फेंटकर झागदार कर लें, फिर मक्खन मिलाकर दो मिनट और फेंटें। धीरे-धीरे मैदा डालें और मिलाते हुए सारे मिश्रण को एकसार कर दें। सोड़ा और सिरका डालकर मिला दें।

कोको मिला दें और ओवन में बेक कर लें। अब क्रीम को खूब फेंटकर केक के ऊपर तह जमा दें। चेरी और मेवे से सजाकर सर्व करें।
5. ऑमण्ड पैशन केक

सामग्री :

100 ग्राम (कटे हुए) बादाम, 275 ग्राम मैदा, 275 ग्राम शक्कर, मक्खन (पिघला हुआ) 125 ग्राम, पानी 35 मिली., बैंकिंग पावडर 1 चम्मच, बैकिंग सोडा 1/4 चम्मच, क्रीम 1 बड़ा चम्मच।

विधि :

पहले शक्कर व पानी को एक सॉस पैन में डालें। धीमी आंच पर चढ़ाएं और तीन तार की चाशनी बना लें। चाशनी में मक्खन डालें व अच्छी तरह मिला दें।

मैदा, बैकिंग पावडर व सोड़े को छान कर चाशनी में मिलाकर एकसार कर दें। क्रीम भी फेंट कर मिला दें। अब बादाम डालकर घी चुपड़ें, केक टिन में डाल दें और 180 सेंटीग्रेड पर 30 मिनट बेक कर लें। ठंडा होने पर ऑमण्ड पैशन केक क्रीम से सजा कर सर्व करें।

6. लाजवाब स्‍पंजी केक
सामग्री :

125 ग्राम मैदा, 75 ग्राम बटर, 200 ग्राम मिल्‍क मेड (आधा टीन), 100 मिली सोटा वाटर/ कोल्‍ड ड्रिंक, आधा टी स्‍पून मीठा सोडा, आधा टी स्‍पून बेकिंग पावडर, एक टी स्‍पून एसेंस।

विधि :

सबसे पहले माइक्रो को कन्‍वेक्‍शन मोड (180 डिग्री से.) पर 4 मिनट तक गर्म करें। अब मैदा, बेकिंग पावडर व सोडा छान लें। मक्‍खन और मिल्‍क मेड 4 से 5 मिनट तक फेटें। धीरे-धीरे सूखी सामग्री मिलाएं और सोडा की सहायता से घोल तैयार करें।

अब एसेंस डालें। मोल्‍ड (ग्‍लास या एल्‍यूमिनियम का बर्तन) के भीतर तेल लगाएं और डस्‍ट करें। घोल डालें। मोल्‍ड को लोवर रेक पर रखें और 180 डिग्री पर 25 से 30 मिनट तक बेक करें। ठंडा होने पर बाहर निकालें।
7. कोको केक

सामग्री :

250 ग्राम मैदा, 100 ग्राम ब्राउन शुगर, 120 ग्राम मारगीन, 1 टी स्पून कोको पावडर, 1/2 टी-स्पून मीठा सोडा, 1/2 टी-स्पून सिरका, 1/4 टी-स्पून जायफल पावडर, 2 कप दूध, नींबू का छिलका किसा हुआ, 1 नींबू का रस।
ब्राउन शुगर ऐसे बनाएं :

100 ग्राम शक्कर में 1/2 टेबल-स्पून जली शक्कर का रंग मिला दें।

विधि :

सबसे पहले शक्कर व मारगीन हल्का होने तक फेटें। तत्पश्चात मैदे में बेकिंग पावडर, जायफल पावडर, कोको पावडर मिलाकर छानें। अब इस छने हुए मैदे को मारगीन में हल्के हाथ से मिलाएं। इसमें दूध व मैदा डालकर मिलाते जाएं।

अब इसमें सिरका नींबू का रस, वनीला एसेंस मिलाकर 45 मिनट तक मध्यम से कम आंच पर व 15 मिनट तक एकदम कम आंच पर बेक करें। इलेक्ट्रिक ओवन में भी करीबन 50 से 55 मिनट तक बेक करें। तैयार कोको केक से फेस्टिवल का आनंद लें।
8. फ्रूट आइसक्रीम केक

सामग्री :

1 स्पंज केक (1 पाउंड का), 1/2 पैकेट लाल जैली, 1 फै‍मिली पैक वेनिला आइसक्रीम, 3/4 कप ताजा गाढ़ा दही, 5 बड़ा चम्मच पिसी चीनी, 1 छोटा डिब्बा अनारस के स्लाइस, 100 ग्राम क्रीम, 1 पैकेट जिलेटिन।

विधि :

केक को बीच से काटकर दो भागों में कर लें। अनारस के महीन टुकड़े कर लें। इसके रस को फेंके नहीं। केक के 1 भाग को रस से गीला कर लें। 3/4 कप रस में जिलेटिन मिलाकर धीमी आंच पर गलने तक पका लें।

1 1/2 कप उबलते पानी में जेली गलाकर उतार लें। ठंडा कर इसे केक के माप के जितने बड़े डिब्बे में जमने के लिए रख दें। आइसक्रीम गला लें। इसमें अनारस के टुकड़े, दही, 2 बड़ा चम्मच चीनी व पिघली ‍जिलेटिन अच्छी तरह मिला लें।

इस घोल के बर्तन को गर्म पानी के बड़े बर्तन में रख गाढ़ा होने तक चम्मच से चलाएं । इस घोल को जेली के ऊपर डाल दें। फिर इसे फ्रिज में जमने रख दें। जब यह जम जाए तब गीला किया हुआ केक का 1 हिस्सा इसके ऊपर रख दें।

परोसने के पहले जेली के बर्तन को गर्म पानी में 2-4 मिनट रख दें। इससे आसानी से निकल आएगी। परोसने की प्लेट पर इसे उलटाकर दें। क्रीम में 3 बड़ा चम्मच चीनी मिला गाढ़ा होने तक फेंटें। इसे केक के चारों ओर लगा दें। इच्छा हो तो चेरी से सजाकर परोसें।

9. स्पेशल रोज केक

सामग्री :

2 कप मैदा, आधा कप मक्खन, एक चम्मच मलाई, एक कप पिसी चीनी, एक कप दही, एक चम्मच बेकिंग पावडर, आधा चम्मच मीठा सोडा, एक चम्मच स्ट्रॉबेरी एसेंस, 500 ग्राम ताजा क्रीम, डेढ़ कप आइसिंग शुगर, हरा, पीला और गुलाबी खाने का मीठा रंग कुछ बूँदे, सजावट के लिए एक चम्मच कटे बादाम- पिस्ता, एक कप बारीक कटे अखरोट, गुलाब जल।

विधि :


सबसे पहले मैदा, सोड़ा और बेकिंग पावडर छान लें। मलाई, मक्खन और चीनी को एक किनारी वाली थाली में इतना फेंटें कि वह एकदम हल्की क्रीम बन जाए। इसमें मैदा, दही और एसेंस मिलाकर मिश्रण को एकसार कर लें।

अब केक टीन में चिकनाई लगाकर थोड़ा-सा सूखा मैदा बुरक दें और फेंटे हुए मिश्रण को पॉट में डाल दें। ओवन को पहले से अच्छा गरम कर लें। केक टीन को रखकर करीब चालीस मिनट तक बेक करें। अब सलाई डालकर देखें यदि उस पर मिश्रण नहीं चिपक रहा है तो केक तैयार है। क्रीम में आइसिंग शुगर मिलाएं। इसे गाढ़ा और मुलायम होने तक फेंटें। रोज एसेंस मिलाएं। केक की ऊपरी सतह को किनारों को छोड़ते हुए बीच से गोलाई में काट कर निकाल दें। तैयार क्रीम के दो हिस्से कर लें। एक हिस्से को केक के बीच के हिस्से में फैला दें। किनारों पर भी अंदर की तरफ अच्छी तरह लगाएं।

दूसरे हिस्से में तीन भाग करके अलग-अलग कलर मिला दें। कोन में भरकर केक पर रंगीन गुलाब और हरी पत्तियां बना दें। हर फूल के बीच में बादाम, पिस्ता, अखरोट को चिपकाते हुए सुंदर डिजाइन बना दें। तैयार स्पेशल रोज केक अपनों को खिलाएं।
10. सोया वेनीला केक

सामग्री :

सोयाबीन (भीगे हुए) 1 कप, मैदा 1 कप, मक्खन या घी 2 कप, कैस्टर शुगर 2 कप, बेकिंग पावडर 1 चुटकी, काजू, बादाम, किशमिश 1 कप, वेनीला एसेंस।
विधि :

सबसे पहले सोयाबीन को चिकना पीसें। अब घी और शक्कर को फेंटें। इसमें सोया पेस्ट मिलाकर फेंटते हुए हल्का करें। वेनीला एसेंस, कटा सूखा मेवा और मैदा डालकर मिलाएं।

अब केक प्लेट में चिकनाई लगाकर हल्का-सा मैदा बुरकें। इसमें फेंटी हुई सामग्री डालें। पहले से गर्म किए ओवन में 180 डिग्री पर बेक करें। काजू से सजाकर मनचाहे आकार में काटें और इस खास पर्व पर पेश करें।

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / लॉक डाउन के दौरान सोशल मीडिया पर ही पूरा घर-बंद देश उमड़ पड़ा... क्योंकि बाकि बचे हुए तो जीने मरने, अपने देश-गांव की मिटटी में लौटने की, जान की परवाह किए बिना, भूखे-प्यासे
अपने परिवारों के साथ संघर्ष कर रहे हैं। देश इन्हीं दो वर्गों में बंट गया। साथ ही एक वो हिस्सा जो संक्रमित हो चुका है कोरोना से, उसकी अपनी एक अलग दुनिया है।

आज सर्वशक्तिमान कौन है? जो बनाता है, बिगाड़ता है, जोड़ता है, तोड़ता है, मिलाता है, बिछुड़ाता है, दोस्त और दुश्मन भी बना देता है। आपकी जिंदगी में कई मनमानियां भी ये पूरी करता है। अलादीन का चिराग है। सारे सपने घर बैठे ही पूरे कर सकता है। और तो और सरकारें बना देता है, सरकारें गिरा देता है।ये वो बला है जो न कराए वो थोड़ा है।रातों रात स्टार बना दे, क्षण भर
में मुंह काला करा दे। नाम बना दे-बदनाम कर दे...अब भी याद आया कि नहीं????

अरे भाई वही सरल सा तो जवाब है- सोशल मीडिया।


कोरोना ग्रासितों की दुनिया भी इससे आबाद है, उनका भी यही सोशल मीडिया सहारा बना हुआ है। यदि उनके पास इसकी सुविधा है तो।


अनहोनी को होनी कर दे, होनी को अनहोनी ऐसी शक्ति से संपन्न, दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो मतलब
पूरी भड़ास निकालने का साधन, ये सोशल मीडिया का जादू है मितवा जिसमें अपने प्यारे हबी, शोना, बाबू, बेबी,
से, जो दिल ना कह सका वो भी इसी पर ढेर सारे किस्सी/पप्पी, दिलों के और भी उपलब्ध इमोजिस के साथ इठलाते
बलखाते फोटो, विडिओ, रोमांटिक गानों के साथ दिली तमन्ना पूरी करने का श्रेष्ठ माध्यम बना हुआ है ये आपकी मुट्ठी में भींचा हुआ यंत्र। तो बस अब खाली, चौबीसों घंटे घर में बैठा इंसान क्या करे ?

अब रोज परिवार कोरोना उत्सव मनाने लगे। पकवान/ व्यंजन बनने लगे। उनकी बाकायदा थाली/प्लेटें सजाई जातीं और पोस्ट की जातीं। महिलाएं सुंदर-सुंदर कपड़े पहनतीं तैयार होतीं, साड़ी चेलेंज निभातीं। त्यौहारों पर, जन्मदिन-शादी की सालगिरह पर घरों में ही कार्यक्रम/पार्टियां होतीं। जो उपलब्ध होता उसी में आनंद लेते और आज भी ले ही रहे हैं।


अब इन सभी गतिविधियों ने आनंद तो दिया पर इसका

फिर एक वर्ग ने घोर विरोध किया।। इनका कहना था कि देश ऐसी आपदा से घिरा हुआ है, लोग भूखे मर रहे, हैं और इन्हें ऐसी भरी हुई व्यंजनों की थाली पोस्ट करते लज्जा नहीं आ रही … और भर्त्सना कर-कर के ऊधम मचा दी। एक गुट तैयार हुआ शुरू हुई टांग खिंचाई।

देश गया...राष्ट्र-भक्ति गई बस उसने पोस्ट डाली का युद्ध बिगुल बज गया। कमेन्ट बॉक्स भर गए, लाइक और इमोजी की बाढ़ आ गई। कोसने-दुलराने का, पक्ष-विपक्ष, कटाक्ष-व्यंग का घमासान हो चला। आह-वाह और कराह हो गई भाई।।।


अब कुछ ने दूर दराज लोगों बसे अपने परिजनों में गीत-गजल, नृत्य-मनोरंजन और भी कुछ खेलों के ताजातरीन तरीके आजमाए। अपनी उपलब्धियां, सृजन-कार्य, सेवा- सहयोग कार्य सभी का विवरण फिर से उसमें पोस्ट किया। पुनः दो वर्गों में सोशलिये बंटे और फिर से कुश्ती शुरू। ज्ञान-गंगा बहना शुरू।

ऐसे समय ये शोभा देता है ? विपत्ति काल है। जरा तो शर्म करें। यहां हम पुरुषों का मुद्दा छोड़ देते हैं।

केवल महिलाओं की बात करते हैं। इन हरकतों ने कईयों के बीच झगडे करवा दिए, दूसरों की वाल पर जा कर रोईं। एक दूसरे की बुराई की, भरपूर कोसा, उसको नीच, खुद को महान बताया। स्क्रीन शॉट ब्रह्मास्त्र की तरह चले। रिश्ते बिगड़े, इज्जत उतरी, पंगे हुए। इन सबमें केवल और केवल आपकी छवि बिगड़ी,

बिना कारण तनाव हुआ, समय बिगड़ा, संबंध खराब हुए सो अलग।

सबसे पहले यह समझिए की ये एक छद्म दुनिया है। इससे कोई पुरस्कार नहीं मिलने वाला। पर आश्चर्य यह है कि यही विरोधी गुट खुद की किसी भी आत्मप्रशंसा का कोई मौका नहीं छोड़ रहा। खुद मियां मिट्ठू बने कोई बात नहीं, पर किसी दूसरे ने यदि कर दिया तो वो देश-द्रोही हो गया।


इस माया नगरी का यही जाल है। जो इसमें उलझता है उसे ये नगरी अपनी मिल्कियत लगने लगती है। यहां की दुनिया ने कई रिश्ते बना दिए, कई उजाड़ दिए। जानिए तो इसकी शुरुवात हुई कैसे ?


कहा जाता है सृष्टि का सारा ज्ञान शिव पार्वती के संवादों की वजह से उत्पन्न व प्रसारित हुआ है। अधिकांश ग्रंथों
में इस बात का उल्लेख भी इस श्लोक में मिलता है कि ‘ कैलाश शिखरे रम्ये गौरी प्रच्छति शंकरम्।’- गौरी प्रश्न पूछती हैं और महादेव उसका जवाब देते हैं। केवल उन दोनों के बीच हुआ संवाद उस समय के मीडिया अर्थात शिव के गणों के माध्यम से या सिद्ध ऋषियों की दिव्य दृष्टियों के माध्यम से संसार में
फैलता है। तत्पश्चात प्राचीन काल में ऋषियों व गुरुकुलों के आचार्यों की स्मृति शक्ति ही सोशल मीडिया के रूप में काम करती थी।

हजारों ग्रन्थ और उनके करोड़ों श्लोक ऋषियों ने गुरुकुलों में बैठ कर अपनी स्मृति से ही बोल बोल कर शिष्यों को याद करवाए। कहा जाता है की सर्व प्रथम रामायण महादेव ने लिखी थी जिसमें सौ करोड़ श्लोक थे। राम रक्षा स्त्रोत में ‘चरितं रघुनाथस्य शत कोटि प्रविस्तरं’ के रूप में इसका उल्लेख मिलता है। स्वाभाविक है इतने बड़े बड़े ग्रन्थ जब स्मृति से अगली पीढ़ी तक पहुंचते होंगे तो उसमें कुछ बातें घट या बढ़ जाया करतीं होंगी। कहा जाता है कि महाभारत का मूल नाम “जय” था और इसमें आठ हजार श्लोक थे। जो अब बढ़ते बढ़ते एक लाख हो गए।


इसी प्रकार वाल्मिकी रामायण के बारे में भी कुछ विद्वान् मानते हैं की वाल्मिकी ने श्री राम के राज तिलक के बाद का वर्णन नहीं किया है। जो वर्णन मिलता है वह किसी अन्य के द्वारा जोड़ा गया है।अर्थात उस समय भी सोशल मीडिया या कथाओं के मध्य से मूल प्रसंग, लेखकों के नाम में परिवर्तन कर दिए जाते थे। मजे की बात यह है कि इस प्रकार की गड़बड़ियों की जानकारी उस समय के विद्वानों को भी थी।


इसीलिए देव पूजन के बाद क्षमा
प्रार्थना में आज भी कहा जाता है कि “ हे प्रभु यदि अज्ञान या विस्मृति या भ्रान्ति के कारण मैंने कुछ कम या अधिक कहा हो या कोई अक्षर मात्रा या स्वर अशुद्ध हो गया हो तो उसे क्षमा करो। अर्थात उस समय सूचना का उद्गम सदैव शुद्ध और प्रामाणिक माना
जाता था। पर बाद में विकृति की संभावनाओं को स्वीकार कर लिया गया था। उस समय संस्कृति में विकृति का भय था। आज विकृति को और विकृत कर के हम संस्कृति सुधारने का प्रयास कर रहे हैं।

सूचना देते समय पासवर्ड या कोडवर्ड पहले भी चलते थे। जब अशोक वाटिका में माता जानकी को पवन पुत्र पर विश्वास नहीं हो रहा था तो उन्होंने ‘राम दूत मैं मात जानकी ,सत्य शपथ करुणा निधान की’ इस वाक्य का प्रयोग किया था।इसमें करुणा निधान शब्द पूरी राम चरित मानस में बहुत सीमित स्थानों पर आया है। और वे स्थान केवल राम और सीता के नितांत व्यक्तिगत संवादों के समय के हैं। अर्थात् उस समय करुणा निधान शब्द पासवर्ड के रूप में प्रयोग किया गया था।

अब यही सब यहां भी है।
सत्यता की परख और गलती की माफ़ी। पर हमारे बीच यही गायब हो चूका है। महिलाओं पर इसका गहरा असर हुआ है। ऐसा ही एक और पसंद किया जाने वाला सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म है वाट्स अप। व्यक्तिगत और समूहों में चलाये जाने वाला। इसमें भी खूब विवाद, कहा सुनी, तानाकशी चलती है। परिवार के ग्रुप तक में सदस्यों के ग्रुप बन जाते हैं।

शुभकामनाएं, बधाई तक के शब्दों का हिसाब-किताब होता है। किसी की प्रसिद्धि नागवार गुजरी तो मौन धर लो, किसी पर आशीर्वादों और तारीफों की बाढ़ ला दो। इनमे भी कुछ खास लोग सक्रिय
होते हैं। खुद तो दूसरों की तारीफ़ करते नहीं खुद के लिए पलकें बिछाए बैठते हैं और इज्जत का प्रश्न बना लेते हैं। यही हाल उनका फेसबुक पर भी होता है। परिचित व परिवार जन बहिष्कार करते हैं, ये उनकी जलन निकालने का सर्वोत्तम मार्ग होता है। इसलिए आप बाकी से भी उम्मीद न रखें।

असल में इस सोशल मीडिया से आप केवल जरुरी जानकारी लेने-देने जितना संबंध रखें। इसका अर्थ ही सामाजिकता से जुड़ाव
है न कि व्यक्तिगत। जैसे हाईटेंशन इलेक्ट्रिक लाईन घर के आगे से जा रही है तो क्या उसको आप पकड़ के देखेंगे कि करंट है या
नहीं ? या बिजली से बचने के लिए एहतियात बरतेंगे ? इसमें एक अर्थिंग लाईन भी बाकी सावधानी
के साथ देनी होती है।

 

राजनैतिक पोस्ट से बचने में ही भलाई होती है। इसकी कुर्सी के पाये साम, दाम, दण्ड, भेद होते हैं। हम “पबलिक{पब्लिक}” है जो कई बार कुछ नहीं जानती।

तो मित्रों इन
सब मूर्खताओं से पीछा छुडाओ। सोशल मीडिया की ये टुच्ची हरकतें वास्तविक आनंद और असल मित्रों से आपको दूर करतीं हैं। अव्वल तो जो आपके साथ जीवित, साक्षात, परिजन हैं उनके साथ सुख भोगें। किसने आपको इन पर विश किया, लाईक किया, कमेन्ट किया छोड़ें। इनके चक्कर में आप उन्हें भी खो रहे हैं जो आपके अपने हैं, आपके प्यार को, आपको
प्यार करने को तरस रहे हैं और आपकी ऊंगलियां इस निर्जीव मशीन को सहला रही है। इसी मशीन में छोटों ने जान दे रखी है…। और बड़ों की जान ले रखी है।आप समझें ये केवल रिश्तों को बनाने का साधन है साधक नहीं। इसके केवल फायदों के लिए इस्तेमाल में ही समझदारी है। वर्ना घर-समाज की बर्बादी है… केवल बर्बादी....

सेहत / शौर्यपथ आपको सालों से सिर के नीचे तकिया लगाकर सोने की आदत है, और अगर आप सोचते हैं कि बगैर तकिये के सोने से गर्दन में दर्द हो सकता है, तो आप गलत हैं। बल्कि बगैर तकिये किे सोने से आपको कई तरह के शारीरिक और मानसिक लाभ हो सकते हैं। यदि आप अब तक अनजान हैं, तो जानिए बगैर तकिये के सोने से होते हैं कौन से 5 फायदे -
1 यदि आप अक्सर पीठ, कमर या आसपास की मांसपेशि‍यों में दर्द महसूस करते हैं, तो बगैर तकिये के सोना शुरू कीजिए। दरअसल यह समस्या रीढ़ की हड्डी के कारण होती है, जिसका प्रमुख कारण आपका सोने का तरीका है। बगैर तकिये के सोने पर रीढ़ की हड्डी बिल्कुल सीधी रहेगी और आपकी यह समस्या कम हो जाएगी।

2 सामान्य तौर पर गर्दन और गंधों के अलावा पिछले हिस्से में दर्द आपके तकिये के कारण होता है। बगैर तकिये के सोने पर इन अंगों में रक्त संचार बेहतर होगा और आप दर्द से निजात पा सकेंगे।
3 कई बार गलत तकिये का इस्तेमाल आपको मानसिक समस्या भी दे सकता है। यदि तकिया कड़क है तो यह आपके मस्तिष्क पर बेवजह दबाव बना सकता है जिससे मानसिक विकार की संभावना बढ़ जाती है।

4 विशेषज्ञों का मानना है कि बगैर तकिये के सोना आपको निर्बाध रूप से अच्छी नींद लेने में मदद करता है, और आप बेहतर गुणवत्ता के साथ आरामदायक नींद ले पाते हैं, जिसका असर आपके मूड और स्वास्थ्य पर पड़ता है।

5 यदि आप नींद में अपना चेहरे तकिये की तरफ मोड़कर या तकिये में मुंह डालकर सोते हैं तो यह आदत आपके चेहरे पर झुर्रियां पैदा कर सकती है। इसके अलावा यह तरीका आपके चेहरे पर घंटों तक दबाव बनाए रखता है जिससे रक्त संचार प्रभावित होता है, और चेहरे की समस्याएं उभरती हैं।

 

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