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March 13, 2026
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नगर निगम की राजनीति में ‘पोस्टर से गायब चेहरा’ बन गया नया संकेत;

शहर की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक छिड़ी बहस — क्या टूट रही है सरकार और निगम की साझी तालमेल की डोर?

दुर्ग। शौर्यपथ।

राजनीति में चेहरे बहुत कुछ कह जाते हैं — खासकर तब, जब किसी आयोजन या उत्सव की तस्वीरों में कोई चेहरा जानबूझकर गायब किया गया हो। ऐसी ही एक तस्वीर ने आज दुर्ग की नगर राजनीति में नए विवाद को जन्म दे दिया है। नगर निगम दुर्ग की महापौर श्रीमती अलका बाघमार ने हाल ही में जीएसटी-2 बी फार्मा उत्सव पर सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर करते हुए एक पोस्ट साझा की। लेकिन इस पोस्ट में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उसमें प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री और दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के विधायक गजेन्द्र यादव की तस्वीर नदारद थी — जबकि उसी पोस्ट में दूसरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों को स्थान मिला।

इस एक ‘गायब चेहरे’ ने अब पूरे शहर में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा यही है कि आखिर महापौर और मंत्री के बीच ठंडी जंग क्यों चल रही है?

? क्या यह दूरी सिर्फ राजनीतिक है या व्यक्तिगत भी?

महापौर अलका बाघमार और मंत्री गजेन्द्र यादव, दोनों ही एक ही दल से आते हैं। इसके बावजूद दोनों के बीच संबंधों में रंजिश और दूरी लंबे समय से सुर्खियों में रही है। जानकारों का कहना है कि नगर निगम के कई विकास कार्यों और बजट अनुमोदन के दौरान भी महापौर ने मंत्री की सिफारिशों को नज़रअंदाज़ किया था।

अब जब महापौर ने सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पोस्ट में मंत्री को दरकिनार कर दिया, तो यह संकेत काफी गहरे हैं — मानो यह कहा जा रहा हो कि “निगम अब अपने बूते चलेगा।”

? क्या विकास की गाड़ी अब पटरी से उतर रही है?

शहर की मौजूदा स्थिति इस राजनीतिक खींचतान की कीमत चुका रही है।

मुख्य मार्गों पर फैला कचरा, सड़कों के गड्ढे, जगह-जगह जलभराव, और स्ट्रीट लाइटों के बंद रहने से नागरिक परेशान हैं।

आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या, निर्माण कार्यों की धीमी रफ्तार और भ्रष्टाचार के आरोपों ने नगर निगम की छवि को इतिहास की सबसे बदहाल स्थिति में पहुँचा दिया है।

दीपावली के ठीक पहले ठेकेदारों को बकाया भुगतान में भी भारी कटौती ने हालात और बिगाड़ दिए। ठेकेदारों को “10–20 प्रतिशत” भुगतान कर संतोष कराने की कोशिश हुई, परंतु बाकी राशि के अभाव में कई काम ठप पड़ गए।

? जनता के मन में सवाल – “क्या अकेले महापौर शहर संभाल लेंगी?”

जनता के बीच यह चर्चा तेज है कि अगर महापौर अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरियां बनाए रखेंगी, तो क्या निगम को प्रदेश सरकार का सहयोग मिल पाएगा?

राज्य सरकार की योजनाओं, निधियों और विकास कार्यों में तालमेल आवश्यक है — और यदि यह तालमेल टूट गया, तो उसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।

? “पोस्टर पॉलिटिक्स” का संदेश क्या है?

राजनीति में कहा जाता है कि पोस्टर से गायब चेहरा, रिश्तों की सच्चाई बयान कर देता है।

महापौर की पोस्ट में मंत्री का नाम या तस्वीर शामिल न करना सिर्फ एक सोशल मीडिया घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। यह संदेश साफ है — दुर्ग नगर निगम की प्रमुख अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान गढ़ने के रास्ते पर हैं।

परंतु सवाल यह भी है कि क्या इस स्वतंत्रता का खामियाजा शहर भुगतेगा?

क्या दुर्ग का विकास अब राजनीतिक अहंकार और व्यक्तिगत टकराव के बीच कुर्बान हो जाएगा?

? निष्कर्ष:

दुर्ग की जनता ने महापौर अलका बाघमार को नगर निगम का नेतृत्व इस उम्मीद से सौंपा था कि वे शहर को विकास की नई दिशा देंगी।

परंतु आज शहर की तस्वीर कुछ और कहती है — सड़कों पर गड्ढे हैं, गलियों में अंधेरा है, और सोशल मीडिया पर ‘गायब चेहरे’ की बहस जारी है।

ऐसे में यह सवाल अब और गहरा हो गया है कि —

> “क्या महापौर अलका बाघमार अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरी बनाकर, दुर्ग के विकास की धारा को आगे बढ़ा पाएंगी?”

 

 

दुर्ग। शौर्यपथ।

नगर निगम दुर्ग प्रशासन में एक बार फिर सख्ती के संकेत नजर आ रहे हैं। निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल ने सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी शुभम गोईर को कंप्यूटर के आदान-प्रदान के दौरान उपकरण गायब होने के मामले में 24 घंटे के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का नोटिस जारी किया है। जवाब नहीं देने पर दंडात्मक कार्यवाही के निर्देश दिए गए हैं।

यह नोटिस जारी होने के बाद अब निगम कर्मचारियों में चर्चा का विषय यह बन गया है कि क्या इसी तरह की सख्ती तात्कालिक बाजार अधिकारी थान सिंह यादव पर भी दिखाई जाएगी?

ज्ञात हो कि वर्ष 2021-22 में पार्किंग घोटाले से संबंधित प्रकरण में लगभग ₹80,000 की राजस्व वसूली के लिए तात्कालिक बाजार अधिकारी थान सिंह यादव को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन अब तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इसके अलावा गौरव पथ पर विज्ञापन बोर्ड के गलत साइज और आकलन के मामले में भी थान सिंह यादव का नाम चर्चा में रहा है।

वहीं दूसरी ओर, शुभम गोईर पर बीते तीन-चार महीनों में आयुक्त अग्रवाल द्वारा लगभग डेढ़ दर्जन नोटिस जारी किए जा चुके हैं और वे वर्तमान में निलंबन की स्थिति में हैं। आयुक्त की यह कार्यवाही निगम प्रशासन में अनुशासन की कसावट के रूप में देखी जा रही है।

अब कर्मचारियों के बीच यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या यह सख्ती सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित रहेगी या फिर आयुक्त अग्रवाल निष्पक्ष प्रशासनिक सिद्धांतों का पालन करते हुए विवादित मामलों में शामिल अन्य अधिकारियों पर भी कार्रवाई करेंगे?

फिलहाल, सभी की निगाहें आयुक्त सुमित अग्रवाल के अगले कदम पर टिकी हैं — क्या थान सिंह यादव जैसे विवादित अधिकारी पर भी कार्यवाही होगी या फिर निगम प्रशासन एक बार फिर मौन साध लेगा?

नगर निगम कार्यालय में फिलहाल यही चर्चा जोरों पर है।

दुर्ग।शौर्यपथ ख़ास रिपोर्ट
    दुर्ग नगर पालिक निगम क्षेत्र आज "स्मार्ट सिटी" नहीं बल्कि "गंदगी सिटी" की पहचान से जाना जाने लगा है। जनता ने बड़े भरोसे के साथ भाजपा प्रत्याशी अलका बाघमार को महापौर और निगम की कमान सौंपी थी, परंतु अब यही जनता गंदगी, कचरे और दुर्गंध से जूझ रही है।

महापौर की पोस्टरबाज़ी बनाम जनता की नाराज़गी

   महापौर अलका बाघमार ने चुनाव से पहले स्वच्छ और व्यवस्थित दुर्ग का सपना दिखाया था। लेकिन सत्ता में आते ही उनका ध्यान जनता की समस्याओं से हटकर केवल पोस्टरबाज़ी और उत्सवों की राजनीति तक सिमट गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर "स्वच्छता सेवा पखवाड़ा" का आयोजन कर निगम शहर को स्वच्छ बताने की कोशिश कर रहा है, जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि हर गली और मोहल्ले में गंदगी और बदबू ने डेरा जमा लिया है। जनता पूछ रही है—"पोस्टर से पेट नहीं भरता और बदबू से जीना दूभर है, महापौर साहिबा ये कैसा सुशासन?"

स्वास्थ्य प्रभारी नीलेश अग्रवाल: अनुभवहीनता का प्रतीक

  महापौर ने सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी निगम के स्वास्थ्य प्रभारी नीलेश अग्रवाल को सौंपी है। लेकिन अग्रवाल का प्रदर्शन शहर के लिए निराशाजनक और शर्मनाक रहा है। शहर के प्रमुख स्थानों—पुलिस अधीक्षक का बंगला, छात्रावास, गर्ल्स हॉस्टल और आम नागरिकों के ठहरने-बैठने वाले स्थानों तक—हर जगह कचरे के ढेर लगे हुए हैं। नालियों से निकलती दुर्गंध और सड़कों पर बिखरे कचरे ने नागरिकों का जीना मुश्किल कर दिया है। स्वास्थ्य प्रभारी की भूमिका केवल बैठकों और बातों तक सीमित रह गई है।
  जनता कह रही है कि अगर पहली बार विधायक बने और शिक्षा मंत्री का पद संभालते ही गजेंद्र यादव सक्रियता से शिक्षा विभाग में नई ऊर्जा ला सकते हैं, तो फिर पहली बार पार्षद बने नीलेश अग्रवाल सफाई व्यवस्था में ऐसा असफल क्यों साबित हो रहे हैं? इसका जवाब शायद निगम की राजनीति के गलियारों में छिपा है।

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की सोच को आईना

   प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार "सुशासन" और "स्वच्छ भारत" की बात करते हैं। लेकिन उनके ही नाम पर चुनी गई शहरी सरकार जब गंदगी और बदबू फैलाने में अव्वल साबित हो रही है, तो यह न केवल शहर की छवि धूमिल कर रहा है बल्कि प्रदेश और केंद्र सरकार की सोच को भी कटघरे में खड़ा कर रहा है।

सामान्य सभा की अग्निपरीक्षा

   अब पूरा शहर इस बात पर नज़र गड़ाए बैठा है कि दुर्ग नगर निगम की आगामी सामान्य सभा में क्या जनप्रतिनिधि जनता के स्वास्थ्य और सफाई जैसे गंभीर मुद्दे पर सवाल उठाएंगे? या फिर मौन रहकर केवल सत्ता सुख का आनंद लेंगे?

कटाक्ष :

"शहर डूबा कचरे में, पोस्टरों में चमक रही सरकार!"
"जनता मांगे सफाई, निगम दे रहा बदबू की कमाई!"
"अलका बाघमार की निष्क्रियता और नीलेश अग्रवाल की अनुभवहीनता ने दुर्ग को बना दिया बदबूगंज!"

रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के औद्योगिक विकास और वैश्विक निवेश को नई दिशा देने के उद्देश्य से प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय 10 दिवसीय विदेश यात्रा पर आज जापान और दक्षिण कोरिया के लिए रवाना हुए। मुख्यमंत्री के पदभार संभालने के 18 माह बाद यह उनकी पहली विदेश यात्रा है, जिसे प्रदेश के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
  मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जापान के ओसाका में आयोजित वर्ल्ड एक्सपो में शामिल होंगे तथा वहां इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल्स और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने का प्रयास करेंगे। इन क्षेत्रों में जापान और दक्षिण कोरिया दोनों ही देश वैश्विक स्तर पर अग्रणी हैं और छत्तीसगढ़ में इन क्षेत्रों में उद्योगों के लिए अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
   पत्रकारों से चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि नई औद्योगिक नीति के अंतर्गत अब तक करीब 6.30 लाख करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) हो चुके हैं। इनमें से कई परियोजनाओं पर काम भी प्रारंभ हो चुका है और शेष को भी शीघ्र गति दी जाएगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इन निवेश प्रस्तावों के जरिए प्रदेश में न केवल औद्योगिक ढांचा मजबूत होगा, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा –
"छत्तीसगढ़ में अपार संभावनाएं हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल्स और फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में हम राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर छत्तीसगढ़ को एक नई पहचान दिलाएंगे। हमारी कोशिश है कि यहां के संसाधनों और क्षमता को उद्योगों के माध्यम से विकास का मजबूत आधार बनाया जाए।"
प्रदेश सरकार की नई औद्योगिक नीति निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल प्रदान कर रही है, जिसके चलते देश-विदेश की प्रमुख कंपनियां छत्तीसगढ़ की ओर आकर्षित हो रही हैं। मुख्यमंत्री की इस यात्रा से प्रदेश और एशियाई औद्योगिक महाशक्तियों—जापान व दक्षिण कोरिया—के बीच आर्थिक सहयोग और निवेश की नई राह खुलने की संभावना प्रबल हो गई है।
  छत्तीसगढ़, जो अब तक अपनी खनिज संपदा और कृषि उत्पादन के लिए देशभर में प्रसिद्ध रहा है, अब उच्च तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग और वैश्विक औद्योगिक साझेदारी का नया केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की यह विदेश यात्रा निश्चित ही प्रदेश के औद्योगिक एवं आर्थिक भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित होगी।

20 अगस्त को तीन नए चेहरों ने ली शपथ, विभाग भी आवंटित — पूर्व CM बोले, कांग्रेस सरकार को नहीं मिली थी अनुमति, अब भाजपा ने कैसे कर लिया विस्तार?

रायपुर। शौर्यपथ ।
   छत्तीसगढ़ की राजनीति एक बार फिर गरमाती दिख रही है। प्रदेश में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मुख्यमंत्री के साथ कुल 14 मंत्रियों की सरकार अब सत्ता संचालन कर रही है। 20 अगस्त को शपथ ग्रहण के साथ ही तीन नए चेहरों – दुर्ग से गजेंद्र यादव, आरंग से गुरु खुशवंत सिंह एवं सरगुजा संभाग से राजेश अग्रवाल – को कैबिनेट मंत्री बनाया गया और देर शाम इन्हें विभाग भी आवंटित कर दिए गए।
लेकिन, इस विस्तार के तुरंत बाद प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “मौजूदा मंत्रिमंडल अवैधानिक है।” बघेल के मुताबिक, कांग्रेस सरकार ने 2018 से ही 14 मंत्री शामिल करने की कोशिशें की थीं और इस विषय को न केवल विधानसभा में उठाया गया बल्कि केंद्र को भी प्रस्ताव भेजा गया था, मगर तत्कालीन केंद्र शासन ने अनुमति नहीं दी।
   अब सवाल यह उठ रहा है कि भाजपा सरकार ने किस आधार पर 14 मंत्रियों का मंत्रिमंडल गठित किया और क्या इसे केंद्र की औपचारिक मंजूरी मिली है?
"हरियाणा मॉडल" की तर्ज पर छत्तीसगढ़
   सूत्र बताते हैं कि राज्य में "हरियाणा मॉडल" अपनाते हुए 14 सदस्यों की कैबिनेट बनाई गई है। लेकिन पूर्व CM के आरोपों ने यह बहस शुरू कर दी है कि क्या इस मॉडल को प्रदेश में लागू करने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया पूरी की गई है, या फिर यह सिर्फ़ राजनीतिक प्रयोग है?
सियासी गर्माहट और आने वाले सवाल
   भूपेश बघेल के बयान के बाद से कांग्रेस हमलावर है और भाजपा को इस पर स्पष्टीकरण देना होगा कि आखिर अब जो संख्या बढ़ाई गई, उसकी संवैधानिक वैधता क्या है। प्रदेश की सियासत में अब चर्चाओं का नया दौर शुरू हो गया है—“क्या राज्य सरकार ने केंद्र की मंजूरी लेकर ही यह कदम उठाया है या फिर यह निर्णय सिर्फ़ राजनीतिक दबाव और दिखावे के तहत लिया गया?”
आगे की राजनीतिक दिशा
  एक तरफ भाजपा सरकार अपने नए मंत्रियों के साथ प्रशासनिक गति पकड़ने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इस “ग़ैरक़ानूनी मंत्रिमंडल” के मुद्दे पर आर-पार की लड़ाई की रणनीति बना रहा है। आने वाले दिनों में इस मसले पर न केवल विधानसभा में तेज़ हलचल देखने को मिलेगी, बल्कि प्रदेश की जनता भी सरकार और विपक्ष दोनों की राजनीतिक चालों पर कड़ी नज़र बनाए रखेगी।
? यह खबर राजनीतिक निहितार्थों से भरपूर है और सीधे तौर पर जनता के विश्वास बनाम संवैधानिक वैधता की बहस खड़ी करती है।

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