August 01, 2026
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    आंखें दिखाता नेपाल

    • rounak group

    मेल बॉक्स / शौर्यपथ / भारत की सख्त आपत्ति के बावजूद नेपाल ने अपने नए नक्शे पर राष्ट्रपति की मंजूरी ले ली। अब यह नेपाल के संविधान का दस्तावेजी हिस्सा बन गया है। इससे भारत के तीन बड़े हिस्से कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा नेपाल के मानचित्र में जुड़ गए हैं। सवाल यह है कि नेपाल जैसा पड़ोसी देश आखिर क्यों भारत के लिए चुनौतियां खड़ी कर रहा है? रणनीतिकारों की मानें, तो अब नेपाल से भी हमारा सीमा-विवाद शुरू हो गया है। इसका अर्थ है कि वह भी पाकिस्तान और चीन की तरह हमारे लिए खतरा बन सकता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि नेपाल ने चीन के उकसावे में यह सब किया है, लेकिन भारत को नेपाल के इस दुस्साहस का गंभीरता से जवाब देना चाहिए। अगर आज कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तो बाद में उन हिस्सों पर हम अपना दावा कमजोर कर लेंगे। हमारी सरकार को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। देश हर कदम पर उसके साथ खड़ा है।
    मोहम्मद आसिफ
    जामिया नगर, दिल्ली

    लंबी लड़ाई की तैयारी
    इस सदी की सबसे भयावह बीमारी कोविड-19 ने भारत ही नहीं, पूरे विश्व को अव्यवस्थित कर दिया है। विश्व की बड़ी से बड़ी आर्थिक ताकतें भी इसके सामने घुटने टेक चुकी हैं। अनिश्चितता के इस माहौल में जब सभी के मन में खौफ है और भविष्य के प्रति चिंता, तो हमें छोटी-छोटी खुशियों में ही जिंदगी को समेटना चाहिए। जिंदगी क्या है और कैसी है, यह इसी पर निर्भर करता है कि हम इसे जीते कैसे हैं? इसीलिए इस सदी का यह अनुभव जरूर त्रासद है, लेकिन ऐतिहासिक और मूल्यवान भी है। सरकारों द्वारा आधिकारिक और प्रशासनिक स्तर पर सामान्य जीवन में संतुलन बनाने के साथ-साथ देश और समाज को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं, वे न केवल सबक हैं, बल्कि आने वाले कल के लिए संजीवनी बूटी का काम करेंगे। साफ है कि हम एक मैराथन में दौड़ रहे हैं। हमें आने वाले दिनों, महीनों और संभवत: सालों के लिए भी तैयार रहना होगा।
    सत्या नारायण पोद्दार

    गंभीर विमर्श जरूरी
    मशहूर अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का विचलित कर देने वाला आत्मघाती कदम सुर्खियों में है। निस्संदेह असफलताओं के चौराहे पर खड़े इंसान के लिए मौत का रास्ता आसान लगता है। मगर सफलता-असफलता छोटी हो या बड़ी, उसे आत्महत्या की वजह मान लेना सही नहीं। आत्महत्या पर होने वाली सार्वजनिक बहसों से अलग हमें उन कारणों को टटोलना होगा कि आत्महत्या जैसे कठोर कदम से लोग बच सकें। आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 15 प्रतिशत लोग हर वर्ष आत्महत्या करते हैं, जिसमें सभी लिंग, उम्र व आय के लोग शामिल हैं। निस्संदेह, मनोवैज्ञानिकों को ऐसे लोगों के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी उठानी होगी। देश में एक ऐसा माहौल तैयार किया जाना चाहिए कि लोग अपनी छोटी-बड़ी, सभी समस्याओं पर बेझिझक विमर्श कर सकें।
    एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड

    बढ़ता रुतबा
    192 देशों में से 184 का समर्थन पाकर भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का फिर से अस्थाई सदस्य बन गया है। यह उपलब्धि भारत को यूं ही नहीं मिली है। जिस तरीके से हमने पूरे विश्व को अपना मानकर सभी के साथ भाईचारे की मिसाल पेश की है, उसी के कारण हमारा इतना रुतबा बढ़ा है। भारत हमेशा से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ में भरोसा रखता है और सभी देशों को एक परिवार मानता है। इसीलिए कोरोना-संक्रमण काल में भी हमने सभी जरूरतमंद देशों को दवा भेजी। इन्हीं सब कारणों से आज हम इस हैसियत में हैं कि सभी देश हमारी ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। यह हमारे लिए सुखद स्थिति है।
    नीरज कुमार पाठक, नोएडा

     

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