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नजरिया / शौर्यपथ / बादलों के तूफान के रूप में इकट्ठा होने से आकाशीय बिजली बनने की शुरुआत होती है। बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े और बेहद ठंडे पानी की बूंदें आपस में टकराते हैं और इनके बीच विपरीत ध्रुवों के विद्युत कणों का प्रवाह होता है। वैसे तो, धन और ऋण एक-दूसरे को चुंबक की तरह अपनी ओर आकर्षित करते हैं, किंतु वायु के अच्छा संवाहक न होने के कारण विद्युत आवेश में बाधाएं आती हैं। अत: बादल की ऋणावेशित निचली सतह को छूने के प्रयास करती धनावेशित तरंगें भूमि पर गिर जाती हैं। चूंकि धरती विद्युत की सुचालक है। यह बादलों के बीच की परत की तुलना में अपेक्षाकृत धनात्मक रूप से चार्ज होती है। तभी इस तरह पैदा हुई बिजली का कुछ प्रवाह धरती की ओर हो जाता है। भारत में हर साल करीब 2,000 लोग इस तरह बिजली गिरने से मारे जाते हैं। मवेशियों और मकान आदि का भी नुकसान होता है।
गुरुवार को बिहार और उत्तर प्रदेश के अनेक हिस्सों में बिजली गिरी और करीब 125 लोग मारे गए। यह एक असामान्य घटना है। अमेरिका में हर साल बिजली गिरने से औसतन 30 और ब्रिटेन में तीन लोगों की मृत्यु होती है, जबकि भारत में यह आंकड़ा बहुत अधिक है। इसका मूल कारण यह है कि हमारे यहां आकाशीय बिजली गिरने के पूर्वानुमान व चेतावनी की व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है। आंकडे़ गवाह हैं कि हमारे यहां बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में बिजली गिरने की घटनाएं ज्यादा होती हैं, और आमतौर पर दिन में ही लोग इसके शिकार बनते हैं। यदि तेज बरसात हो रही हो और बिजली कड़क रही हो, तो ऐसे में पानी भरे खेत के बीच में, किसी पेड़ के नीचे, और पहाड़ी स्थान पर जाने से बचना चाहिए। मोबाइल का इस्तेमाल भी खतरनाक होता है।
हमें यह समझना होगा कि इस तरह बहुत बडे़ इलाके में एक साथ घातक बिजली गिरने का असली कारण धरती का लगातार बदल रहा तापमान है। पहले आषाढ़ महीने में बहुत भारी बारिश नहीं होती थी, लेकिन अब बहुत थोड़े समय में जोरदार बारिश का होना और सावन-भादों का सूखा रह जाना, जलवायु परिवर्तन का त्रासद नतीजा है। एक बात और। बिजली गिरना जलवायु परिवर्तन का दुष्परिणाम तो है ही, इसके अधिक गिरने से जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को भी गति मिलती है। सनद रहे, बिजली गिरने के दौरान नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है और यह एक घातक ग्रीन हाउस गैस है। हालांकि, अभी बिजली गिरने और जलवायु परिवर्तन पर उसके प्रभाव को लेकर शोध कम हुए हैं, पर कई शोध इस बात को स्थापित करते हैं कि जलवायु परिवर्तन ने बिजली गिरने के खतरे को बढ़ाया है। इस दिशा में गहराई से काम करने के लिए ग्लोबल क्लाइमेट ऑब्जर्विंग सिस्टम के वैज्ञानिकों ने विश्व मौसम विज्ञान संगठन के साथ मिलकर एक विशेष शोध दल का गठन किया है। पर जलवायु परिवर्तन के बारे में हुए अध्ययनों से पता चला है कि यदि जलवायु में अधिक गरमाहट हुई, तो गरजदार तूफान कम, तेज आंधियां ज्यादा आएंगी और हर एक डिग्री ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती तक बिजली की मार की मात्रा 10 फीसदी तक बढ़ सकती है।
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले के वैज्ञानिकों ने वायुमंडल को प्रभावित करने वाले अवयवों और बिजली गिरने के बीच के संबंध पर एक शोध मई 2018 में प्रारंभ किया था। उनका आकलन था कि आकाशीय बिजली के लिए दो प्रमुख अवयवों की आवश्यकता होती है : तीनों अवस्थाओं (तरल, ठोस व गैस) में पानी और बर्फ बनाने से रोकने वाले घने बादल। वैज्ञानिकों ने 11 जलवायु मॉडल पर प्रयोग किए और पाया कि भविष्य में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में गिरावट आने से रही, अत: आकाशीय बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ेंगी।
एक और गौर करने की बात यह है कि अभी जिन इलाकों में बिजली गिरी है, उनमें से बड़ा हिस्सा धान की खेती का है और जहां धान के लिए पानी को एकत्र किया जाता है, वहां से ग्रीन हाउस गैस जैसे मीथेन का उत्सर्जन अधिक होता है। मौसम जितना अधिक गरम होगा, ग्रीन हाउस गैसें जितनी उत्सर्जित होंगी, उतनी ही अधिक बिजली ताकत के साथ धरती पर गिरेगी। साफ है, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण व जलवायु परिवर्तन पर काबू न पाया गया, तो समुद्री चक्रवातों, बिजली गिरने, बादल फटने जैसी भयावह त्रासदियां बढ़ती ही जाएंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
