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नजरिया / शौर्यपथ / सब उन्हें मास्टर जी कहते थे और कुछ खास चाहने वाले माई। हिंदी फिल्मों में एक ऐसा दौर भी था, जब कोरियोग्राफर सरोज खान का ओहदा सितारों से कहीं ज्यादा था। उनके बारे में कई कहानियां सुनने को मिलती थीं। कैसे उन्होंने ठीक से स्टेप न करने पर नामी हीरोइन के पैर में डंडा मार दिया, कैसे लगातार चार दिन रिहर्सल करवाकर एक नवोदित हीरोइन को अस्पताल पहुंचा दिया वगैरह-वगैरह। मेरे मन में बनी एकदम कड़क डांस मास्टर की छवि उस दिन टूट गई, जब मैं पहली बार प्रेम फिल्म (1990) के डांस रिहर्सल पर उनसे मिलने जुहू (मुंबई) पहुंची।
सरोज खान अपनी टीम के साथ हंस रही थीं, चाय पी रही थीं और चुटकुले सुना रही थीं। मुझे देखते ही उन्होंने सवाल किया, ‘मेरे बारे में क्या सुनकर आई हो?’ एक ठहाके के साथ सुनी-सुनाई कहानियां हवा हो गईं। मेरे सामने थीं सालों के संघर्ष से तपकर निखरी एक कद्दावर डांस कोरियोग्राफर, जिसने कलाकारों को यह सबक दिया कि जब तक चेहरे पर नृत्य नहीं झलकेगा, दर्शकों के अंदर नहीं उतरेगा। उन दिनों मिस्टर इंडिया का हवा-हवाई और तेजाब का एक-दो-तीन गाना मशहूर हो चुका था। सरोज खान का जादू चल निकला था। पर वह अपनी सफलता से बहुत प्रभावित नहीं लग रही थीं। उन्होंने मुझे इसे यूं समझाया, ‘मैं तीन साल की उम्र से इंडस्ट्री में काम कर रही हूं। पर अब जाकर मुंबई में अपना घर खरीद पाई हूं। मेरे लिए यह सबसे बड़ी सफलता है।’
हिंदी फिल्मों में डांस कोरियोग्राफी का दूसरा दौर सरोज खान से शुरू होता है। पहले दौर में तमाम डांस कोरियोग्राफर पुरुष हुआ करते थे। सरोज खान के लिए इस पुरुष प्रधान क्षेत्र में अपने आपको साबित करना आसान नहीं था। पर बिना संकोच के वह कहती थीं, ‘मुझे इसलिए भी दूसरों से बेहतर काम करना था, क्योंकि सब मानकर चल रहे थे कि एक औरत सितारों को नचा नहीं पाएगी। मुझे टफ बनना पड़ा। मैं अंदर से बिल्कुल सख्त नहीं हूं। बात-बात पर हंसती हूं, रो पड़ती हूं। पर सबके सामने ऐसा करूं, तो मुझे काम कौन देगा?’
सरोज खान का पैदाइशी नाम था निर्मला नागपाल। बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से मुंबई आ गया। गुजारे के लिए पिता ने तीन साल की बेटी को फिल्मों में बाल कलाकार बना दिया। फिल्मों में बैक ग्राउंड डांसर बनने के लिए निर्मला डांस मास्टर बी सोहनलाल से डांस सीखने लगीं। उन्होंने ही उनका नाम बदलकर सरोज रखा। जब वह तेरह साल की थीं, सोहनलाल ने एक दिन उनके गले में काले रंग की माला डालने के बाद कह दिया, आज से तुम मेरी पत्नी हुई। सोहनलाल की उम्र उस समय 41 साल थी। उनसे अलग होने के बाद सरोज ने सरदार रोशन खान से निकाह कर लिया था। सरोज खान को अपने अतीत को लेकर कोई शिकायत नहीं थी। वह कहती थीं, ‘मेरी जिंदगी का सफर कभी सीधा नहीं रहा। दो शादी, तीन बच्चे, यह संघर्ष, ये सब शायद पहले से लिखा था। अगर ऐसा न होता, तो पूरी जिंदगी बैक ग्राउंड डांसर बनकर काट देती। कभी एक सफल कोरियोग्राफर नहीं बन पाती।’
डांस मास्टर सोहनलाल ने ही सरोज खान को यह मंत्र दिया था, कोई भी काम आधे मन से मत करो। सरोज ने कभी अपने काम के साथ समझौता नहीं किया। हिंदी फिल्मों की दो बड़ी नायिकाओं को उन्होंने बेहतरीन डांस स्टेप्स दिए और एक तरह से वह उनकी गुरु मां बन गईं। श्रीदेवी से मिलने से पहले सरोज खान का कोई वजूद नहीं था। हिम्मतवाला में श्रीदेवी को देखने के बाद उनकी दिली तमन्ना थी श्रीदेवी के साथ काम करने की। उनकी यह इच्छा सुभाष घई की कर्मा में पूरी हुई। श्रीदेवी ने ही मिस्टर इंडिया में हवा-हवाई गाना उनसे करने को कहा। इस गाने ने श्रीदेवी के साथ-साथ सरोज खान को भी सितारा बना दिया। श्रीदेवी उन्हें माई कहती थीं, सरोज खान भी उन्हें बेटी मानती थीं। ऐसा ही रिश्ता उनका माधुरी दीक्षित के साथ था। ये दोनों नायिकाएं सरोज खान के हर स्टेप और मूवमेंट को भव्यता के साथ पेश करती थीं। इन दोनों की कामयाबी में सरोज खान के करामाती स्टेप्स का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
नब्बे के दशक के लगभग हर बड़े सितारे के साथ सरोज खान ने काम किया। बाजीगर में शाहरुख खान का फेमस दोनों हाथ फैलाने वाला आइकॉनिक मूव भी सरोज खान ने ही दिया है।जयंती रंगनाथन,कार्यकारी संपादक,
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
