July 24, 2026
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    जब मां ने बेच दिए अपने गहने

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    मेरी कहानी / शौर्यपथ / उस पढ़ाई को छूट जाना था, जिसमें कामयाबी दूर-दूर तक नहीं दिख रही थी। मैट्रिक में दो बार फेल होकर समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे पास हुआ जाए? मन पढ़ाई में कैसे रमाया जाए? मन इतना चंचल था कि जिधर आवाज होती, उधर भाग लेता और एक बार भाग जाता, तो उसे लौटाने में बहुत जोर आता। अपनी पढ़ाई बोझिल और दुनिया के अन्य तमाम विषय दिलचस्प लगते थे। ले-देकर गणित की किताबों में मन ठहरता था, क्योंकि वहां डोर सुलझी हुई थी। एक बार तरीका पता चल गया, तो प्रश्न हल करते बढ़ते चलो, पर बाकी विषय पहाड़ थे। काश! एक ही विषय की परीक्षा होती, तो सफलता कदम चूमती, लेकिन यहां अनेक विषय मिलकर गणित की कमाई पर पानी फेर देते थे। छवि बन गई थी कि इस लड़के का मन पढ़ाई में नहीं लगता, गांव से शहर गया, लेकिन वहां भी फेल!
    ऊपर से भाग्य ने भी पीठ दिखा दी, असमय ही पिता का साया उठ गया। गांव लौटना पड़ा। उम्र में 18वां साल लग चुका था और दिखने लगा था कि अब आगे की पढ़ाई पर पूर्ण विराम लग जाएगा। शहर में रहने, आने-जाने और परीक्षा फीस इत्यादि का बोझ भारी था। ये ऐसे बड़े खर्चे थे, जिनके सामने घुटने टेक देना तय लग रहा था। पर एक दिन मां अपना पूरा उत्साह समेटे सामने आ खड़ी हुई, ‘चल, बांध अपना सामान। परीक्षा के दिन आ रहे हैं, इस बार तुझे सफल होना ही है’।
    बेटा स्तब्ध था। मां ने आंचल से रुपये निकाले और बेटे की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘ले तेरी यात्रा का खर्च और परीक्षा की फीस’।
    सवाल वाजिब था, ‘अम्मा, कहां से आए पैसे?’
    मां ने अपने को समेटते हुए नजरें झुकाए कहा, ‘मैंने अपने बचे हुए गहने बेच दिए, तेरी पढ़ाई सबसे जरूरी है’।
    पिता के गुजर जाने के बाद टूटी हुई मां की सूनी आंखों में झांकते हुए बेटा भाव में बह चला। उसके दो बार फेल होने के बावजूद मां का विश्वास कायम है। वह अपनी सबसे गाढ़ी पूंजी बेटे की पढ़ाई पर लगा रही है। मां का यह रूप देख बेटा मानो हठात् नींद से जाग गया। वह ऐसी प्यारी मां की उम्मीद को दो बार से तोड़ रहा है और अब भी उलझनें इतनी हैं कि तीसरी बार भी तोड़ने की तैयारी लगती है। मां अपने जेवर बेचकर खड़ी है कि बेटा पास कर जाए, आगे पढ़ाई करके कुछ बन जाए और बेटा है कि अपने मन को काबू में नहीं रख सकता। जहां पूरी जिंदगी दांव पर लगी हो, वहां एक परीक्षा परेशान कर रही है? बेटे का मन धिक्कार उठा। कुछ पल की भाव-प्रबल खामोशी के बाद मन ने ठान लिया और बोल पड़ा, ‘अम्मा, मुझे नाम कमाना होगा, तभी मेरा जीवन सार्थक होगा।’
    बेटे की अच्छी पढ़ाई के लिए मां का समर्पण नया नहीं था। अब बेटे की समझ में आ रहा था कि कैसे वह घर से भाग रहा था। पांच साल पहले, दूर काशी पहुंचकर केले बेच पैसे कमाने की योजना थी। स्कूल से लौटने में देरी हुई, तो मां खोज में दौड़ पड़ी थी और भागते बेटे को पकड़ लाई थी और समझाया था कि गरीबी से मत घबरा, सिर्फ पढ़ाई से मन लगा। तब बात बेटे की समझ में नहीं आई थी, पर जब मां ने अपने गहने बेच दिए, तब बेटे का हौसला इतना फौलादी हो गया कि जिंदगी में कभी फेल होने या कभी हारने की गुंजाइश ही नहीं बची। कामयाबी का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले मैट्रिक और उसके बाद मेडिकल कॉलेज, लेकिन दुर्भाग्य ने भी पीछा नहीं छोड़ा। उष्णकटिबंधीय स्पू्र नामक छोटी आंत में होने वाली बीमारी की वजह से पहले बडे़ भाई और फिर छोटे भाई की जान गई। दृढ़ता और बढ़ी कि मेडिकल की पढ़ाई और शोध के जरिए इस बीमारी का इलाज खोजना है। भारत में रिसर्च की सुविधा नहीं थी। विदेश जाना मजबूरी थी। 1923 में मां के लाल येल्लाप्रगडा सुब्बाराव निकल चले कुछ कर गुजरने।
    अमेरिका में जहां एक ओर संघर्ष का कारवां था, वहीं दूसरी ओर था, उपलब्धियों का चमकदार सिलसिला। पहले फोलिक एसिड, एंटी-फोलिक एसिड, एटीपी-एनर्जी फॉर लाइफ, फोसफॉस मैथड, फिलारियासिस, विटामिन बी12 इत्यादि अनेक आधारभूत उपलब्धियों को सुब्बाराव (1895-1948) ने अंजाम दिया। प्रचार से हमेशा दूर रहने वाले संकोची सुब्बाराव 25 वर्ष लगातार अमेरिका में विज्ञान की सेवा करते रहे। भाइयों को जो रोग दुनिया से ले गया था, उसके इलाज की खोज के साथ ही कैंसर के इलाज- कीमोथेरेपी की भी बुनियाद सुब्बाराव के खाते में दर्ज है। वह भारत लौटने का सपना संजोए महज 53 की उम्र में दुनिया से चले गए। उनके निधन के बाद एक अखबार ने लिखा, ‘वह सदी के सबसे प्रख्यात चिकित्सा दिमागों में से एक थे’, तो किसी ने भारत मां के उस लाल को सम्मान से नवाजते हुए दर्ज किया, ‘बौनों के बीच कद्दावर’।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याययेल्लाप्रगडा सुब्बाराव, प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक

     

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