July 24, 2026
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    बढ़ती घरेलू हिंसा

    • rounak group

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / कोरोना वायरस धीरे-धीरे पूरे देश में अपने पैर पसार चुका है। इससे राष्ट्र एकजुट होकर जरूर लड़ रहा है, लेकिन कई दूसरी समस्याएं भी अब पैदा होने लगी हैं। ऐसी ही एक समस्या है, घरेलू हिंसा। हालांकि, जब हम घरेलू हिंसा की बात करते हैं, तो हमारे सामने असहाय महिलाओं का दृश्य कौंध जाता है। लेकिन आज तस्वीर कुछ अलग है। इससे आज घर-परिवार के छोटे-बड़े सभी लोग प्रभावित हैं। अब इसके दायरे में बड़े-बुजुर्ग भी आ गए हैं। लंबे समय तक चले लॉकडाउन में घरेलू हिंसा के मामलों में चौंकाने वाली बढ़ोतरी हुई है। इसकी एक वजह बढ़ता मानसिक तनाव है, जिसके कारण घर में क्लेश बढ़ गया है। घरेलू हिंसा सदा से ही समाज के लिए अभिशाप रही है, लेकिन कोरोना काल में इसमें वृद्धि शर्मनाक है। इससे पार पाने के उपाय गंभीरता से किए जाने चाहिए।
    विकास सिंह बघेल , दिल्ली

    याद आएंगे वे दिन
    एनालॉग यानी एंटीना की सहायता से दूरदर्शन देखना अब संभव नहीं रहा। वर्षों से इसी तरह प्रसारित हो रहा दूरदर्शन का मुख्य चैनल अब अचानक बंद कर दिया गया है। इससे एक स्वर्णिम पल इतिहास बन गया। चूंकि अधिकतर लोगों के पास डिश होने की वजह से एंटीना का कम इस्तेमाल हो रहा था, इसलिए यह कदम उठाया गया है, लेकिन दूर-दराज और पहाड़ी इलाकों में अब भी साधारण एंटीना मुख्य विकल्प है। ऐसे में, एनालॉग सर्विस बंद करने की बजाय कुछ और उपाय निकाले जाने चाहिए थे। संभव हो, तो यह सेवा फिर से शुरू की जाए, ताकि एंटीना से भी लोग दूरदर्शन को देख सकें। दूरदर्शन की ताकत ही यही है कि इसकी पहुंच देश के हर घर में है, इसीलिए इसे सिर्फ डिश के माध्यम से प्रसारित किए जाने से न सिर्फ इसकी पहुंच कम होगी, बल्कि जनता की यह आवाज भी कमजोर पड़ जाएगी।
    विवेक भारद्वाज, विष्णु धाम, सहारनपुर

    रक्षा-सूत्र का बंधन
    राखी का त्योहार नजदीक है। यह पावन पर्व भाई और बहन के आपसी अटूट प्रेम को दर्शाता है, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में यह त्योहार भी अपनी सार्थकता खोता दिख रहा है। दूसरे त्योहारों की तरह राखी में भी अब दिखावा ज्यादा होने लगा है। रक्षा-सूत्र का बंधन सिर्फ एक धागा नहीं, बल्कि भाई और बहन के अटूट स्नेह व विश्वास का भरोसेमंद बंधन है, जो आज के दौर में कई बार औपचारिकता का निबाह भर लगता है। दिक्कत यह है कि हमारा आपसी प्रेम-व्यवहार सिर्फ मोबाइल और ऑनलाइन संदेशों तक सीमित होता जा रहा है। एक शहर में रहकर भी हम इतने व्यस्त हो जाते हैं कि मिलने का वक्त भी कथित तौर पर नहीं निकाल पाते। इस बार हमें इस सोच से पार पाना चाहिए। आपसी स्नेह जागृत करते हुए हम रिश्तों में गुम हो चुकी मिठास को फिर से पा सकते हैं। इससे इस पावन पर्व की सार्थकता भी बनी रहेगी और रक्षा-सूत्र का मान भी बढ़ेगा।
    माधुरी शुक्ला
    सारनाथ, वाराणसी

    एप पर प्रतिबंध
    विश्व के सभी देशों को समझ लेना चाहिए कि भारत जितना नरम और शांतिप्रिय देश है, उतना ही सख्त भी है। चीन के अति-आत्मविश्वास को चूर-चूर करने के लिए हमारी सरकार ने एक और सराहनीय कदम उठाया है। जून माह में चीन के 59 एप पर पाबंदी लगाई गई थी और अब देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिहाज से उसके 47 अन्य एप पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इन एप को प्रतिबंधित करके सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ की उड़ान को और ऊंचाई दी है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस प्रतिबंध से भारतीय एप और नवाचार कंपनियों के लिए नए-नए मार्ग खुलेंगे, जिससे उन्हें वैश्विक स्तर पर अधिक से अधिक अपना कौशल दिखाने और कारोबार बढ़ाने का मौका मिलेगा।
    अमन जायसवाल, दिल्ली

     

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