July 24, 2026
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    सदियों से पड़े पत्थरों पर चोट करते प्रेमचंद

    • rounak group

    नजरिया / शौर्यपथ / प्रेमचंद को कैसे पढ़ें? यह सवाल इसलिए जरूरी है कि प्रेमचंद को पढ़ने की इतनी दृष्टियां, विचार और उठा-पटक है कि इन सबके बीच मूल प्रेमचंद छिप से जाते हैं। जब से प्रेमचंद ने लिखना शुरू किया, विवाद उनके पीछे लगे रहे। कोई कहेगा कि ग्राम जीवन तो ठीक, शहरी जीवन प्रेमचंद से नहीं सधता। कोई कहेगा, समाज का बाहरी स्वरूप तो है, मन की जटिलताओं की समझ नहीं है। कोई कहेगा, स्त्री मन की समझ नहीं है। उन पर बहुतेरे हमले भी हुए, मगर यह तय है कि शताब्दियों से जिनका जीवन व संघर्ष साहित्य से बहिष्कृत था, उन्हें वह साहित्य के दायरे में ले आए। साहित्य के परिसर में सूरदास, होरी, धनिया, दुक्खी, मंगल, गंगी, घीसू, माधो जैसे पात्रों का दाखिला हुआ और उनके जीवन की कहानी कही जाने लगी। साहित्य में पहले से जड़ जमाए लोगों की जमीन सरकनी शुरू हुई, तो उन पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगा, मुकदमे हुए। उन्हें घृणा का प्रचारक कहा गया। जब गोरखपुर में गांधी का आगमन हुआ, तब प्रेमचंद सुनने गए और लौटकर थोडे़ दिन में सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। गांधी व उनके आंदोलन के प्रति सहानुभूति थी, लिहाजा प्रेमचंद का एक गांधीवादी पाठ तैयार हुआ। उन्हें गांधीवाद के दायरे में पढ़ने का नजरिया सामने आया।
    मृत्यु के थोड़े दिनों पहले प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की। प्रगतिशील धारा ने उन्हें अपने गोल में शामिल मान लिया और उनका प्रगतिशील पाठ सामने आया। प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने साहित्य का उद्देश्य शीर्षक व्याख्यान दिया था, जिसे प्रगतिशीलता के घोषणापत्र का दर्जा मिला। पर इसी व्याख्यान में उनके कथन ‘लेखक स्वभावत: प्रगतिशील होता है’, के हवाले से उन्हें प्रगतिशील खेमे से बाहर दिखाने की कोशिशें होती रहीं और प्रेमचंद का हिंदू पाठ भी तैयार हुआ। इसी क्रम में दलित आंदोलन आया और उसने प्रेमचंद को दलित विरोधी करार दिया। इन तमाम बातों के बावजूद समाज में उनकी मौजूदगी बदस्तूर बनी हुई है। जो उनसे प्यार करते हैं, वे पंथ-वाद के पचडे़ में नहीं पड़ते।
    यहां दिलचस्प सवाल है, वह सूत्र क्या है, जिससे प्रेमचंद इतने महबूब लेखक बने हुए हैं? यहां मेरे ध्यान में दो निबंध आते हैं। एक लेख कवि गजानन माधव मुक्तिबोध का है, मेरी मां ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया और दूसरा लेख व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का है, प्रेमचंद के फटे जूते। इन दोनों लेखकों को प्रेमचंद पर लिखने की प्रेरणा उनका फोटो देखकर हुई थी। परसाई लिखते हैं, ‘प्रेमचंद का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे हैं। ...दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है, जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है। ...सोचता हूं, फोटो खिंचवाने की अगर यह पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी?’
    अब मुक्तिबोध का बयान सुन लीजिए, ‘प्रेमचंद और प्रसाद, दोनों खड़े हैं।... जूते की कैद से बाहर निकलकर अंगुलियां बड़े मजे से मैदान की हवा खा रही हैं। फोटो खिंचवाते वक्त प्रेमचंद अपने विन्यास से बेखबर हैं। उन्हें तो इस बात की खुशी है कि वह प्रसाद के साथ खड़े हैं, और फोटो निकलवा रहे हैं’। यानी दोनों लेखकों को प्रेमचंद की सहजता आकृष्ट करती है। दोनों ने प्रेमचंद का जो चित्र खींचा है, वह आम भारतीय का ही चित्र है। प्रेमचंद की असाधारणता का स्रोत वास्तव में उनकी साधारणता में है। मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘मेरी मां सामाजिक उत्पीड़नों के विरुद्ध क्षोभ और विद्रोह से भरी हुई थीं। ...वह स्वयं उत्पीड़ित थीं। और भावना द्वारा, स्वयं की जीवन-अनुभूति द्वारा, मां स्वयं प्रेमचंद के पात्रों में अपनी गणना कर लिया करती थीं’। मां के जरिए ही मुक्तिबोध को प्रेमचंद मिलते हैं।
    दूसरी तरफ परसाई हैं, जो प्रेमचंद से पूछ बैठते हैं, ‘चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?’ फिर इस सवाल का उत्तर भी देते हैं, ‘मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज, जो परत-पर-परत सदियों से जम गई है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया’। परसाई इशारा करते हैं कि प्रेमचंद समाज में मौजूद बहुत से पत्थरों पर प्रहार करते हैं। इसलिए प्रेमचंद उन लोगों की पहली पसंद हैं, जिनकी राह में ठोकर मौजूद हैं। ऐसे लोग उन्हें अपना हमसफर पाते हैं।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) सदानंद शाही , प्रोफेसर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय

     

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