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ओपिनियन / शौर्यपथ / चीन पिछले कई वर्षों से भारत को घेरने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए वह हमारे पड़ोसी देशों पर किसी न किसी तरह से अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है। पाकिस्तान को तो वह अपना ‘आयरन ब्रदर’ बना ही चुका है, कुछ ऐसा ही कथित ‘मजबूत भाईचारा’ वह अफगानिस्तान और नेपाल के साथ भी निभाना चाहता है। इसके अलावा, म्यांमार के साथ आर्थिक गलियारे के निर्माण पर सहमति बनाकर, बांग्लादेश में भारी निवेश करके, मालदीव के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाकर और श्रीलंका की निर्माण-परियोजनाओं पर अपनी पकड़ मजबूत करके वह क्षेत्र में भारत-विरोधी नीति को लगातार हवा दे रहा है। ऐसे में, असली सवाल यही है कि चीन की काट हम किस तरह निकालें? इसका सही-सही जवाब तभी मिल सकेगा, जब गंभीरता से यह चिंतन हो कि उप-महाद्वीप के तमाम पड़ोसी देशों से भौगोलिक, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रिश्ता चीन की तुलना में कहीं ज्यादा गहरा होने के बावजूद हमसे चूक कहां हुई?
दरअसल, भारत ने आसपास के देशों से रिश्ते बेहतर बनाने के बहुत सीमित प्रयास किए हैं। बेशक, हाल के वर्षों में ‘नेबरहुड फस्र्ट’ यानी पड़ोस-प्रथम की नीति अपनाई गई है, लेकिन इस पर फिलहाल संजीदा काम होता दिख नहीं रहा है। कुछ यही हाल दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का भी है। पाकिस्तान के साथ खराब रिश्ते की वजह से यह मंच अब बहुत ज्यादा कारगर नहीं रहा। हां, बंगाल की खाड़ी पर निर्भर दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के सात देशों के संगठन बिम्सटेक से उम्मीद पाली जा सकती है, पर इसके लिए भी भारत को अपने तईं प्रयास करने होंगे। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की भी यही तस्वीर है। बांग्लादेश, भूटान, नेपाल व भारत के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने पर सहमति बन चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसमें मनमाफिक प्रगति नहीं हुई है। क्षेत्र में सभी देशों के लिए सुरक्षा और विकास की खास नीति पर भी मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में जोर दिया गया है, पर इसका असर दिखना अभी बाकी है।
एक मुश्किल यह भी है कि हम पड़ोस के देशों से विभिन्न परियोजनाओं के लिए समझौते तो कर लेते हैं, लेकिन उनको अमल में लाना कभी-कभी तकनीकी वजहों से काफी मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि कभी तय वक्त पर धनराशि नहीं जारी हो पाती, तो कभी सामान की आपूर्ति रुक जाती है। इसके बरअक्स, चीन कहीं अधिक तेजी से अपनी परियोजनाएं पूरी करता है। जाहिर है, हर देश के साथ अलग-अलग तरीके से हमें अपना द्विपक्षीय रिश्ता आगे बढ़ाना होगा। अगर इस पर गंभीरता से काम हुआ, तो पड़ोसी देश भी हमारे साथ ‘चीन कार्ड’ नहीं खेल सकेंगे, जो अभी इसलिए अमल में लाया जाता है, ताकि हम पर दबाव बने।
हमें कई दूसरे उपाय भी करने होंगे। मसलन, प्राकृतिक आपदाओं को संभालने के लिए एक संयुक्त कार्ययोजना बनाने की पहल करना। अभी बाढ़, तूफान जैसी कुदरती आपदाओं से जितने हम पीड़ित होते हैं, उतने ही हमारे पड़ोसी देश भी होते हैं। इसीलिए हमें क्षेत्रीय स्तर पर एक ऐसा तंत्र बनाना चाहिए कि मुसीबत के समय सभी देशों को उससे मदद मिल सके। इसी तरह, जलवायु परिवर्तन की समस्या से सामूहिक तौर पर लड़ने के लिए भी हमें पड़ोसी देशों को तैयार करना चाहिए।
‘एजुकेशन हब’ बनकर भी भारत पड़ोसी देशों से मित्रता मजबूत कर सकता है। आसपास के देशों के छात्र यहां आकर अपना कौशल निखार सकते हैं। मगर इसके लिए उन्हें बेहतर शैक्षणिक माहौल दिए जाने की व्यवस्था करनी होगी। ‘मेडिकल टूरिज्म’ भी एक अन्य क्षेत्र है, जहां भारत नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। कोविड-19 महामारी ने मजबूत स्वास्थ्य ढांचे के महत्व पर खासा जोर दिया है। इसी तरह, पड़ोसी देशों के नौजवानों से उभरती तकनीक और प्रौद्योगिकी की जानकारी साझा करना भी हमारे हित में होगा।
यह सब करने के लिए जहां सरकार की तरफ से नीतिगत फैसले की दरकार है, वहीं नई परिपाटी शुरू करने भी जरूरत है, ताकि योजनाओं को जमीन पर उतारा जा सके। जैसे, वीजा जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाना। इतना ही नहीं, अमेरिका की तरह हमारे यहां भी ‘ग्रीन कार्ड’ जैसी व्यवस्था शुरू की जा सकती है, जिससे रोजगार पाने की उम्मीद रखने वाले दूसरे देशों के नौजवान भारत की तरफ आकर्षित हों। इससे न सिर्फ विदेशी कामगारों का दस्तावेजीकरण हो सकेगा, बल्कि अपने देश की आर्थिक सेहत भी सुधर सकेगी। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की परस्पर लाभकारी व्यवस्था भी बननी चाहिए, ताकि पड़ोसी देशों को यह मालूम चले कि चीन की दोस्ती में वे उसके आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे, जबकि भारत का साथ उन्हें एक बराबरी का एहसास दिलाएगा।
चिंता की बात यह भी है कि भारत और आसपास के देशों में बमुश्किल व्यापार होता है। हम महज चार-पांच फीसदी कारोबार ही पड़ोसी देशों के साथ करते हैं। जाहिर तौर पर इसमें सुधार जरूरी है। फिर, ‘बॉर्डर ट्रेड’ यानी सीमावर्ती इलाकों में आपसी व्यापार को भी बढ़ावा देना चाहिए। इससे न सिर्फ रोजगार के नए दरवाजे खुलेंगे, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा। म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश आदि देशों के साथ हम यह प्रयोग कर सकते हैं। इससे क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखला की अवधारणा को भी बल मिलेगा, जिससे आपस में विश्वास की डोर मजबूत होगी। ऐसी कोई शृंखला इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कोरोना की वजह से वैश्विक आपूर्ति शृंखला काफी प्रभावित हुई है। मगर हां, इसके लिए हमें अपने वीजा नियमों और सीमा शुल्क से जुड़े प्रावधानों की गंभीर समीक्षा करनी पडे़गी।
उपमहाद्वीप के तमाम देशों से रिश्ते मजबूत बनाने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि कोविड-19 के कारण क्षेत्रीय भू-राजनीति पर काफी असर पड़ा है। ऐसे में, पुरानी नीतियों से हम चीन को जवाब नहीं दे सकते। परस्पर लाभ पहुंचाने वाले द्विपक्षीय रिश्ते और पड़ोसी देशों को पर्याप्त तवज्जो देने वाली पड़ोसी-प्रथम की नीति पर हमें आगे बढ़ना चाहिए। बंगाल की खाड़ी और समुद्री सुरक्षा पर भी अधिक ध्यान देना होगा, क्योंकि बंगाल की खाड़ी में चीन की गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं। भारत सरकार बेशक इस दिशा में प्रयास कर रही है, पर अब भी काफी कुछ किया जाना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)अरविंद गुप्ता, पूर्व डिप्टी एनएसए, डायरेक्टर, वीआईएफ
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
