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नजरिया / शौर्यपथ / राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने जब अशोक गहलोत और सचिन पायलट को जिम्मेदारी सौंपी थी, तब उन्होंने दोनों नेताओं को अपने साथ खड़ा करके एक खुशनुमा तस्वीर ट्वीट की थी। इस तस्वीर को उन्होंने राजस्थान का मिला-जुला रंग करार दिया था। पर इस तस्वीर कोे बरकरार रखने के लिए पौने दो साल बाद भी पहले दिन की तरह उन्हें दोनों नेताओं की लड़ाई में बीच-बचाव करना पड़ रहा है। एक माह तक चली रस्साकशी के बाद राजस्थान सरकार का संकट फिलहाल टल गया है, पर अशोक गहलोत व सचिन पायलट के बीच टकराव अभी भी बरकरार है। गहलोत की तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी में पायलट की वापसी से साफ है कि कांग्रेस अपने नेताओं को खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहती। इससे गहलोत को भी एहसास हो गया कि संगठन से जुड़े मामलों में उनका निर्णय अंतिम नहीं है।
करीब एक माह तक चली इस लड़ाई में सचिन पायलट को भी वह सब हासिल नहीं हुआ, जिसके लिए उन्होंने बगावत का झंडा बुलंद किया था। पायलट को अपने साथ 30 विधायक होने का भरोसा था, पर बगावत के ऐलान के साथ ही कई भरोसेमंद विधायकों ने उनका साथ छोड़ दिया। आखिर में सिर्फ 19 विधायक उनके साथ गुरुग्राम के होटल पहुंचे। इनमें से भी कई विधायक मुख्यमंत्री के संपर्क में थे। गहलोत ने संख्या कम होने के बावजूद करीब 102 विधायक जुटा लिए थे। बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय का मामला अदालत में है और कई विधायकों पर उन्हें पूरा भरोसा नहीं था। दो-तीन विधायक भी इधर-उधर हुए, तो खेल पलट सकता था। उनकी रणनीति भाजपा पर टिकी थी। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के रुख को गहलोत अपने लिए फायदेमंद मान रहे थे, पर वह आश्वस्त नहीं थे। यही वजह है कि पार्टी अपने विधायकों को कभी एक होटल, तो कभी दूसरे होटल में घेराबंदी कर रोकने की कोशिश करती रही।
इस पूरे मामले में अशोक गहलोत ने सरकार गिराने की साजिश करने वाले लोगों को मात देकर कांग्रेस को रणनीतिक बढ़त दिलाई है। मध्य प्रदेश के बाद पार्टी के हौसले पस्त थे। शुरुआत में तो लगा था कि राजस्थान भी हाथ से फिसल गया, पर गहलोत ने जिस तरह रणनीति को अंजाम दिया, उससे पार्टी की ताकत बढ़ गई है।
पायलट को भी पता था कि गहलोत ने एक बार बहुमत साबित कर दिया, तो उनके लिए पार्टी में वापसी मुश्किल हो जाएगी। इसके साथ विधायकों की सदस्यता भी खत्म हो सकती है। पूरी कवायद में कांग्रेस एक विजेता के तौर पर उभरी है। पार्टी जहां राजस्थान में अपनी सरकार बचाने में सफल रही, वहीं टूट से भी बच गई। कांग्रेस लगातार कहती रही कि पायलट और उनके समर्थकों के लिए दरवाजे खुले हैं। गहलोत ने पायलट पर सीधा हमला बोला, तो सफाई देने में भी देर नहीं की।
सचिन पायलट अब वापस आ चुके हैं। पार्टी ने उनकी शिकायतों पर विचार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति के गठन के अलावा कोई वादा नहीं किया है। समिति पायलट और गहलोत के साथ विधायकों से चर्चा करके अपनी रिपोर्ट देगी। कमेटी की सिफारिशों के आधार पर कदम उठाए जाएंगे। पायलट समर्थक विधायकों को सरकार में पहले के मुकाबले ज्यादा लालबत्ती मिल सकती है। शुरुआती तौर पर ऐसा लगा कि पायलट ने राजनीतिक गलती की है, पर उन्होंने शुरू में जो बात कही, उसी पर कायम रहे। उन्होंने अपने हमले को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक सीमित रखा। यही सावधानी उनकी वापसी की वजह बनी। हो सकता है, पायलट कुछ दिन कमजोर नजर आएं, पर पार्टी में उनका कद बढे़गा।
गहलोत को राजनीति का जादूगर कहा जाता है। कुछ हद तक यह बात सही भी है, क्योंकि अभी तक वह अपने सभी विरोधियों को मात देते हुए आगे बढ़ते रहे हैं। हरिदेव जोशी, परसराम मदेरणा, नवल किशोर शर्मा, शीशराम ओला और रामनिवास मिर्धा जैसे नेताओं को प्रदेश की राजनीति में दरकिनार कर गहलोत आगे बढे़ हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि पार्टी हाईकमान के निर्णय उनके लिए अंतिम हैं। ऐसे में, यह मामला उनके लिए इम्तिहान से कम नहीं है। गहलोत किस तरह पायलट के साथ अपनी अदावत भुलाकर उन्हें सम्मान देते हैं, यह राजस्थान में कांग्रेस सरकार की स्थिरता का पैमाना होगा और सचिन को अब एक नई शुरुआत करनी होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) सुहैल हामिद, विशेष संवाददाता, हिन्दुस्तान
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
