July 24, 2026
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    उस शाम साथ ले चलीं टीचर

    • rounak group

    मेरी कहानी / शौर्यपथ /हर पल ऐसा लगता था कि सामने एक विशाल पहाड़ है। उसे हटाने के लिए धक्का मारो, तो वह और आगे बढ़ आता है। क्या इस पहाड़ में कहीं कोई गलियारा या खिड़की है, जहां से पार हो जाएं? पहाड़ के सामने रोने का कोई अर्थ नहीं था, लगता था कि वह भी जवाबी रुलाई से चिढ़ा रहा है। उस लड़के को उस शाम उम्मीद थी कि सामने खडे़ पहाड़ में एक खिड़की खुलेगी। वैसे यह उम्मीद तो दिन-रात साथ रहती थी, लेकिन उस दिन कुछ ज्यादा ही दिल से आ लगी थी। लगता था कि अब टीचर आने ही वाली हैं। टीचर के आते ही इस निष्ठुर पहाड़ में एक खिड़की खुलेगी, जहां से जिंदगी का एक नया आसमान नजर आएगा। टीचर ने कहा था कि ‘तैयार रहना, आज शाम आऊंगी, नाटक दिखाने ले जाऊंगी। तुम्हारा असली नाटक देखना जरूरी है’।
    क्या ऐसे लोग होते हैं, जो अनजान से लड़के को भी नाटक दिखाने ले जाएं? जो अनजान से किसी लड़के के भले की सोचें? ऐसी भी टीचर होती हैं क्या, जो अपने पैसे और समय खर्च करके अपने एक अदने से छात्र को नाटक दिखाने ले जाएं? टीचर ने आने का तो कहा है, लेकिन अगर नहीं आईं, तो क्या होगा? फिर तो सामने पहाड़ ज्यों का त्यों रह जाएगा और उसके साथ एक इंतजार भी।
    पिता डेविड अक्सर कहते रहते हैं कि किसी से उम्मीद मत रखना? तुम जैसे दुनिया के सबसे बदसूरत लड़के को कोई उम्मीद रखनी भी नहीं चाहिए। पिता सौतेले थे, अपने सौतेले बेटे को नीचा दिखाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। कोई छोटी कमी भी दिख जाती, तो सौतेले पिता नीचा दिखाने की बड़ी गुंजाइश निकाल लेते थे। टीचर आने वाली थीं, कायदे से पिता और मां को बता देना चाहिए था, लेकिन भय के मारे हिम्मत ही नहीं पड़ी। वैसे भी जवाब तय था, तो वह लड़का पूछकर क्यों मुसीबत मोल लेता? चर्च से जुड़े उसके परिवार में नाटक देखने को बुरा माना जाता था। चुपचाप वह समय से पहले तैयार होकर घर में ही दुबक गया। टीचर किसी भी समय आ सकती थीं, उनकी राह पर लड़के की पलकें बिछी हुई थीं। डरा हुआ गमगीन मन पुकार रहा था, ‘टीचर, आ जाओ। मुझे बाहर ले चलो। मैं कब से तैयार हूं’।
    पल-पल भारी पड़ते इंतजार के बाद टीचर दिखाई पड़ने लगीं। खुशी से मन उछल पड़ा, ‘थैंक्यू टीचर’। टीचर कुछ ही पल में पिता-मां के सामने आ खड़ी हुईं, यथोचित अभिवादन के बाद कहा,‘जेम्स कहां है? मैं उसे साथ ले जाने आई हूं।’
    पिता स्तब्ध थे कि एक संभ्रांत महिला उनके सबसे बदसूरत बेटे के लिए आई है? टीचर ने बताया, ‘आपको पता है? आपका बेटा कमाल का लिखता है। पिछले दिनों एक नाटक लिखा, जो स्कूल में खेला गया, सबने पसंद किया। मुझे लगता है, उसे सही दिशा दी जाए, मैं उसे नाटक दिखाने ले जाऊंगी। वहां जाएगा, तो सीखेगा कि रंगमंच की दुनिया में क्या चल रहा है?’
    उस लड़के जेम्स ने गौर किया, पिता का चेहरा सूख गया था। वह भौचक्क थे कि नामुराद लड़के ने नाटक लिखा है और खुश होकर टीचर खुद आई हैं। अब इसके साथ नाटक देखने जाएंगी? मां भी अचंभित थीं, लेकिन थोड़ी खुश भी थीं। आखिर क्या गलत है? टीचर ही तो हैं, ले जा रही हैं अपने साथ, नाटक दिखाकर छोड़ जाएंगी। लेकिन पिता का मन नहीं मान रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। पिता इनकार की कोशिश करना चाहते थे। मचल रहे थे। उन्हें पहले से ही आशंका थी कि शिक्षा लड़के को बिगाड़ देगी, जमाने की हवा लग जाएगी और कहीं उनकी नजर में नाकारा लड़का सफल हो गया, तो उनके अपशब्दों व बुरी भविष्यवाणियों का क्या होगा? और कोई होता, तो तत्काल मना कर देते, पर सामने गोरी चमड़ी वाली टीचर थीं, तो हिम्मत पस्त हो गई। मन मारकर झल्लाते हुए पिता ने मुंह फेर लिया और मां ने कहा, ‘आप जेम्स को ले जाइए?’
    और तब जेम्स बाल्डविन (1924-1987) अपनी टीचर के साथ चल पड़े, यह एक लेखक के रूप में उनकी जीवन यात्रा की नई शुरुआत थी। मन में बैठी यह धारणा ढेर हो चुकी थी कि कोई श्वेत कभी किसी अश्वेत का भला नहीं चाह सकता। उस दिन पाबंदियों और भ्रांतियों के ढहने की शुरुआत हुई थी। उसी दिन उस पहाड़ का टूटना शुरू हुआ, जिसे जेम्स के जैविक पिता उसके सामने उगा गए थे और जिसे उनके सौतेले पिता ने बड़ा व भयावह बना दिया था। किताबें उन्होंने बहुत लिखीं, लेकिन एक किताब गो टेल इट ऑन द माउंटेन में उन्होंने अपने दोनों पिता पर प्रकाश डाला। एक पिता, जो कभी दिखे नहीं और एक पिता, जो हमेशा रूठे रहे, लेकिन जिंदगी में वह टीचर और ऐसे बहुत लोग मिले, जिन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखा दिया।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय जेम्स बाल्डविन, प्रसिद्ध अमेरिकी साहित्यकार

     

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