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शौर्यपथ आलेख / गणेश पर्व पर हमारे मोहल्ले में रोज रात को नाचा- गाना, भजन- कीर्तन चलता है।ऐसे ही एक रात की बात है भजन कार्यक्रम सुनकर रात एक बजे घर पहुंचा और बिस्तर पर लुढ़कते ही गहरी नींद में चला गया।
तभी चीं चीं चों चों की आवाज मुझे सुनाई दी। बिस्तर से उठकर मैंने देखा कि कमरे के कोने में ढेर सारे चूहे जमा हैं। वे जोर जोर से नारा लगा रहे हैं -अनाज का बड़ा दुश्मन मूषक नहीं मनुष्य है। उनके इस उटपटांग नारा से मैं अचंभित हो गया।मैं उनके करीबी जाकर पूछा -कैसे मूषक बन्धुओं,तुम लोग गणेश पर्व पर पगला गए हो क्या? मनुष्य के उपजाए चांवल दाल चना गेहूं को खाते हो,नुकसान करते हो ,और आज मनुष्य को ही अनाज का बड़ा दुश्मन कह रहे हो। तुम्हारी मति मारी गई है क्या?
मेरे इस सवाल को सुनकर एक बुजुर्ग चूहा अपनी मूंछ अंटियाते बोला-मति तो तुम्हारी मारी गई है।तभी तो चूहों को अनाज का दुश्मन कहते हो।अपने कर्मों का ठीकरा दूसरों के माथे पर मढ़ते हो।मन से विचार करके देखो जितना नुकसान अनाज का तुम लोग करते हो उसका आधा भी हम मूषक नहीं करते हैं।
मैने हाथ में पकड़े डंडे को उसकी ओर तानते हुए कहा- -छोटा मुंह बड़ी बात मत करो मूषक महराज। अनाज का बड़ा दुश्मन मनुष्य कैसे हो सकता है भला? बताना तो जरा।
मेरी बात सुनकर वह आंखें लाल करते हुए बोला - जरा दिमाग पर जोर डालकर सोचो।शादी ब्याह,मृत्यु भोज, जन्मदिवस,आदि मौके पर चावल,दाल,रोटी सब्जी ,खीर पुड़ी मिठाइयां आदि जरूरत से ज्यादा बना लेते हो कि नहीं। बचे हुए खाद्य सामग्रियों को नाली,कूड़े करकट में फेक देते हो कि नहीं।कितने लालची लोग अपनी थाली में जूठन छोड़ देते हैं।ए सब अनाज का नुक़सान ही तो है न?
बुजूर्ग मूषक की बात पर एक दूसरा मूषक सहमति जताते हुए बोला- सोलह आना सही कह रहे हो दादा जी। मैने भी देखा है।बड़े बड़े होटलों में, पार्टियों में रोजाना बेहिसाब जूठा फेका जाता है। बड़े होटलों में खाने आने वाले लोग थाली में जूठन छोड़ना को शान समझते हैं। अगर कोई सफाई से थाली के पूरे भोजन को खाता है तो अन्य लोग उसे गंवार समझ लेते हैं।अन्नपूर्णा मईया ऐसे अनाज के दुश्मनों को कभी माफ नहीं करेगी।
उनकी बाते सुनते मैं आगे कुछ बोल पाता उसके पहले ही खांसते खखारते हुए एक बूढ़ा चूहा बोला -अरे मूषक भाईयों, मनुष्यों की तो छोड़ो इनकी तो सरकार को भी अनाज का नुक़सान पहुंचाने में महारत हासिल है। जहां देखो वहां खुले मैदान में अनाज की बोरियां पड़ी रहती हैं। प्रत्येक वर्ष हजारों अनाज की बोरियां बरसाती पानी में भीगते सड़ते रहती हैं। करोड़ो क्विंटल अनाज सड़कर किसी काम के नहीं रहते हैं। मनुष्य अपनी ऐसी गलतियों को छुपाने के लिए मूषक समुदाय पर दोष मढ़ देता है।
इतना बोलकर वह चूहा पल भर चुप्पी साधने के बाद लम्बी सांस छोड़ते हुए बोला- और तो और हमें मारने के लिए जहर देने में भी मानव समुदाय पीछे नहीं हटता है।मेरा तो कहना है कि अनाज के साथ साथ मनुष्य हमारा भी सबसे बड़ा दुश्मन है।चलो आज अभी से मनुष्यों पर हमला करना आरंभ कर देते हैं।प्लेग बीमारी को फिर से फैलाना शुरू कर देते हैं।उस बूढ़े चूहे की बात पर सारे चूहे हां में हां मिलाते,दांत किटकिटाते मेरी ओर झपटे।
जिसे देखकर मैं घबराहट में जोर जोर से चिल्लाने लगा। बचाओ बचाओ।चूहे मुझे काट खाएंगे। बचाओ गणपति बप्पा बचाओ।मेरी चिल्लाहट को सुनकर बगल में सोई मेरी अर्धांगिनी जाग गई।वह मुझे झकझोरते हुए बोली -कहां है चूहे।किधर हैं चूहे। सपना देख रहे हो क्या जी?उसके झकझोरने से मैं जाग उठा।तब मेरा शरीर पसीने से तरबतर था। मैं पानी पीने के बाद अपने सपने का पूरा हाल अपनी अर्धांगिनी को बताया। मैने उसी पल गणेश जी की सौगंध खाकर कहा कि- आज से अनाज का एक भी दाना बरबाद नहीं करना है ,और ना ही किसी को करने देना है।
विजय मिश्रा 'अमित'
पूर्व अति महाप्रबंधक
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
