July 31, 2026
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    भारत के सांस्कृतिक उपनिवेश

    • rounak group

    इतिहास / पश्चिम के नस्लवादी इतिहासकारों व भारत के वामपंथियों ने हिंदू सभ्यता को हीन ठहराने की कोशिश में एक अजीब सिद्धांत प्रतिपादित किया--
    "इतिहास बताता है कि भारत में सदैव बाहर से लोग आये, यहाँ से कोई बाहर कहीं गया ही नहीं"
    इस स्थापना को एक उर्दू शेर द्वारा कुछ इस निहायत कमीनगी से वर्णित किया गया-
    "काफिले आते गये, हिंदुस्तां बनता गया।"
    यह शेर नस्लवादी, वामपंथी और मुस्लिमों की अपवित्र दुरभसंधि का जीताजागता प्रमाण है।
    पर वास्तविकता यह है कि भारत का, भारतीय संस्कृति का निर्माण देव जाति व उसके महानायकों यथा महारुद्र शिव, राम व कृष्ण, बुद्ध जैसे परमपूजित दैवी महापुरुषों द्वारा और वर्तमान स्वाध्याय विहीन अधिकांश हिंदुओं के अनजाने महानायकों जैसे सुयज्ञ, भरत, बोधिधर्मन आदि के द्वारा किया जा चुका था।
    इन महानायकों द्वारा स्थापित आर्य संस्कृति की मशाल को लेकर साहसी हिंदू युवकों द्वारा संसार के कई स्थानों पर सांस्कृतिक उपनिवेशों की स्थापना की जिनमें से मध्यएशिया स्थित आग्नेय कोण क्षेत्र प्रमुख था।
    हिंदुओं ने पिछले हजार वर्ष में क्या-क्या खोया है उसका न तो कोई हिसाब है और न किसी हिंदू को कोई चिंता है।
     कभी अपनी दीवार तक सिमटा 'चिन' इतिहास की दुहाई देकर आज पामीर पर दावा ठोक चुका है और उसके दस प्रतिशत हिस्से पर कब्जा भी कर चुका है जबकि  मध्यएशिया में प्राचीनकाल से काबिज हिंदुओं को अपने पूर्वजों की खोई विरासत को पाना तो दूर  जानने की भी इच्छा नहीं।
    वस्तुतः आस्था की दुहाई देकर भारत के पौराणिक इतिहास को चमत्कारिक दैवीय रूप देकर हमने स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी जबकि इतिहास को हथियार बनाकर हम इन क्षेत्रों की जनजातियों को उनके हिंदू अतीत का परिचय देकर उनकी घर वापसी करवा सकते थे।
    अगर मक्का की गलियों में तेरह लोगों का झुंड अरबी संस्कृति को मध्य एशिया तक फैला सकता है तो 'जातिस्मरण', उन्हें वापस भी ला सकता है।
    मध्यएशिया व अफगानिस्तान स्थित-
    'पिशाई' को ऋग्वैदिक 'पिशाच' जाति, 'पठानों' को ऋग्वैदिक 'पक्थ' जाति,
    'अफ्रीदियों' को ऋग्वैदिक 'आप्रीत' जाति,
    की पहचान को अपनी शोधपुस्तिका  #इंदु_से_सिंधु में विस्तृत रूप से रखने पर विरोध मुस्लिमों ने नहीं बल्कि जातिवादी गुंडों ने किया जो नाम भर से हिंदू थे जबकि मेरा एक छोटा सा प्रयास था यह बताने का कि हिंदू जाति का सांस्कृतिक इतिहास व इसका विस्तार कितना अधिक था।
    उसी क्रम में मध्य एशिया में बार-बार एक नाम आता है और वह है- 'तोखारिस्तान'
    तोखारिस्तान, जिसे संस्कृत ग्रंथों में कहा गया--'तुषार भूमि या तुषारस्थान' अर्थात बर्फ का क्षेत्र।
    इस क्षेत्र में बसने वाले लोगों को कहा गया --'तुषारी' या 'तुखारी'।
    तुखारी!  प्राचीन काल में मध्य एशिया में स्थित तारिम द्रोणी में बसने वाली एक ऐसी जाति के लोग जो हिन्द-यूरोपीय भाषाएँ बोलने वाले सब से प्राचीनतम लोग थे और जिनका उल्लेख संस्कृत ग्रंथों में बहुत हुआ है।
    अथर्ववेद में इन्हें शक  और बाह्लीक जातियों से सम्बंधित बताया गया है। इन्हें कहीं-कहीं कंबोज भी कहा गया है।
    चीनी स्रोतों के अनुसार इनका 'युइची' अर्थात कुषाणों की पितृजाति से गहरा सम्बन्ध था।
    लेकिन दृष्टव्य यह है कि तारिम बेसिन के ये इंडो-यूरोपियन लोग खुद को 'अग्नि', 'कुसी' और 'क्रोरान' बुलाते थे और 'कारा' शहर का प्राचीन नाम 'अग्नि' था, जिसे संस्कृत में 'अग्निदेश' कहा गया। यहाँ यह भी दृष्टव्य है कि हिंदू ग्रंथों की दस दिशाओं में एक दिशा आग्नेय कोण भी है।
    उत्तरी तारिम के मरूद्यानों में कृषक समुदाय सर्वप्रथम लगभग 2,000 ई.पू. में प्रकट हुए और दूसरी शताब्दी ई.पू. तक, ये बस्तियां शहर-राज्यों में विकसित हो गई थीं, जो उत्तर में खानाबदोश लोगों और पूर्व में चीनी साम्राज्यों द्वारा ढकी हुई थीं।
    ये शहर व्यापारियों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव व मंडी के रूप में था।
    तोखारियों की 'उत्तरी जियोंग्नू' अर्थात हूणों से बहुत झड़पें हुई, जिसके बाद इन्होनें तारिम द्रोणी का इलाक़ा छोड़ दिया।
    वर्तमान अफगानिस्तान के 'तखार प्रांत' का नाम इसी जाति पर पड़ा है।
    तोखारिस्तान के दो केन्द्र हिंदू संस्कृति के बड़े केंद्र बनकर उभरे जिनमें एक तो मध्यएशिया में एक बड़े साम्राज्य के रूप में भी विकसित हुआ जिनके विषय में अगले अंक में।
       यह आलेखमाला यों तो जेएनयू में हुए मध्येशियाई राजदूतों व इतिहासकारों के सम्मेलन में सबमिट किये गए मेरे रिसर्चपेपर व उद्बोधन पर आधारित है पर यह मूल रूप से 'अनंसंग हीरोज-इंदु से सिंधु तक' में वर्णित अध्यायों का विस्तार है जिसमें भारत की आर्य हिंदू संस्कृति के विकास व विकास  को अत्यंत सरल व सुरुचिपूर्ण भाषा में संपूर्ण प्रमाणों सहित वर्णित किया गया है।(फेसबुक वाल से )

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