July 31, 2026
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    नक्शे की राजनीति या कूटनीति

    • rounak group

        शौर्यपथ / राजतंत्र के जमाने में नेपाल में एक तंजतारी चलती थी, ‘मुखे कानून छ’ यानी जो मुंह से निकल गया, वही कानून है। 28 मई, 2008 को राजशाही खत्म कर नेपाल में लोकशाही की घोषणा कर दी गई, मगर शासन का ढब वहां बदला नहीं। विगत बुधवार को सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने बयान दिया था कि नेपाल भी नक्शा जारी करेगा। उनके इस बयान के पांच दिन बाद सोमवार को नए नेपाल का राजनीतिक नक्शा मंत्रिपरिषद ने जारी भी कर दिया। जो काम पिछले 26 साल में नहीं हो सका था, प्रधानमंत्री ओली ने पांच दिन में कर दिया? 
    इस नए राजनीतिक नक्शे में लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी से लगे भारतीय इलाकों को भी नेपाल का हिस्सा बता दिया गया है। नए नक्शे में गुंजी, नाभी और कुटी जैसे गांवों को भी नेपाली इलाके में दिखाया गया है। यह दीगर है कि 1975 में नेपाल ने जो नक्शा जारी किया था, उसमें लिंपियाधुरा के 335 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र नहीं दर्शाए गए थे। मंगलवार 19 मई, 2020 से यह नेपाली संविधान की अनुसूची, सरकारी निशान और उसके पाठ्यक्रम का हिस्सा हो गया। सवाल यह है कि क्या इस नए नक्शे को हेग स्थित ‘आईसीजे’ या दुनिया की कोई भी न्यायपालिका मान लेगी? 
    ब्रिटिश भारत में 1798 से लेकर 1947 तक जो नक्शे समय-समय पर जारी किए गए, उन पर नेपाल को कोई आपत्ति नहीं थी। प्रोफेसर लोकराज बराल 1996 में नई दिल्ली में नेपाल के राजदूत रह चुके थे। पिछले हफ्ते एक बातचीत में उन्होंने माना कि नेपाल उस दौर में भी ब्रिटिश इंडिया के नक्शे पर आश्रित था। भारत-नेपाल संयुक्त प्राविधिक समिति ने 26 वर्षों का समय लगाकर 182 स्ट्रीप मैप के साथ 98 प्रतिशत रेखांकन का कार्य संपन्न किया है। इसमें दो फीसदी कार्य कई वर्षों से बाकी है। इस पर भारतीय पक्ष की मुहर भी नहीं लगी है। नया विवाद 2 नवंबर, 2019 को शुरू हुआ, जब भारत ने कश्मीर-लद्दाख को लेकर नक्शा पुनर्प्रकाशित किया था। उसमें पड़ोसी मुल्कों को बांटती सीमाओं में कोई रद्दो-बदल नहीं हुआ था, पर भारतीय विदेश मंत्रालय के स्पष्टीकरण के बावजूद नेपाल मानने को तैयार नहीं था। वह विदेश सचिव स्तर पर इसे सुलझाना चाहता था। 
    नए विदेश सचिव हर्षवद्र्धन शृंखला 29 जनवरी, 2020 को चार्ज लेने के साथ नेपाल से इस विषय पर संवाद करते, यह संभव नहीं था। उसके अगले पखवाडे़ इसकी तैयारी हो, तब तक कोरोना महामारी प्रारंभ हो चुकी थी। प्रश्न यह है कि यदि लिपुलेख मुद्दा ओली सरकार के लिए इतना ही महत्वपूर्ण था, तो 28 मार्च, 2019 को विदेश सचिव स्तर की बैठक में इसे शामिल क्यों नहीं किया गया? काठमांडू में आहूत उस बैठक में तत्कालीन भारतीय विदेश सचिव विजय कृष्ण गोखले व उनके नेपाली समकक्ष शंकरलाल वैरागी क्रॉस बॉर्डर रेलवे, मोतिहारी-अमलेखगंज तेल पाइपलाइन व अरुण-तीन जल विद्युत परियोजना पर सहमति बना रहे थे। 
    दो-तीन बातें ध्यान में रखने की हैं। 1962 में युद्ध के समय से ही यहां पर इंडो-तिब्बतन फोर्स की तैनाती भारत ने कर रखी है। नेपाल इसे हटाने की मांग कई बार कर चुका है। कायदे से नेपाल को ऐसा कोई पत्र दिखाना चाहिए, जिसमें तत्कालीन भारत सरकार ने लिपुलेख ट्राइजंक्शन पर इंडो-तिब्बतन फोर्स की तैनाती का कोई अनुरोध किया था। सितंबर 1961 में जब कालापानी विवाद उठा था, उससे काफी पहले 29 अप्रैल, 1954 को भारत-चीन के बीच शिप्ला-लिपुलेख दर्रे के रास्ते व्यापार समझौता हो चुका था। सन 1954 से लेकर 2015 तक चीन ने कभी नहीं माना कि लिपुलेख वाले हिस्से में, जहां से उसे भारत से व्यापार करना था, नेपाल भी एक पार्टी है या यह ‘ट्राइजंक्शन’ है। 2002 में एक ज्वॉइंट टेक्नीकल कमेटी भी बनी। उन दिनों नेपाल की कोशिश थी कि चीन को इसमें शामिल करें। चीनी विदेश मंत्रालय ने 10 मई, 2005 को एक प्रेस रिलीज द्वारा स्पष्ट किया कि कालापानी भारत और नेपाल के बीच का मामला है, इसे इन दोनों को ही सुलझाना है। 
    नेपाल, 1950 की संधि को भी ध्यान से नहीं देखता है। 31 जुलाई, 1950 को हुई भारत-नेपाल संधि के अनुच्छेद आठ में स्पष्ट कहा गया है कि इससे पहले ब्रिटिश इंडिया के साथ जितने भी समझौते हुए, उन्हें रद्द माना जाए। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण बिंदु है, जो कालापानी के नेपाली दावों पर पानी फेर देता है। दरअसल, ओली सरकार कालापानी-लिपुलेख विवाद में फंसी हुई है। स्वयं सरकार के मंत्रियों को नहीं मालूम कि जिस सड़क का उद्घाटन 8 मई, 2020 को विडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया है, वह सड़क कब से बननी शुरू हुई थी। 
    विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावाली कहते हैं, ‘भारत, लिपुलेख में 2012 से सड़क बना रहा था, यह मीडिया रिपोर्ट से मुझे मालूम हुआ।’ यह कुछ अजीब नहीं लगता कि जो विवादित इलाका नेपाल की राजनीति का ‘एपीसेंटर’ बना हुआ है, वहां की जमीनी गतिविधियों से ओली और ज्ञावाली अनभिज्ञ थे? पुराने टेंडर  व दस्तावेज बताते हैं कि शिप्किला-लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली 75 किलोमीटर दुर्गम सड़क 2002 से निर्माणाधीन थी। यह परियोजना 2007 में ही पूरी हो जानी थी, जो बढ़ते-बढ़ते 2020 में पहुंच गई। 
    सोचने वाली बात है कि प्रधानमंत्री ओली इस पूरे मामले को राष्ट्रीय अस्मिता की ओर क्यों धकेल रहे हैं? सर्वदलीय बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री व जनता समाजवादी पार्टी के नेता बाबुराम भट्टराई ने यूं ही नहीं कहा था कि राष्ट्रवाद का भौकाल खड़ा करने की बजाय सरकार पुराने दस्तावेजों को जुटाए और कालक्रम को व्यवस्थित करे, तभी इस लड़ाई को वह अंतरराष्ट्रीय फोरम पर ले जा सकेगी। 
    परिस्थितियां बता रही हैं कि लिपुलेख विवाद में पीएम ओली ने जान-बूझकर पेट्रोल डाला है। कालापानी के छांगरू गांव में नेपाली अद्र्धसैनिक बल, आम्र्ड पुलिस फोर्स (एपीएफ) की तैनाती ओली का खुद का फैसला था। उसके बारे में बुधवार को हुई सर्वदलीय बैठक में चर्चा तक नहीं हुई थी। ओली चाहते हैं कि सीमा पर तनाव बढ़े, ताकि देश का ध्यान उधर ही उलझा रहे। 29 मई, 2020 को बजट प्रस्ताव के बाद ओली पद पर रहें न रहें, कहना मुश्किल है। 44 सदस्यीय स्टैंडिंग कमेटी में प्रधानमंत्री ओली के पक्ष में केवल 14 सदस्य हैं। प्रचंड गुट के 17 और माधव नेपाल के 13 सदस्य मिलकर कोई नया गुल खिलाने का मन बना चुके हैं। 
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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