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सेहत / शौर्यपथ / आज के समय में देशभर में ऐलोपैथी और होम्योपैथी के साथ-साथ आयुर्वेद का तो अभ्यास और इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में सिद्ध पद्धति का अभ्यास सिर्फ दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल राज्य तक ही सीमित है. एक बार फिर सिद्ध चिकित्सा के बारे में लोग जानना चाह रहे हैं क्योंकि तमिलनाडु की सरकार नए कोरोना वायरस कोविड-19 के खिलाफ सिद्ध चिकित्सा को बढ़ावा दे रही है. राज्य सरकार का कहना है कि सिद्ध चिकित्सा की मदद से कोविड-19 के मरीजों में 100 फीसदी रिकवरी रेट देखने को मिल रहा है और सरकार ने सिद्ध चिकित्सा के तहत 'कबासुरा कुडीनीरÓ नाम का एक मिश्रण भी तैयार किया है जिसका इस्तेमाल इम्यूनिटी बूस्टर के तौर पर किया जा रहा है.
हमारी मॉर्डन लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां जैसे- तनाव, अनिद्रा, मोटापा और ब्लड प्रेशर के इलाज में सिद्ध चिकित्सा का ज्यादा इस्तेमाल होता है. इसके अलावा त्वचा से जुड़ी बीमारी सोरायसिस, यौन संचारित रोग, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई), गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन, लिवर से जुड़ी बीमारियां, एनीमिया, डायरिया या फिर आर्थराइटिस और एलर्जी- ये कुछ ऐसी बीमारियां हैं जिनका सिद्ध के जरिए इलाज किया जाता है. आयुर्वेद की ही तरह सिद्ध में भी 3 दोष माने गए हैं- वात, पित्त और कफ.
सिद्ध चिकित्सा का अभ्यास मौजूदा समय में केंद्रीय आयुष मंत्रालय के अंतर्गत आता है और हर साल 4 जनवरी को सिद्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है.
1. सिद्ध चिकित्सा का इतिहास और सिद्धांत
ऋषि अगस्त्य जिन्हें तमिल भाषा और सिद्ध चिकित्सा दोनों का जनक माना जाता है, उन्होंने सिद्ध चिकित्सा, औषधी और सर्जरी से जुड़ी कई किताबें लिखीं जिनका इस्तेमाल आज भी कई सिद्ध चिकित्सक करते हैं. सिद्ध चिकित्सकों को सिद्धर कहा जाता है. वैसे तो सिद्ध चिकित्सा का मूलभूत सिद्धांत बहुत हद तक आयुर्वेद से मिलता जुलता है लेकिन विस्तार से अध्ययन करने पर दोनों में अंतर दिखता है. सिद्ध की परंपराएं और विशिष्टता तमिलनाडु की द्रविड़ सभ्यता से जुड़ी हैं. सिद्ध और आयुर्वेद में सबसे बड़ा अंतर ये है कि सिद्ध औषधी को बनाने में जड़ी-बूटियों के अलावा धातु और खनिज पदार्थों जैसे- सल्फर, अभ्रक, पारा आदि का इस्तेमाल किया जाता है.
2. शरीर को 7 अंग मानकर होता है इलाज
सिद्ध के मुताबिक, इंसान के शरीर के 7 अलग-अलग तत्व अलग-अलग मिश्रण से बनते हैं :
सरम यानी प्लाज्मा जो इंसान के शरीर की उत्पत्ति और विकास के लिए जिम्मेदार है
चेन्नीर यानी खून जो शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच कर शरीर को पोषण देता है
ऊन यानी मांसपेशियां जो इंसान के शरीर को आकार देने का काम करती हैं
कोलजुप्पू यानी टीशू जो हड्डियों के जोड़ को चिकना रखते हैं, उन्हें टूटने-फूटने से बचाते हैं
एन्बू यानी हड्डियां जो इंसान के शरीर को सरंचना और मुद्रा देती हैं
मूलई यानी नसें जो शरीर को जोड़कर रखती हैं
सुकिला यानी सीमन जो प्रजनन के लिए जिम्मेदार है
3. 8 तरह से डायग्नोज होती है बीमारी
मरीज की नब्ज देखते हैं
त्वचा को छूते हैं
जीभ देखते हैं
चेहरे का रंग-रूप
बोलने का तरीका
आंखें देखते हैं
यूरिन
स्टूल
इन 8 तरीके के परीक्षणों के जरिए बीमारी को डायग्नोज किया जाता है और इसमें भी नब्ज की जांच को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है.
4. सिद्ध दवाइयों को 3 कैटिगरी में बांटा जाता है:
थावरम : जड़ी बूटियों (हर्बल) से बनी दवा
थाथू : इनऑर्गैनिक पदार्थों से बनी दवा
जंगामम : जानवरों के उत्पादों से बनी दवा
5. सिद्ध में इलाज
सिद्ध के तहत किए जाने वाले इलाज को 3 अलग-अलग कैटिगरी में बांटा जा सकता है:
देव मारुथुवम या दैवीय पद्धति जिसमें धातु और खनिज से प्राप्त की गई दवा के इस्तेमाल पर फोकस किया जाता है
मानिदा मारुथुवम या तर्कसंगत पद्धति जिसमें जड़ी बूटियों से तैयार की गई दवाइयों का इस्तेमाल होता है
असुर मारुथुवम या सर्जिकल पद्धति जिसमें चीरा लगाया जाता है और ऑपरेशन होता है
सिद्ध चिकित्सा के तहत किए जाने वाले इलाज में अलग-अलग दवाइयों के साथ ही योग और प्राणायाम भी शामिल है ताकि व्यक्ति को पूरी तरह से स्वस्थ बनाकर उसे दीर्घकालीन जीवन दिया जा सके.
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
