September 09, 2026
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    मकर संक्रांति पर बन रहे हैं सुंदर और शुभ ग्रह संयोग, बढ़ेगा पर्व का महत्व

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    धर्म संसार /शौर्यपथ / साल 2021 में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जा रही है। इस दिन पर्व का का पुण्य काल 8 घंटे का रहेगा।
    यह सुबह 8 बजकर 30 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 46 मिनट तक होगा। शास्त्रों के अनुसार इस दौरान स्नान-दान से कई गुना फल प्राप्त होता है। मकर संक्रांति पर मकर राशि में कई महत्वपूर्ण ग्रह एक साथ गोचर करेंगे। इस दिन सूर्य, शनि, गुरु, बुध और चंद्रमा मकर राशि में रहेंगे। जो एक शुभ योग का निर्माण करते हैं। इसीलिए इस दिन किया गया दान और स्नान जीवन में बहुत ही पुण्य फल प्रदान करता है और सुख समृद्धि लाता है।
    इस वर्ष मकर संक्रांति पर सूर्य, शनि, गुरु, बुध और चंद्रमा मकर राशि में होंगे। इस स्थिति को मकर संक्रांति के लिए बेहद शुभ फलदायी माना गया है।
    इस दिन सूर्यदेव के साथ इन सब ग्रहों का पूजन करें। सूर्यदेव के साथ नवग्रहों का विधि-विधान से पूजा करने पर व्यक्ति को मनचाहा वरदान प्राप्त होता है।
    मकर संक्रांति के दिन अगर दान किया जाए तो इसका महत्व बेहद विशेष होता है। इस दिन व्यक्ति को अपने सामर्थ्यनुसार दान देना चाहिए। साथ ही पवित्र नदियों में स्नान करना चाहिए। इस दिन खिचड़ी का दान देना विशेष फलदायी माना जाता है। साथ ही गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक आदि का प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
    जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर चलता है, इस दौरान सूर्य की किरणों को अशुभ माना गया है, लेकिन जब सूर्य पूर्व से उत्तर की ओर गमन करने लगता है, तब उसकी किरणें शुभता, सेहत और शांति को बढ़ाती हैं। जो आध्यात्मिक क्रियाओं से जुड़े हैं उन्हें शांति और सिद्धि प्राप्त होती है। अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो पूर्व के कड़वे अनुभवों को भुलकर मनुष्य आगे की ओर बढ़ता है।
    स्वयं भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि, उत्तरायण के 6 माह के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं, तब पृथ्वी प्रकाशमय होती है, अत: इस प्रकाश में शरीर का त्याग करने से मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है और वह ब्रह्मा को प्राप्त होता है। महाभारत काल के दौरान भीष्म पितामह जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। उन्होंने भी मकर संक्रांति के दिन शरीर का त्याग किया था।
    इस बार कब है मकर संक्रांति? जानिए महत्व, मान्यता, मुहूर्त और मंत्र
    हर साल जनवरी की 14 या 15 तारीख को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है। इस साल यह त्योहार 14 जनवरी को मनाया जाएगा। हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का त्योहार विशेष महत्व रखता है। इस दिन श्रद्धालु भक्ति-भाव से भगवान सूर्य की उपासना करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मकर संक्रांति वाले दिन भगवान सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, अन्य राशि प्रवेश से यह प्रवेश अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना गया है।
    मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य के साथ-साथ भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और मनुष्य का सोया नसीब जाग जाता है। इस दिन गुड़ और तिल का दान किया जाता है, साथ ही खिचड़ी का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति के दिन स्नान का भी विशेष महत्व है। इस दिन प्रात:काल उठकर पवित्र नदी में स्नान करने से पुण्य मिलता है।
    मकर संक्रांति व्रत महत्व: हिंदू पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र भगवान शनि के पास जाते हैं। उस समय भगवान शनि मकर राशि का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। शनि, मकर राशि के देवता हैं इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाता है, तो उनकी सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं।
    मकर संक्रांति का महाभारत में भी वर्णन किया गया है, जो भीष्म पितामह के जीवन से जुड़ी हुई है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था।
    युद्ध में जब वह बाण की शैय्या पर लेटे हुए थे, तब वे अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहे थे, क्योंकि उनका मानना था कि उत्तरायण में प्राण त्यागने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।
    मकर संक्रांति तिथि और शुभ मुहूर्त: इस साल 14 जनवरी को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाएगा।
    इस साल पुण्य काल के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 8.30 बजे से 12.30 बजे तक है, जिसकी अवधि 4 घंटे 26 मिनट है वहीं, महापुण्य काल का समय सुबह 8.03 से 8.27 तक है, यानी यह अवधि केवल 24 मिनट की है।
    मकर राशि में 5 ग्रहों का संयोग
    मकर संक्रांति पर मकर राशि में कई महत्वपूर्ण ग्रह एक साथ गोचर करेंगे। इस दिन सूर्य, शनि, गुरु, बुध और चंद्रमा मकर राशि में रहेंगे। जोकि एक शुभ योग का निर्माण करते हैं। इसीलिए इस दिन किया गया दान और स्नान जीवन में बहुत ही पुण्य फल प्रदान करता है और सुख समृद्धि लाता है।
    मकर संक्रांति सूर्य मंत्र : ॐ ह्रीम ह्रींम ह्रौमं स: सूर्य्याय नमः
    मकर संक्रांति के दिन इस विशेष सूर्य मंत्र का जाप किया जाना चाहिए।
    वर्ष 2021 में मकर संक्रांति किस वाहन पर आ रही है, जानिए पुण्यकाल का समय
    मकर संक्रांति के भिन्न-भिन्न रूप, जानिए रोचक 6 बातें
    हिन्दू महीने के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और तभी से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। उत्तरायन अर्थात उस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। इसे सोम्यायन भी कहते हैं। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। अत: यह पर्व 'उत्तरायन' के नाम से भी जाना जाता है। मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के 6 मास के समयांतराल को उत्तरायन कहते हैं। यह त्योहार संपूर्ण भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी विभिन्न रूप में मनाया जाता है।
    इस दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं। मकर संक्रांति के इस पर्व को भारत के अलग-अलग राज्यों में वहां के स्थानीय तरीकों से मनाया जाता है।
    1. पोंगल : दक्षिण भारत में मकर संक्रांति का त्योहार पोंगल के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार गोवर्धन पूजा, दिवाली और मकर संक्रांति का मिला-जुला रूप है। पोंगल विशेष रूप से किसानों का पर्व है। यह उत्सव लगभग 4 दिन तक चलता है। लेकिन मुख्य पर्व पौष मास की प्रतिपदा को मनाया जाता है। पोंगल अर्थात खिचड़ी का त्योहार। पोंगल के पहले अमावस्या को लोग बुरी रीतियों का त्यागकर अच्छी चीजों को ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करते हैं। यह कार्य 'पोही' कहलाता है तथा जिसका अर्थ है- 'जाने वाली।' पोंगल का तमिल में अर्थ उफान या विप्लव होता है। पोही के अगले दिन अर्थात प्रतिपदा को दिवाली की तरह पोंगल की धूम मच जाती है।
    2.लोहड़ी : पंजाब और हरियाणा एवं इनके प्रभाव क्षेत्र में इसे लोहड़ी कहते हैं। लोहड़ी बसंत के आगमन के साथ 13 जनवरी, पौष महीने की आखरी रात को मनाया जाता है। इसके अगले दिन माघ महीने की सक्रांति को माघी के रूप में मनाया जाता है। वैसाखी त्योहार की तरह लोहड़ी का सबंध भी पंजाब के गांव, फसल और मौसम से है। लोहड़ी की संध्या को लोग लकड़ी जलाकर अग्नि के चारों ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं और आग में रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति देते हैं। अग्नि की परिक्रमा करते और आग के चारों ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं। इस दौरान रेवड़ी, खील, गज्जक, मक्का खाने का आनंद लेते हैं।
    3. बीहू : बिहू असम में फसल कटाई का प्रमुख त्योहार है। यह फसल पकने की खुशी में मनाया जाता है। इसी त्योहार को पूर्वोत्तर क्षेत्र में भिन्न भिन्न नाम से मनाते हैं। एक वर्ष में यह त्योहार तीन बार मनाते हैं। पहला सर्दियों के मौसम में पौष संक्रांति के दिन, दूसरा विषुव संक्राति के दिन और तीसरा कार्तिक माह में मनाया जाता है। पौष माह या संक्राति को भोगाली बिहू, विषुव संक्रांति को रोंगाली बिहू और कार्तिक माह में कोंगाली बिहू मनाया जाता है।
    4. चहार-शंबे सूरी : ईरान में भी नववर्ष का त्योहार इसी तरह मनाते हैं। यह त्योहार भी लोहड़ी से ही प्रेरित है जिसमें आग जलाकर मेवे अर्पित किए जाते हैं। मसलन, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में मनाई जाने वाली लोहड़ी और ईरान का चहार-शंबे सूरी बिल्कुल एक जैसे त्योहार हैं। इसे ईरानी पारसियों या प्राचीन ईरान का उत्सव मानते हैं। यह त्योहार नौरोज या नवरोज के एक दिन पहले मनाया जाता है।
    नौरोज़ या नवरोज़, ईरानी नववर्ष का नाम है, जिससे पारसी धर्म के लोग मनाते हैं, परंतु ईरान के शियाओं भी इस त्योहार को इसलिए मनाते हैं क्योंकि यह उनकी प्राचीन संस्कृति का प्रमुख त्योहार है। यह मूलत: प्रकृति प्रेम का उत्सव है। प्राचीन परंपराओं व संस्कारों के साथ नौरोज का उत्सव न केवल ईरान ही में ही नहीं बल्कि कुछ पड़ोसी देशों में भी मनाया जाता है। पश्चिम एशिया, मध्य एशिया, काकेशस, काला सागर बेसिन और बाल्कन में इसे 3,000 से भी अधिक वर्षों से मनाया जाता है। यह ईरानी कैलेंडर के पहले महीने (फारवर्दिन) का पहला दिन भी है।
    5. पतंग महोत्सव : गुजरात सहित कई राज्यों में यह पर्व 'पतंग महोत्सव' के नाम से भी जाना जाता है। पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण है कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना। यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में सुबह का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थवर्द्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। अत: उत्सव के साथ ही सेहत का भी लाभ मिलता है।
    6. संक्रांति उत्सव : कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने का, तिल-गुड़ खाने का तथा सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व है। यह दिन दान और आराधना के लिए महत्वपूर्ण है। मकर संक्रांति से सभी तरह के रोग और शोक मिटने लगते हैं। माहौल की शुष्कता कम होने लगती है। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है। महाराष्ट्र में भी इसे संक्रांति कहते हैं। इस दिन महाराष्ट्र में महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं।
    अन्य : इसके अलावा गुजरात और उत्तराखंड में इसे उत्तरायण उत्सव कहते हैं। हरियाणा, हिमाचल और पंजाब में इसका नाम माघी भी है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे खिचड़ी उसत्व कहते हैं।
    भारतीय उममहाद्वीप के अन्य देशों में जैसे बांग्लादेश में पौष संक्रान्ति, नेपाल में माघे संक्रान्ति या खिचड़ी संक्रान्ति, थाईलैण्ड में सोंगकरन, लाओस में पि मा लाओ, म्यांमार में थिंयान, कम्बोडिया में
    मोहा संगक्रान और श्री लंका में पोंगल एवं उझवर तिरुनल कहते हैं।
    इस बार मकर संक्रांति आ रही है श्रवण नक्षत्र में, जानिए कैसा होगा भविष्यफल
    पृथ्वी साढ़े 23 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तब वर्ष में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है। वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है। भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है जिसमें से 4 संक्रांतियां महत्वपूर्ण होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति। जानिए किस नक्षत्र में आने वाली संक्राति कैसी होती है। दरअसल ये मकर संक्रांति के प्रकार है।
    नक्षत्र युक्त संक्रांति :
    1. 27 या 28 नक्षत्र को सात भागों में विभाजित हैं-
    2. ध्रुव (या स्थिर)- उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी।
    3. मृदु- अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष।
    4. क्षिप्र (या लघु)- हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, उग्र- पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा।
    5. चर- पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति, शतभिषक।
    6. क्रूर (या तीक्ष्ण)- मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा।
    7. मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण)- कृत्तिका, विशाखा।
    उक्त नक्षत्रों से पता चलता है कि इस बार की संक्रांति कैसी रहेगी। इस बार संक्रांति का नक्षत्र श्रवण है अर्थात इसकी प्रकृति चर है। चर नक्षत्र शुभ फलदायी होता है। अर्थात इस बार का संक्रांति वर्ष सभी जनों के लिए शुभफल देने वाली सिद्ध होगी। मतलब यह कि सभी का भविष्य शुभ और सफल फलदायी होगा।

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