July 25, 2026
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    ये 5 समय शिवजी के, सावधानी रखना जरूरी, पूजा का होता है असर

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    प्रदोष व्रत कथा एवं प्रदोष व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं, जानिए
    धर्म संसार /शौर्यपथ /प्रत्येक माह में जिस तरह दो एकादशी होती है उसी तरह दो प्रदोष भी होते हैं। त्रयोदशी (तेरस) को प्रदोष कहते हैं। हिन्दू धर्म में एकादशी को विष्णु से तो प्रदोष को शिव से जोड़ा गया है। दरअसल, इन दोनों ही व्रतों से चंद्र का दोष दूर होता है। आओ जानते हैं संक्षिप्त में कि इसकी व्रत कथा क्या है और इस दौरान क्या खाना या नहीं खाना चाहिए।
    प्रदोष व्रत कथा : प्रदोष को प्रदोष कहने के पीछे एक कथा जुड़ी हुई है। संक्षेप में यह कि चंद्र को क्षय रोग था, जिसके चलते उन्हें मृत्युतुल्य कष्टों हो रहा था। भगवान शिव ने उस दोष का निवारण कर उन्हें त्रयोदशी के दिन पुन:जीवन प्रदान किया था अत: इसीलिए इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा। हालांकि प्रत्येक प्रदोष की व्रत कथा अलग अलग है। स्कंद पुराण में प्रदोष व्रत के महामात्य का वर्णन मिलता है। इस व्रत को करने से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। इसमें एक विधवा ब्राह्मणी और शांडिल्य ऋषि की कथा के माध्यम से इस व्रत की महिमा का वर्णन मिलेगा।
    पद्म पुराण की एक कथा के अनुसार चंद्रदेव जबअपनी 27 पत्नियों में से सिर्फ एक रोहिणी से ही सबसे ज्यादा प्यार करते थे और बाकी 26 को उपेक्षित रखते थे जिसके चलते उन्हें श्राप दे दिया था जिसके चलते उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। ऐसे में अन्य देवताओं की सलाह पर उन्होंने शिवजी की आराधना की और जहां आराधना की वहीं पर एक शिवलिंग स्थापित किया। शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें न केवल दर्शन दिए बल्कि उनका कुष्ठ रोग भी ठीक कर दिया। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इस स्थान का नाम 'सोमनाथ' हो गया।
    प्रदोष व्रत में क्या खाएं और क्या नहीं :
    1. प्रदोष काल में उपवास में सिर्फ हरे मूंग का सेवन करना चाहिए, क्योंकि हरा मूंग पृथ्‍वी तत्व है और मंदाग्नि को शांत रखता है।
    2. प्रदोष व्रत में लाल मिर्च, अन्न, चावल और सादा नमक नहीं खाना चाहिए। हालांकि आप पूर्ण उपवास या फलाहार भी कर सकते हैं।
    प्रदोष व्रत की विधि: व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले उठें। नित्यकर्म से निपटने के बाद सफेद रंग के कपड़े पहने। पूजाघर को साफ और शुद्ध करें। गाय के गोबर से लीप कर मंडप तैयार करें। इस मंडप के नीचे 5 अलग अलग रंगों का प्रयोग कर के रंगोली बनाएं। फिर उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और शिव जी की पूजा करें। पूरे दिन किसी भी प्रकार का अन्य ग्रहण ना करें।
    शिवलिंग विन्यास के 5 रहस्य
    शिवलिंग का शास्त्रों में अर्थ बताया गया है परम कल्याणकारी शुभ सृजन ज्योति। संपूर्ण ब्रह्मांड और हमारा शरीर इसी प्रकार है। भृकुटी के बीच स्थित हमारी आत्मा या कहें कि हम स्वयं भी इसी तरह हैं... बिंदु रूप। वैसे तो शिवलिंग में कई रहस्य छुपे हैं जैसे सोना बनाने की विधि और ज्ञान प्राप्त करने का जरिया। परंतु हम यहां पर शिवलिंग के विन्यास को संक्षिप्त में जानेंगे।
    शिवलिंग का विन्यास :
    1. शिवलिंग के 3 हिस्से होते हैं। पहला हिस्सा जो नीचे चारों ओर भूमिगत रहता है। मध्य भाग में आठों ओर एक समान पीतल बैठक बनी होती है। अंत में इसका शीर्ष भाग, जो कि अंडाकार होता है जिसकी कि पूजा की जाती है।
    2. इस शिवलिंग की ऊंचाई संपूर्ण मंडल या परिधि की एक तिहाई होती है।
    3. ये 3 भाग ब्रह्मा (नीचे), विष्णु (मध्य) और शिव (शीर्ष) के प्रतीक हैं।
    4. शीर्ष पर जल डाला जाता है, जो नीचे बैठक से बहते हुए बनाए गए एक मार्ग से निकल जाता है।
    5. प्राचीन ऋषि और मुनियों द्वारा ब्रह्मांड के वैज्ञानिक रहस्य को समझकर इस सत्य को प्रकट करने के लिए विविध रूपों में इसका स्पष्टीकरण दिया गया है। संपूर्ण ब्रह्मांड उसी तरह है जिस तरह कि शिवलिंग का रूप है जिसमें जलाधारी और ऊपर से गिरता पानी है। शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा और उन पिंडों की तरह है, जहां जीवन होने की संभावना है। वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनंत ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही शिवलिंग है।
    ये 5 समय शिवजी के, सावधानी रखना जरूरी, पूजा का होता है असर
    भगवान शिव और भगवान विष्णु की पूजा के अलग अलग समय नियुक्त हैं। यदि सही समय में सावधानी एवं नियम का पालन करके शिवजी की पूजा या आराधना की जाए तो उसका तुरंत ही असर होता है। यदि आप पूजा नहीं करते हैं तो कम से कम इन दिनों में आपको पवित्र बने रहना आवश्यक है अन्यथा आप मुसीबत में फंस सकते हैं तो आओ जानते हैं कि शिवजी के कौनसे 5 ऐसे समय है जबकि हमें सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि इस समय में शिवजी ही नहीं उनके गण में उनके साथ सक्रिय रहते हैं।
    1.सोमवार : सोमवार शिवजी का खास दिन है इस दिन उनकी पूजा और आराधना होती है। इस दिन का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।

    2.प्रदोष काल : यदि आपको किसी अमंगल से बचना हो तो शिवजी के प्रदोष काल को जानना जरूरी है। हर दिन प्रदोष काल होता है। सूर्यास्त से दिनअस्त तक का समय भगवान ‍'शिव' का समय होता है जबकि वे अपने तीसरे नेत्र से त्रिलोक्य (तीनों लोक) को देख रहे होते हैं और वे अपने नंदी गणों के साथ भ्रमण कर रहे होते हैं। इस काल में भूतों के स्वामी भगवान रुद्र का जो अपराधी होता है कठोर दंड पाता है। इस वक्त भोजन, पानी, संभोग, यात्रा, बहस और हर तरह की वार्तालाप करने की मनाही है। इस काल को धरधरी का काल कहते हैं जबकि राक्षसादि प्रेत योनि की आत्माएं सक्रिय रहती है। इस समय जो पिशाचों जैसा आचरण करते हैं, वे नरकगामी होते हैं।
    3.मासिक शिवरात्रि : हर माह एक शिवरात्रि होती है जिसे मासिक शिवरात्रि कहते हैं। हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। मासिक शिवरात्रि के व्रत का बहुत अधिक महत्व होता है. इस दिन व्रत रखने से भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    4. श्रावण माह की शिवरात्रि : जब प्रदोष श्रावण माह में आता है तो वह बड़ी शिवरात्रि मानी जाती है। श्रावण मास की चतुर्दशी की शिवरात्रि भी धूम-धाम से मनाई जाती है।
    5.महाशिवरात्रि : फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी पर पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है, जिसे बड़े ही हषोर्ल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है। ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि देव भगवान श्रीशिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।

    फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।
    शिवलिंगतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ:॥
    ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चंदमा सूर्य के नजदीक होता है। उसी समय जीवनरूपी चंद्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। इसलिए इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने का विधान है। प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या जलरात्रि भी कहा गया है। इस दिन भगवान शंकर की शादी भी हुई थी। इसलिए रात में शंकर की बारात निकाली जाती है। रात में पूजा कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेल पत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

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