July 25, 2026
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    श्रीराम की वानर सेना के 2 युथपति मैन्द- द्विविद ने महाभारत के पांडव पुत्र को किया था परास्त

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    भरतजी के वार से पहाड़ सहित गिर पड़े थे रामभक्त हनुमान
    धर्म संसार /शौर्यपथ / राम के छोटे भाई भरत राजा दशरथ के दूसरे पुत्र थे। उनकी माता कैकयी थी। उनके अन्य भाई थे लक्ष्मण और शत्रुघ्न। उनकी पत्नी का नाम मांडवी और पुत्रों के नाम तक्ष और पुष्कल थे। परंपरा के अनुसार राम को गद्दी पर विराजमान होना था लेकिन मंथरा के भड़काने पर दशरथ पत्नी कैकेयी ने दशरथ से अपने वरदान मांग लिए। वरदान में राम को 14 वर्ष का वनवास और अपने पुत्र भरत को राजसिंहासन देने का वचन लिया। भरत ने इसका घोर विरोध किया, लेकिन अंतत: भरत को राजभार सौंपा दिया। राजा भरत ने सिंहासन पर राम की चरण पादुका रखकर 14 वर्ष तक राज किया। राम और भरत का मिलाप दो बार होता है जो कि बहुत ही चर्चित है। पहला चित्रकूट में और दूसरा नंदीग्राम में। भरतजी नंदीग्राम में रहकर संपूर्ण राज्य की देखरेख करते थे। उसी दौरान यह घटना घटी।
    रामायण में इस बात का उल्‍लेख किया गया है कि जब भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्‍मण को मेघनाद ने युद्ध के दौरान घायल कर दिया था तो संजीवनी बूटी लेने के लिए हनुमानजी को भेजा गया था। दरअसल, राम-रावण युद्ध के दौरान जब रावण के पुत्र मेघनाद ने शक्तिबाण का प्रयोग किया तो लक्ष्मण सहित कई वानर मूर्छित हो गए थे। जामवंत के कहने पर हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने द्रोणाचल पर्वत की ओर गए।
    हनुमानजी को जब बूटी की पहचान नहीं हुई, तब उन्होंने पर्वत के एक भाग को उठाया और वापस लौटने लगे। रास्ते में उनको कालनेमि राक्षस ने रोक लिया और युद्ध के लिए ललकारने लगा। कालनेमि राक्षस रावण का अनुचर था। रावण के कहने पर ही कालनेमि हनुमानजी का रास्ता रोकने गया था। लेकिन रामभक्त हनुमान उसके छल को जान गए और उन्होंने तत्काल उसका वध कर दिया।
    आकाश में पर्वत को एक हाथ में लेकर उड़ते हुए उनके मन में अयोध्या को देखने की इच्छा जागृत हुई तो लौटते वक्त वे अयोध्या के आकाश से गुजर रहे थे। जब भरतजी ने यह नजारा देखा की कोई विशालकाय वानर हाथ में पहाड़ लेकर अयोध्या के आकाश से गुजर रहा है तो उन्हें लगा कि यह कोई शत्रु है। तब भारतजी ने शत्रु समझकर हनुमानजी पर वार किया था जिसके चलते हनुमानजी नीचे गिर पड़े।
    बाद में हनुमानजी के बताने पर कि मैं कौन ही और क्यों यह पहाड़ लेकर जा रहा हूं। जब भरतजी को यह पता चला तो वे बहुत पछताए और रोए तथा हनुमानजी से क्षमा मांगी। फिर हनुमानजी पुन: उस पहाड़ा को उठाकर जाने लगे तब पहाड़ का छोटासा हिस्‍सा वहीं गिर गया था। अयोध्या में आज उस छोटे से हिस्से को मणि पर्वत कहते हैं। मणि पर्वत की ऊंचाई 65 फीट है। यह पर्वत कई मंदिरों का घर है। अगर आप पहाड़ी की चोटी पर खड़े होते हैं तो यहां से पूरे शहर और आसपास के क्षेत्रों का मनोरम दृश्‍य देख सकते हैं।
    श्रीराम की वानर सेना के 2 युथपति मैन्द- द्विविद ने महाभारत के पांडव पुत्र को किया था परास्त
    प्रभु श्रीराम जब सीता माता की खोज करते हुए कर्नाटक के हम्पी जिला बेल्लारी स्थित ऋष्यमूक पर्वत पर्वत पहुंचे तो वहां उनकी भेंट हनुमानजी और सुग्रीवजी से हुई। उस काल में इस क्षेत्र को किष्‍किंधा कहा जाता था। यहीं पर हनुमानजी के गुरु मतंग ऋषि का आश्रम था। श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले अपनी सेना का गठन किया था जिसमें एक वानर सेना भी थी। वानर सेना का कामकाज सुग्रीव के जिम्मे था। आओ जानते हैं कि वानर सेना में कौन कौन था और कौन थे वानर सेना के दो खास भाई।
    वानर सेना : वानर सेना में सुग्रीव, अंगद, हनुमानजी, दधिमुख (सुग्रीव का मामा), नल, नील, क्राथ, केसरी (हनुमानजी के पिता) आदि कई महान योद्धा थे जिसमें से मैन्द- द्विविद नामक दो भाई भी यूथ पति थे। हर झूंड का एक सेनापति होता था जिसे यूथपति कहा जाता था।

    मैन्द- द्विविद : द्विविद सुग्रीव के मन्त्री और मैन्द के भाई थे। ये बहुत ही बलवान और शक्तिशाली थे, इनमें दस हजार हाथियों का बल था। महाभारत सभा पर्व के अनुसार किष्किन्धा को पर्वत-गुहा कहा गया है और वहां वानरराज मैन्द और द्विविद का निवास स्थान बताया गया है। द्विविद को भौमासुर का मित्र भी कहा गया है। ये दोनों भाई दीर्घजीवी थे। रामायण के बाद भी ये जिंदा रहे और महाभारत काल में भी इनकी उपस्थिति मानी गई थी।
    यह भी कहा जाता है कि एक बार महाभारत के सहदेव किष्किन्धा नामक गुफा में जा पहुंचे। वहां वानरराज मैन्द और द्विविद के साथ उन्होंने सात दिनों तक युद्ध किया था। परंतु वे उन दोनों महान योद्धाओं का कुछ बिगाड़ नहीं सके। तब दोनों वानर भाई प्रसन्न होकर सहदेव से बोले- 'पाण्डवप्रवर! तुम सब प्रकार के रत्नों की भेंट लेकर जाओ। परम बुद्धिमान धर्मराज के कार्य में कोई विघ्न नही पड़ना चाहिये।'
    व्यापार नहीं चल रहा है तो आजमाएं बजरंगबली के 3 उपाय
    नौकरी-रोजगार की तलाश में हैं और हर तरफ से निराश हो गए हैं तो इस मंगलवार के दिन आजमाएं यह 2 उपाय।
    पहला उपाय -
    आप बेरोजगार है या आपका व्यापार नहीं चल रहा है तो आप मंदिर में बैठकर 11 मंगलवार तक सुंदरकांड का पाठ करें। यह पाठ शुरू करने के लिए हनुमान जयंती के दिन चुनेंगे तो अतिउत्तम रहेगा।
    दूसरा उपाय-
    यदि आप नौकरी पाना चाहते हैं तो नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाएं, तो जेब में लाल रूमाल या कोई लाल कपड़ा रखें लेकिन यह कपड़ा या रूमाल बजरंगबली के चरणों में रखा हुआ होना चाहिए।
    तीसरा उपाय-
    प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और प्रति मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर जाएं। हो सके तो पांच शनिवार या मंगलवार को हनुमान जी को चोला चढ़ाएं। हनुमान जी को पान विशेष पसंद है। अत: 11 मंगलवार उन्हें पान और पूरी सुपारी अलग से चढ़ाएं।

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