July 23, 2026
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    राधा की सखियों संग महारास और सूरदास का पूर्व जन्म

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    धर्म संसार / शौर्यपथ / गर्ग मुनि के पास एक ऋषि आकर कहते हैं कि गुरुदेव आश्रम द्वार पर एक अंधा गाने वाला आया है और आपसे भेंट करने की आज्ञा चाहता है। गर्ग मुनि कहते हैं कि उस महान कलाकार को बड़े आदर के साथ ले आओ और हमारी कुटिया में बिठाओ।

    यह सुनकर अक्रूरजी कहते हैं कि ये लीजिये, जिसकी दृष्टि की आप प्रशंसा कर रहे थे वो तो दृष्टिहिन निकला। तब गर्ग मुनि कहते हैं कि मैंने दृष्टि नहीं दूरदृष्टि की बात कही थी। चलिए...दोनों उठकर अंधे गायक से मिलने चले जाते हैं। एक ऋषि उन्हें आसन पर बिठाते हैं। गर्ग मुनि कहते हैं बिराजिए।
    वह अंधा गायक गर्ग मुनि के श्रीचरणों में प्रणाम करता है। गर्ग मुनि आशीर्वाद देकर कहते हैं बिराजिये कविराज। कहिये क्या आज्ञा है? यह सुनकर वह अंधा गायक आंखों में आंसू भरकर कहता है प्रभु आप स्वयं ही ब्रह्माजी के पुत्र हैं। इसलिए आपको सर्वसमर्थ जानकर एक प्रार्थना लेकर आया हूं। तब गर्ग मुनि कहते हैं कि हम यथा शक्ति आपकी आज्ञा का पालन करेंगे, कहिये।

    वह गायक कहता है कि आपका आशीर्वाद व्यथा नहीं जा सकता। इसलिए मुझे एक आशीर्वाद चाहिए। सुना है कि भगवान कृष्ण रूप में अवतार लेकर इस समय धरती पर विराजमान हैं।... यह सुनकर अक्रूरजी को आश्चर्य होने लगता है।
    आगे अंधा गायक कहता है मुझे केवल उनके दर्शन मात्र के लिए थोड़ी देर के लिए ही सही आंखें प्रदान कर दीजिए। जिनसे मैं उन्हें एक बार देख लूं। फिर भले ही आप मुझे नेत्रहिन कर दीजिए। यह सुनकर गर्ग मुनि कहते हैं कि आपको आंखें प्रदान करना कोई मुश्किल काम नहीं। परंतु एक बात का उत्तर दीजिए आपके मन के अंतरमन में अभी तक उनके दर्शन नहीं हुए?

    तब आंखें बंद करके वह श्रीकृष्ण को अपने अंतरमन में देखते हैं और कहते हैं कि मेरे मन ने एक आलौकिक बालक को शीशु अवस्था से लेकर बड़े होते हुए देखा है। क्या यह वही है? तब गर्ग मुनि कहते हैं कि हां ये वही है। यह सुनकर वह अंधे बाबा प्रसन्न हो जाते हैं। तब गर्ग मुनि कहते हैं कि ये रूप बड़े-बड़े तपस्वियों को भी इस प्रकार स्पष्ट रूप से नहीं दिखता जिस प्रकार आप देख रहे हैं और वह इसलिए कि आपकी दिव्य दृष्टि से आप एक ही दृश्य देख रहे हैं और यदि आपके चक्षू खोल दिए जाए तो आपको अनेक दृश्‍य दिखाई देंगे। इसलिए सोच लीजिए इसी एक ही दिव्य रूप को मन में स्थिर रखना है या माया द्वारा निर्मित अनेक रूपों को?
    यह सुनकर वह अंधा गायक कहता है कि अब मुझे समझ में आया कि प्रभु ने मुझे ये नयनहिन शरीर देकर मुझ पर कितनी बड़ी कृपा की है। इसके बाद वह अंधा गायक कहता है कि आप महान ज्योतिष हैं इसलिए हे महामुनि आप मुझे मेरा भविष्य बता दीजिए। क्या इसी ‍जन्म में मुझे प्रभु चरणों में मुक्ति प्राप्त हो जाएगी?

    यह सुनकर गर्ग मुनि आंखें बंद करके भविष्य में झांकते हैं। यह देखकर अक्रूरजी फिर से आश्चर्य करने लगते हैं। फिर वे आंखें खोलकर कहते हैं कि अभी नहीं कविराज। यह सुनकर कविराज निराश हो जाते हैं। फिर आगे मुनि कहते हैं कि अभी तो आपकी आवश्यकता कलयुग में पड़ेगी। यह सुनकर वह अंधा गायक कहता है कलयुग में?
    मुनि कहते हैं हां, कलयुग में करोड़ों प्राणियों को आपको अपने भक्ति रस में डूबोना है। जब कलयुग में भक्ति का हास होगा तो आपको अपनी दिव्य दृष्टि से प्रभु की लीला दिखाई देने लगेगी और आप उसका वर्णन अपनी वाणी से करेंगे। उस समय भी आपको नैनहिन शरीर की प्राप्त ही होगी। उसी जन्म में आपको मुक्ति भी मिलेगी। यह सुनकर कविराज प्रसन्न होकर वहां से विदा ले लेते हैं।

    फिर गर्ग मुनि कहते हैं कि अक्रूरजी कविराज का भविष्य देखते देखते ज्योतिष विद्या के अनुसार शीघ्र ही आपका भी मानसिक कायाकल्प होने वाला है। जल्द ही आप पर प्रभु की महान कृपा होने वाली है और उस समय आप वह सब ‍देखेंगे जिसे आपका मस्तिष्क अभी तक नहीं मानता। हम देख रहे हैं कि प्रभु की प्रेमलीला अपनी पराकाष्ठा तक पहुंचने वाली है। गोकुल की सारी ब्रज बालाएं एक माह तक कात्यायिनी मां का व्रत रखने के पश्‍चात आज मार्गशीर्ष संक्रांति के दिन अपने मन के अनुसार पति पाने के लिए गौरी पूजन कर रही हैं और उस प्रभु की माया तो देखो कि हर गोपिका श्रीकृष्ण को ही पति रूप में पाने की गुप्त कामना लिए इस व्रत का अनुष्ठान कर रही हैं।
    दूसरी ओर राधा सहित सभी ब्रज बालाओं को गौरी व्रत पूजन करते हुए बताया जाता है। उनकी पूजन और व्रत से प्रसन्न होकर माता गौरी प्रकट होकर कहती है, मांगों क्या चाहिए। यह सुनकर राधा माता गौरी की प्रशंसा करने के बाद कहती हैं कि जिस प्रकार आपने व्रत करके अपना मनवांछित पति पाया उसी प्रकार हम भी अपना मनवांछित पति पाएं। हम सभी को अपना अपना श्रेष्ठ पति प्राप्त हों। यह कहकर सभी गोपिकाएं माता को प्रणाम करती हैं।
    माता अपनी माया से सभी के बीच से राधा को उठाती है जिसे कोई दूसरी सखियां देख नहीं पाती हैं। फिर माता कहती हैं कि हे राधे आप तो श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी हैं और इन सब गोपियों में तो श्रीकृष्ण को ही पति रूप में पाने की कामना हैं और मुझे तो इन सभी गोपियों में आपका ही रूप नजर आता है। फिर भी मैं आपको वर देती हूं कि आपका मनवांछित वर आपको हर जन्म में प्राप्त होगा। चैत्रमास के शुक्ल पक्ष में वृंदावन के रासमंडल में इन समस्त गोपिकाओं के सहित श्रीकृष्‍ण के साथ आपकी रासलीला सम्पन्न होगी।

    फिर सभी गोपिकाएं प्रणाम करके राधा के साथ उठती है तो माता कहती हैं हम तुम सबके हृदय का रहस्य जानते हैं किसके हृदय में किस पति की कामना है वो भी हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा है। हमारा वरदान है कि शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा। आज से तीन मास व्यतीत होने पर जब मनोहर मधुमान का शुक्ल पक्ष आएगा तब तुम सबको अपने अपने मनवांछितकांत की प्राप्त होगी। हमारा ये वचन निष्‍फल नहीं होगा। यह वचन देकर माता चली जाती हैं।
    सभी गोपिकाएं व्याकुल हो तीन माह का इंतजार करती हैं। तीन माह के निश्चित समय पर श्रीकृष्ण मुरली की धुन छेड़ते हैं और सभी गोपिकाएं बैचेन होकर सभी श्रीकृष्ण के पास पहुंच जाती हैं। फिर सभी सखियों के संग प्रभु का महारास होता है। सभी देवता इस नृत्य को देखते हैं और फूल बरसाते हैं और वे भी उनके साथ रास रचाते हैं। श्रीकृष्ण अनेक रूप धरकर सभी सखियों के संग नृत्य करते हैं।

    फिर रामानंद सागर जी महारास का अर्थ बताते हैं और बताते हैं कि आगे चलकर अब श्रीकृष्ण की राजनैतिक लीलाओं और महान यादव वीरों का आततायी कंस से लोहा लेने का समय आ रहा है। जय श्रीकृष्णा।

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