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May 30, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

शौर्यपथ विशेष रिपोर्ट

कभी-कभी कुछ आवाज़ें सिर्फ गीत नहीं गातीं, वे इंसानियत, हौसले और जीवन के सबसे गहरे दर्द को महसूस करा जाती हैं।
असम के तिनसुकिया जिले के रहने वाले 17 वर्षीय युवा गायक ऋषभ दत्ता की आवाज़ भी ऐसी ही थी, जो आज उनके जाने के वर्षों बाद भी लोगों की आंखें नम कर रही है।

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें ऋषभ अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए हाथ में गिटार थामे बेहद शांत और भावुक अंदाज़ में सदाबहार गीत “लग जा गले” और “चन्ना मेरेया” गाते दिखाई दे रहे हैं।
वीडियो में उनके चेहरे पर दर्द साफ दिखाई देता है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा दिखाई देता है — संगीत के प्रति उनका जुनून और जिंदगी से आखिरी पल तक लड़ने का साहस।

दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे थे ऋषभ

ऋषभ दत्ता एक गंभीर और दुर्लभ बीमारी “अप्लास्टिक एनीमिया” (Aplastic Anemia) से पीड़ित थे।
इस बीमारी में शरीर नई रक्त कोशिकाएं बनाना बंद कर देता है, जिससे मरीज की हालत लगातार कमजोर होती चली जाती है।

परिवार ने उन्हें बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। बेंगलुरु के एक अस्पताल में उनका महंगा बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी कराया गया। डॉक्टरों और परिवार को उम्मीद थी कि ऋषभ फिर से सामान्य जिंदगी जी पाएंगे, लेकिन लंबी लड़ाई के बाद 8 जुलाई 2020 को यह युवा कलाकार जिंदगी की जंग हार गया।

आखिरी दिनों का वीडियो बना भावनाओं का आईना

अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान ऋषभ ने डॉक्टरों और नर्सों के सामने गिटार बजाते हुए जो गीत गाए, वही वीडियो आज फिर इंटरनेट पर लोगों को भावुक कर रहा है।
मौत से कुछ कदम दूर खड़ा एक लड़का… लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं, बल्कि मुस्कान…
कमजोर शरीर… लेकिन सुरों में वही आत्मविश्वास…
यही दृश्य लाखों लोगों के दिलों को छू रहा है।

सोशल मीडिया पर लोग उन्हें
“रियल फाइटर”,
“म्यूजिक वॉरियर”
और
“हौसले की मिसाल”
बताकर श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

2019 में ही बन गए थे इंटरनेट सेंसेशन

ऋषभ अपनी मधुर आवाज और सादगी की वजह से वर्ष 2019 के अंत में ही इंटरनेट पर लोकप्रिय हो चुके थे। उनके गाए गीतों को हजारों लोगों ने पसंद किया था।
लेकिन किसी ने शायद यह नहीं सोचा था कि इतनी छोटी उम्र में यह प्रतिभाशाली गायक दुनिया को अलविदा कह देगा।

आज भी जिंदा है ऋषभ की आवाज

ऋषभ दत्ता अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंच रही है।
उनका वायरल वीडियो सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि जिंदगी के आखिरी पल तक उम्मीद, साहस और मुस्कान बनाए रखने का संदेश बन चुका है।

जब भी कोई “लग जा गले…” की वह धीमी और कांपती हुई आवाज सुनता है, तो एहसास होता है कि कुछ कलाकार शरीर से चले जाते हैं, लेकिन उनकी आत्मा उनकी कला में हमेशा जिंदा रहती है।

क्या 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपा जाएगा मामला? केंद्र के हलफनामे पर भी होगी तीखी बहस

नई दिल्ली। देश की चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में अब 19 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से जुड़े नए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच — Justice Dipankar Datta और Justice Satish Chandra Sharma — मामले की अगली सुनवाई करेगी।

यह मामला केवल नियुक्ति प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था Election Commission of India की निष्पक्षता, स्वायत्तता और लोकतंत्र की पारदर्शिता से भी सीधे जुड़ा माना जा रहा है।

संविधान पीठ को भेजे जाने पर बड़ा फैसला संभव

14 मई की सुनवाई के दौरान अदालत में तीखी बहस देखने को मिली थी। अब 19 मई को यह तय हो सकता है कि क्या इस मामले को 5 जजों की संविधान पीठ (Constitutional Bench) के पास भेजा जाएगा।

यदि मामला संविधान पीठ को सौंपा जाता है, तो यह आने वाले समय में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और केंद्र सरकार की भूमिका को लेकर ऐतिहासिक संवैधानिक व्याख्या तय कर सकता है।

केंद्र सरकार के हलफनामे पर उठेंगे सवाल

केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल करना कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है।

इसी बिंदु को लेकर याचिकाकर्ताओं की ओर से कड़ी आपत्ति जताई जा रही है। विपक्षी पक्ष का तर्क है कि यदि चयन प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका कम होती है, तो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

अतिरिक्त दस्तावेज और दलीलें पेश होंगी

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया है कि वे 19 मई को अपने अतिरिक्त दस्तावेज, लिखित तर्क और बची हुई दलीलें अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनवाई आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता से जुड़े व्यापक सवालों को भी प्रभावित कर सकती है।

लोकतंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा

देशभर की निगाहें अब 19 मई की सुनवाई पर टिकी हैं। यह मामला केवल एक कानून की वैधता का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और जनता के भरोसे का भी प्रतीक बन चुका है।

यदि सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर संविधान पीठ गठित करता है, तो यह भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मामलों में शामिल हो सकता है।

 

दुर्ग/शौर्यपथ।
दुर्ग शहर जिला कांग्रेस कमेटी की मासिक बैठक शुक्रवार को राजीव भवन में आयोजित हुई, जिसमें संगठनात्मक गतिविधियों के साथ-साथ आगामी 18 मई को प्रस्तावित दुर्ग नगर पालिका निगम घेराव को लेकर विस्तृत रणनीति तैयार की गई। बैठक में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने नगर निगम की कार्यप्रणाली, कथित भ्रष्टाचार, जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा और प्रशासनिक मनमानी को लेकर तीखा आक्रोश व्यक्त किया।

बैठक में यह स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया गया कि कांग्रेस अब “सड़क से सदन तक” नगर निगम की कार्यप्रणाली के खिलाफ संघर्ष छेड़ने के मूड में है। कांग्रेस नेताओं का कहना था कि दुर्ग की शहरी सरकार के कार्यकाल में विकास के दावे जितने बड़े दिखाई देते हैं, जमीनी स्तर पर उतनी ही गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं।

“भ्रष्टाचार चरम पर, जनता त्रस्त”

बैठक में मौजूद नेताओं ने आरोप लगाया कि नगर निगम में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ता जा रहा है और आम नागरिक मूलभूत सुविधाओं के लिए परेशान हैं। पेयजल, सफाई, सड़क, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, ठेकेदारी व्यवस्था और योजनाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर कांग्रेस ने निगम प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया।

कांग्रेस पदाधिकारियों ने यह भी कहा कि शहर में विकास कार्यों का संतुलन बिगड़ चुका है तथा कई क्षेत्रों में राजनीतिक भेदभाव के आधार पर काम किए जाने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं।

महापौर अलका बागमार की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

बैठक में कई वक्ताओं ने महापौर अलका बागमार की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए। कांग्रेस नेताओं का आरोप रहा कि निगम में निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी नहीं दिखाई देती और कई मामलों में जनप्रतिनिधियों को विश्वास में नहीं लिया जाता।

कांग्रेस का दावा है कि निगम की वर्तमान व्यवस्था में जनहित से अधिक “प्रशासनिक दबाव और राजनीतिक संरक्षण” प्रभावी नजर आ रहा है। पूर्व में भी नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर विभिन्न विवाद और आरोप सामने आते रहे हैं, जिनका उल्लेख करते हुए नेताओं ने कहा कि जनता अब जवाब चाहती है।

 

धीरज बाकलीवाल के नेतृत्व में आंदोलन

शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल के नेतृत्व में 18 मई को प्रस्तावित निगम घेराव को लेकर कार्यकर्ताओं में उत्साह दिखाई दिया। बैठक में बड़ी संख्या में उपस्थित कांग्रेसजनों को संबोधित करते हुए नेताओं ने कहा कि आज की उपस्थिति यह संकेत दे रही है कि कांग्रेस संगठन लगातार मजबूत हो रहा है और जनता का समर्थन भी पार्टी को मिल रहा है।

“जनता की आवाज बुलंद करती रहेगी कांग्रेस”

बैठक के अंत में कांग्रेस नेताओं ने कहा कि पार्टी जनहित के मुद्दों पर लगातार संघर्ष करती रहेगी और यदि नगर निगम प्रशासन ने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया तो आंदोलन और व्यापक होगा।

अब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि 18 मई का प्रस्तावित निगम घेराव दुर्ग की राजनीति में बड़ा शक्ति प्रदर्शन साबित हो सकता है। वहीं, नगर निगम और महापौर पक्ष की ओर से इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

   दुर्ग। शौर्यपथ । दुर्ग नगर पालिक निगम के इतिहास में 'शहर सरकार' का ऐसा रंग-ढंग शायद ही कभी देखा गया हो। जिस कुर्सी पर कभी समन्वय और विकास की राजनीति हुआ करती थी, आज वहां केवल विवादों का 'हाई-वोल्टेज ड्रामा' चल रहा है। निगम गलियारों से लेकर चाय के ठेलों तक अब बस एक ही सुगबुगाहट है—क्या महापौर अलका बाघमार के खिलाफ 'महाभियोग/ अविश्वास प्रस्ताव ' आएगा?
नाराजगी सिर्फ विपक्ष (कांग्रेस) को नहीं है; सत्ता पक्ष के अपने ही पार्षद सामान्य सभा में भेदभाव और वार्डों की उपेक्षा का आरोप लगाकर अपनी ही मुखिया को आईना दिखा चुके हैं। लेकिन हाल ही में जो वाकया हुआ, उसने तो नगर निगम को किसी 'थ्रिलर फिल्म' का सेट बना दिया।

जब बिना किसी विरोध-प्रदर्शन के निगम पहुंच गई 'पुलिस की फौज'
निगम परिसर में उस वक्त हड़कंप मच गया जब बिना किसी धरने, प्रदर्शन या हंगामे के अचानक दो थानों के प्रभारी और सीएसपी दुर्ग लाव-लश्कर के साथ धमक पड़े। चर्चा है कि महापौर ने अन्य विभागों के कार्यपालन अभियंताओं को प्रोटोकॉल का पाठ पढ़ाने के लिए अपने केबिन में बुलाया था।
अधिकारी शांति से चर्चा कर ही रहे थे कि पुलिस की इस 'सरप्राइज एंट्री' ने कई सवाल खड़े कर दिए:
आखिर बिना किसी विवाद के पुलिस प्रशासन को किसने और क्यों फोन घुमाया?
क्या अब शहर सरकार को अपने ही अधिकारियों से संवाद करने के लिए 'खाकी' के साए की जरूरत पड़ रही है?या फिर अधिकारियो को महापौर के व्यवहार पर विश्वास नहीं है ?
सोशल मीडिया पर महापौर का एक वीडियो भी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह भरे मंच से अधिकारियों को तल्ख अंदाज में 'प्रोटोकॉल' की नसीहत देती नजर आ रही हैं। राजनीति के जानकार चुटकी ले रहे हैं कि जनता के बुनियादी मुद्दों पर इतनी सख्ती दिखाई जाती, तो आज शहर की सूरत कुछ और होती।

विकास का 'वन-मैन शो': मंत्री गजेंद्र यादव की सक्रियता से बढ़ीं दूरियां?
एक तरफ जहां महापौर अपनी घटती लोकप्रियता और अंतर्कलह से जूझ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के शिक्षा मंत्री और दुर्ग शहर के विधायक गजेंद्र यादव के जमीनी प्रयासों ने विकास कार्यों की झड़ी लगा दी है। शहर में जो भी बड़े और ऐतिहासिक काम दिख रहे हैं, वे सीधे मंत्री जी के खाते में जा रहे हैं:

स्टेडियम परिसर                               भव्य बैडमिंटन कोर्ट का निर्माण
पॉलिटेक्निक कॉलेज परिसर                अत्याधुनिक स्विमिंग पूल की सौगात
शहरी कनेक्टिविटी केनाल रोड का निर्माण और जेल चौक से पुलगांव चौक तक फोर लेन सड़क की शुरुआत
सौंदर्यीकरण एवं जन-सुविधा राजेंद्र पार्क चौक का कायाकल्प,

गया नगर में सांस्कृतिक भवन, और समृद्धि बाजार में सब्जी मंडी का संधारण

इन सभी बड़े प्रोजेक्ट्स का क्रेडिट (श्रेय) सीधे मंत्री गजेंद्र यादव और उनके समर्थकों को मिल रहा है। इस 'क्रेडिट वॉर' ने महापौर की बेचैनी को और बढ़ा दिया है। लेकिन सवाल यह है कि जनता महापौर को क्रेडिट दे भी तो क्यों?
बदहाली का शिकार दुर्ग: बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती जनता
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सुशासन के संकल्प और उपमुख्यमंत्री व नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव द्वारा राशि की कोई कमी न रखने के बावजूद, दुर्ग नगर निगम बदहाली के नए कीर्तिमान गढ़ रहा है।

निगम की नाकामियों की लंबी फेहरिस्त:
इंदिरा मार्केट की दुर्दशा: व्यापार का मुख्य केंद्र आज पूरी तरह बदहाल है।
सुराना कॉलेज के सामने नरक: गंदगी और बदबूदार वातावरण से छात्र और राहगीर हलाकान हैं।
गुमठी आवंटन में भ्रष्टाचार: आरोप हैं कि इस पूरे खेल में शहरी सरकार की मौन सहमति है।
अवैध कब्जों को संरक्षण: चतुर्भुज राठी जैसे अवैध कब्जाधारियों के साथ मंच साझा करने से भाजपा के 'जीरो टॉलरेंस' के दावे पर सवाल उठ रहे हैं।
सड़क पर अवैध बाजार: शनिवार को चर्चगेट पर लगने वाला अवैध बाजार यातायात और व्यवस्था को ठेंगा दिखा रहा है।

क्या 'साय सरकार' के सुशासन को आईना दिखा रही हैं महापौर?
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहां एक ओर प्रदेश को पारदर्शिता और विकास की पटरी पर दौड़ा रहे हैं, वहीं दुर्ग निगम की यह कार्यप्रणाली सरकार की छवि को बट्टा लगा रही है। हालात ये हैं कि अपनी ही पार्टी के पार्षद अब वार्डों में जनता का सामना करने से कतराने लगे हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह तीखा कटाक्ष भी चल रहा है कि महापौर अलका बाघमार के ऐसे आचरण को देखकर लगता है मानो वह खुद कांग्रेस के साथ मिलकर आगामी चुनावों में भाजपा प्रत्याशी की विदाई की स्क्रिप्ट लिख रही हों।
निगम के भीतर कल हुई 'पुलिसिया ड्रामे' की गूंज अब दुर्ग से निकलकर रायपुर में संगठन के बड़े नेताओं के कानों तक पहुंच चुकी है। देखना दिलचस्प होगा कि सुशासन का दम भरने वाला भाजपा संगठन इस 'स्वघोषित प्रोटोकॉल सरकार' पर कब और क्या एक्शन लेता है, या फिर पार्षदों का बढ़ता असंतोष सीधे 'महाभियोग/ अविश्वास प्रस्ताव ' का रास्ता साफ करेगा!
दुर्ग निगम की इस प्रशासनिक खींचतान और संगठन के भीतर चल रहे इस शीतयुद्ध को लेकर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि समन्वय की कमी विकास कार्यों को पूरी तरह प्रभावित कर रही है?

 

शौर्यपथ विशेष रिपोर्ट | कोंडागांव

सरकारी फाइलों में विकास की चमक भले ही दिखाई दे रही हो, लेकिन कोंडागांव जिले के कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ग्राम तुमड़ीवाल की तस्वीरें और वहां के हालात प्रशासनिक दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं।

एक ओर सरकार हर घर नल, स्वच्छ पेयजल और ग्रामीण विकास के बड़े-बड़े विज्ञापन जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण आज भी गड्ढों और झरिया का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। यह केवल बदहाल व्यवस्था नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीवंत उदाहरण बन चुका है।

“मेढ़क वाले पानी” से बुझ रही प्यास

शौर्यपथ टीम जब ग्राम तुमड़ीवाल पहुंची, तो रास्ते में एक बेहद चिंताजनक दृश्य सामने आया। एक युवक मिट्टी से भरे गड्ढे में जमा पानी को बर्तन से निकालकर पी रहा था। पानी इतना गंदा था कि उसमें कीचड़ और जीव-जंतु साफ दिखाई दे रहे थे।

जब युवक से बात की गई, तो उसकी आवाज में बेबसी साफ झलक रही थी। उसने बताया—

“गांव में पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। जो बोरवेल था, वो भी खराब पड़े-पड़े जवाब दे चुका है। कई बार शिकायत हुई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। मजबूरी में यही पानी पीना पड़ता है।”

यह बयान सिर्फ एक युवक की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल है।

कागजों में योजनाएं, जमीन पर सूखा सच

प्रशासन और जनप्रतिनिधि अक्सर विकास यात्राओं, शिविरों और बैठकों में ग्रामीण सुविधाओं के दावे करते नजर आते हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि योजनाएं धरातल पर उतर रही हैं, तो आखिर ग्रामीण गड्ढों का पानी क्यों पी रहे हैं?

क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी इन गांवों का वास्तविक निरीक्षण किया?
क्या खराब बोरवेल की मरम्मत कराना भी अब प्रशासन के लिए “प्राथमिकता” नहीं रह गई?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर यही हाल रहा, तो ग्रामीणों के स्वास्थ्य और जीवन की जिम्मेदारी कौन लेगा?

बीमारी का खतरा, फिर भी मौन प्रशासन

विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह का दूषित पानी पीने से डायरिया, टाइफाइड, पीलिया और त्वचा संबंधी गंभीर बीमारियां फैल सकती हैं। गर्मी के मौसम में स्थिति और भयावह हो सकती है। इसके बावजूद संबंधित विभागों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

विकास के नारों के बीच दम तोड़ती व्यवस्था

तस्वीरें साफ बता रही हैं कि ग्रामीण भारत के विकास की असली कहानी अभी भी अधूरी है। जब लोग गड्ढों का पानी पीने को मजबूर हों, तब विकास के दावे केवल मंचीय भाषण बनकर रह जाते हैं।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस खबर के बाद हरकत में आता है या फिर यह गांव भी सिर्फ “रिपोर्टों” में ही जिंदा रहेगा।

इस खबर को देखने के लिए हमारे youtube चेनल पर क्लीक करे 

https://youtu.be/0A_9oYx2-po?si=7pMzyi4UdItWxOtK

कोंडागांव-शासन प्रशासन के दावे हुए फेल,
आज भी ग्रामीण झरिया का पानी पीने के लिए मजबूर,
क्या ये ग्रामीण नही देते है शासन को वोट क्या इनकी कोई समस्या का नही होगा उपचार
क्या ऐसे ही गंदे पानी पीने के लिए रहेंगे मजबूर।

कोंडागांव से दीपक वैष्णव की ख़ास रिपोर्

भिलाई। जमीन फर्जीवाड़ा मामले में न्यायालय के आदेश पर पुलिस ने उद्योगपति दंपति के खिलाफ अपराध दर्ज होने के बाद सिमप्लेक्स कास्टिंग लिमिटेड की डायरेक्टर ए 5 सूर्यविहार कालोनी जुनवानी भिलाई निवासी संगीता केतन शाह ने कहा कि ग्राम कोहका में पटवारी हल्का नंबर 14/19 खसरा को होटल को किराए पर दिया गया था। एग्रीमेंट खत्म होने के बाद भी किराएदार उसे खाली नहीं कर रहा था। इस दौरान हुडको निवासी सुनील कुमार सोमन ने संगीता शाह को होटल खाली कराकर देने के लिए एग्रीमेंट करने को कहा था। तब उसके साथ 10 लाख रुपए का एग्रीमेंट किया गया। लेकिन साल भर होने के बाद सुनील सोमन ने होटल को खाली नहीं कराया। उसके रकम को भी वापस लौटा दिया गया था। उसके बाद सुनील सोमन ने षडयंत्र और साजिश करके पुराने एग्रीमेंट का फायदा उठाकर मुझे कहा आपने मेरे साथ जमीन बेचने का सौदा किया है। बचे हुए चालीस लाख रुपए लेकर इस जमीन का रजिस्ट्री करिए। तब संगीता शाह ने कहा करोड़ों की जमीन को पचास लाख में कैसे दु। ये एग्रीमेंट आपने मुझसे जमीन खाली कराने के लिए बनाया था। संगीता शाह ने कहा कि उक्त जमीन करोड़ो रुपए की है उसे कैसे औने-पौने दाम पर बेच सकती हूं। सुनील सोमन पूरी तरह से प्लान तैयार कर सिमप्लेक्स कास्टिंग लिमिटेड और हम पति-पत्नी को बदनाम करने के लिए ऐसा षड्यंत्र रचा गया है। षड्यंत्र कर न्यायालय के माध्यम से अपराध दर्ज करवा दिया। मै तीस वर्षो से कंपनी को संभाल रही हूं भिलाई-दुर्ग के लोग सभी जानते पहचाने है। कभी इस तरह की कोई बात सामने नहीं आई लेकिन सुनील सोमन ने साजिश कर शाह परिवार के ऊपर गलत आरोप लगाकर बदनाम करने का साजिश रचा है। सुनील सोमन ने भरोसे को तोड़कर इस तरह से प्लान तैयार कर हम लोगों को फंसाया है। सुपेला पुलिस से सांठगांठ कर इस तरह का साजिश रचकर बदनाम किया। 

करोड़ो की जमीन को लाखों में कैसे बेचू

सिमप्लेक्स कास्टिंग लिमिटेड डॉयरेक्टर संगीता केतन शाह ने जारी विज्ञप्ति में बताया है कि स्मृति नगर कोहका की मेरी कंपनी जमीन करोड़ो रुपए की है कैसे उसे लाखों में बेच देती। कभी भी सुनील सोमन के साथ जमीन बेचने का कोई भी एग्रीमेंट नहीं हुआ था। जबकी होटल को खाली कराने के लिए यह किया गया था। खाली नहीं कराने की स्थिति में सुनील सोमन सारा रकम भी उसे डबल दिया गया है। मेरी छवि को जिस तरह से धूमिल किया गया है। जल्द उनके चेहरों को भी बेनकाब करुंगी। इस फर्जीवाड़े में कोई सच्चाई नहीं है। इसमें दोनों पति और पत्नी का कोई रोल नहीं है। सिर्फ बदनाम करने के लिए इस तरह का सोमन ने साजिश रचा है। इसकी निषष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

 

नई दिल्ली/शौर्यपथ।
देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 14 मई 2026 को केंद्र सरकार से बेहद कड़े सवाल पूछे। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने चयन समिति की वर्तमान संरचना पर गंभीर चिंता जताई।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने साफ कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि जनता के सामने उसका स्वतंत्र दिखना भी उतना ही आवश्यक है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री शामिल हैं, तब विपक्ष के नेता की मौजूदगी केवल “औपचारिकता” बनकर क्यों रह जाती है?


“स्वतंत्रता का दिखावा क्यों?”

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि तीन सदस्यीय चयन समिति में दो सदस्य सीधे कार्यपालिका से जुड़े हैं। ऐसे में हर निर्णय 2:1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में जाने की संभावना बनी रहती है।

पीठ ने टिप्पणी की कि कोई भी कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री के निर्णय के खिलाफ जाने की स्थिति में शायद ही दिखाई देगा। अदालत ने पूछा कि फिर विपक्ष के नेता को शामिल कर “स्वतंत्रता का दिखावा” क्यों किया जा रहा है?


“समिति में एक भी निष्पक्ष सदस्य क्यों नहीं?”

अदालत ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से सवाल किया कि इतनी महत्वपूर्ण संवैधानिक नियुक्ति प्रक्रिया में एक भी पूर्णतः निष्पक्ष या न्यूट्रल सदस्य क्यों नहीं रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वहां चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल किया जा सकता है, तो चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में उन्हें बाहर क्यों रखा गया?


“कार्यपालिका का वर्चस्व लोकतंत्र के लिए चिंता”

पीठ ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में “Executive Veto” यानी कार्यपालिका का स्पष्ट वर्चस्व दिखाई देता है। इससे विपक्ष के नेता की भूमिका केवल सजावटी (Ornamental) बनकर रह जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के Basic Structure यानी मूल ढांचे का हिस्सा हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर जनता का भरोसा सर्वोच्च महत्व रखता है।


केंद्र सरकार की दलील पर कोर्ट असंतुष्ट

केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने दलील दी कि किसी चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता को उसकी नियुक्ति प्रक्रिया से नहीं, बल्कि पद पर रहते हुए उसके कार्यों और निर्णयों से आंका जाना चाहिए।

हालांकि कोर्ट इस तर्क से संतुष्ट नहीं दिखा। पीठ ने स्पष्ट कहा कि निष्पक्षता और स्वतंत्रता की शुरुआत नियुक्ति प्रक्रिया से ही होनी चाहिए, क्योंकि वही संस्था की विश्वसनीयता की नींव तय करती है।


मूल दस्तावेज तलब, 19 मई को अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2024 में इसी कानून के तहत हुए ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्तियों से जुड़े खोज और चयन प्रक्रिया के मूल रिकॉर्ड अदालत में पेश करने के निर्देश दिए हैं।

मामले की अगली सुनवाई 19 मई 2026 को होगी, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार की ओर से आगे की दलीलें पेश करेंगे।


संवैधानिक विशेषज्ञों की नजर में अहम मामला

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता के भरोसे से भी जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है कि क्या संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभाव सीमित होना चाहिए।

अब देश की निगाहें 19 मई की सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ यह तय हो सकता है कि चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में भविष्य में क्या बदलाव संभव हैं।

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी Central Bureau of Investigation (CBI) के निदेशक चयन को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय चयन समिति में नए निदेशक के नाम पर सहमति नहीं बन पाने के बाद केंद्र सरकार ने मौजूदा सीबीआई निदेशक Praveen Sood के कार्यकाल को एक वर्ष और बढ़ाने का फैसला लिया है। यह निर्णय अब राष्ट्रीय राजनीति और प्रशासनिक पारदर्शिता के बड़े मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।

चयन समिति की बैठक में टकराव

मई 2026 में आयोजित चयन समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi शामिल थे। बैठक के दौरान राहुल गांधी ने चयन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने उम्मीदवारों की “सेल्फ-अप्रेजल” और “360-डिग्री असेसमेंट रिपोर्ट” समिति के सामने प्रस्तुत नहीं की।

राहुल गांधी ने इस प्रक्रिया को “महज औपचारिकता” और “पक्षपातपूर्ण” बताते हुए असहमति नोट सौंपा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि नेता प्रतिपक्ष का पद सरकार के फैसलों पर केवल “रबर स्टैंप” लगाने के लिए नहीं है। नए नामों पर सहमति न बनने के बाद उन्होंने बैठक से खुद को अलग कर लिया।

सरकार ने क्यों बढ़ाया कार्यकाल?

चयन प्रक्रिया में गतिरोध के बीच केंद्र सरकार की कैबिनेट नियुक्ति समिति (ACC) ने प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने का हवाला देते हुए प्रवीण सूद को एक और सेवा विस्तार देने का निर्णय लिया।

1986 बैच के आईपीएस अधिकारी प्रवीण सूद को मई 2023 में पहली बार दो वर्ष के लिए सीबीआई निदेशक नियुक्त किया गया था। मई 2025 में उन्हें पहला विस्तार मिला और अब उनका कार्यकाल मई 2027 तक बढ़ा दिया गया है।

नए दावेदारों की उम्मीदों पर विराम

सीबीआई निदेशक पद की दौड़ में शामिल GP Singh और Shatrughan Singh Kapoor जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति फिलहाल टल गई है। राजनीतिक सहमति नहीं बनने के कारण अब यह मामला और अधिक संवेदनशील माना जा रहा है।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर उठे सवाल

विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को संवैधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता और निष्पक्षता से जोड़कर देख रहा है, जबकि सरकार इसे प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम बता रही है। ऐसे में सीबीआई प्रमुख के चयन को लेकर उठा यह विवाद आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है।

 

मरीजों की पीड़ा, अव्यवस्था और चिकित्सकीय कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल — स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत ने बढ़ाई चिंता

दुर्ग/शौर्यपथ विशेष।
दुर्ग जिला अस्पताल, जिसे जिले का सबसे बड़ा शासकीय स्वास्थ्य संस्थान माना जाता है, इन दिनों गंभीर सवालों और जन असंतोष के केंद्र में आ गया है। करोड़ों रुपये की शासकीय योजनाओं, संसाधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों के बीच मरीजों को राहत मिलने के बजाय लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि सामान्य बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी उपचार देने के बजाय “हायर सेंटर रेफर” करना एक सामान्य प्रक्रिया बनती जा रही है।

सूत्रों और मरीजों से प्राप्त शिकायतों के अनुसार यदि किसी मरीज को आंख, सामान्य सर्जरी अथवा अन्य उपचार की आवश्यकता हो और उसे शुगर या बीपी जैसी सामान्य बीमारी हो, तो कई मामलों में चिकित्सकों द्वारा तत्काल रायपुर रेफर करने की सलाह दी जाती है। जबकि निजी चिकित्सकों का मानना है कि नियंत्रित शुगर और बीपी की स्थिति में ऐसे मरीजों का उपचार जिला स्तर पर संभव है।


“सिर्फ पर्ची वाले मरीजों का अस्पताल?”

जनचर्चाओं में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या जिला अस्पताल अब केवल उन्हीं मरीजों के लिए रह गया है जिन्हें बिना जोखिम और जटिलता के आसानी से उपचार दिया जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी उम्मीद लेकर आने वाले मरीज पहले कई प्रकार की जांच, मेडिकल फिटनेस और कागजी प्रक्रिया पूरी करते हैं, लेकिन अंततः उन्हें उपचार के बजाय रेफर कर दिया जाता है। इससे मरीज आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से टूटते नजर आ रहे हैं।


जच्चा-बच्चा केंद्र पर भी सवाल

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार जिला अस्पताल के जच्चा-बच्चा केंद्र में भी बीपी और शुगर का हवाला देकर गर्भवती महिलाओं को बाहर रेफर किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई मामलों में वही मरीज बाद में निजी नर्सिंग होम में सफलतापूर्वक उपचार प्राप्त कर लेते हैं। यदि यह स्थिति सही है, तो यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जिम्मेदारी दोनों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।


अस्पताल परिसर में अव्यवस्था के आरोप

जिला अस्पताल परिसर की व्यवस्थाओं को लेकर भी कई गंभीर आरोप सामने आए हैं। मरीजों और परिजनों के अनुसार:

  • अस्पताल परिसर में बाहरी एजेंटों की सक्रियता बढ़ी हुई है
  • मरीजों को निजी नर्सिंग होम की ओर मोड़ने की चर्चाएं होती हैं
  • दवाइयों के लिए मरीजों को बाहर भटकना पड़ता है
  • परिसर में अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं
  • समुचित लिफ्ट सुविधा के अभाव में बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और गंभीर मरीज सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर हैं

इन सभी मुद्दों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की निष्क्रियता लोगों की नाराजगी का कारण बन रही है।


बजरंग दल ने खोला मोर्चा, CMO को सौंपा ज्ञापन

बुधवार को इन सभी अव्यवस्थाओं और शिकायतों को लेकर बजरंग दल ने जिला अस्पताल परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। संगठन के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. दानी से मुलाकात कर अस्पताल में व्याप्त अनियमितताओं, चिकित्सकीय लापरवाही और मरीजों की समस्याओं को लेकर विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, दवाइयों की अनुपलब्धता, गर्भवती महिलाओं के प्रवेश समय को लेकर नियमों में बदलाव, अस्पताल में बाहरी एजेंटों की सक्रियता, ऑपरेशन थिएटर की तकनीकी समस्याएं, ओपीडी में दवा वितरण की सीमाएं, दिव्यांग प्रमाणपत्र प्रक्रिया में विलंब और कैंसर वैक्सीनेशन जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए।

बजरंग दल के जिला संयोजक रतन यादव ने कहा कि जिन मामलों का संबंध राज्य शासन से है, उन्हें विभागीय मंत्री और शासन स्तर तक पहुंचाकर सुधार की मांग की जाएगी। उन्होंने कहा कि जिला अस्पताल की व्यवस्था में व्यापक सुधार और जवाबदेही तय करना अब जनहित का बड़ा मुद्दा बन चुका है।


स्वास्थ्य अधिकारी ने जांच और कार्रवाई का दिया आश्वासन

जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. दानी ने संगठन को अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार और अनियमितताओं की जांच कर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है। साथ ही राज्य शासन से जुड़े मुद्दों को उच्च स्तर तक पहुंचाने की बात भी कही गई है।


सबसे बड़ा सवाल — जवाबदेह कौन?

दुर्ग जिला अस्पताल की मौजूदा स्थिति अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि जनविश्वास से जुड़ा प्रश्न बनती जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि:

  • क्या जिला अस्पताल उपचार का केंद्र है या केवल रेफरल व्यवस्था का माध्यम?
  • क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जिम्मेदारी से ज्यादा औपचारिकता हावी हो चुकी है?
  • करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मरीजों को भरोसेमंद इलाज क्यों नहीं मिल पा रहा?
  • और क्या अस्पताल प्रशासन एवं जिम्मेदार अधिकारी इस व्यवस्था की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उठ रहे ये सवाल अब केवल अस्पताल परिसर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पूरे जिले में चर्चा और चिंता का विषय बन चुके हैं।

भिलाई-दुर्ग में ‘जन अधिकार आंदोलन’ का ऐलान, उधारकर्ता आयोग गठन सहित कई मांगें होंगी प्रमुख

भिलाई-दुर्ग/शौर्यपथ।
देशभर में बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ी कथित प्रताड़ना, आर्थिक उत्पीड़न और नागरिक अधिकारों के हनन के खिलाफ 14 मई 2026 को भिलाई-दुर्ग में व्यापक “जन अधिकार आंदोलन” आयोजित किया जाएगा। दोपहर 12 बजे से शुरू होने वाले इस आंदोलन के माध्यम से बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई जाएगी।

आंदोलन के आयोजकों का कहना है कि वर्तमान समय में अनेक नागरिक बैंक रिकवरी प्रक्रिया, नोटिस प्रताड़ना, मानसिक दबाव और आर्थिक शोषण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई मामलों में लोगों को न्याय और सुनवाई के लिए प्रभावी मंच तक उपलब्ध नहीं हो पाता। इसी मुद्दे को केंद्र में रखते हुए आंदोलन के दौरान “उधारकर्ता आयोग” (Borrower Commission) के गठन की मांग प्रमुखता से उठाई जाएगी, ताकि ऋण लेने वाले नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।

कार्यक्रम में भारतीय मुद्रा प्रणाली और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को लेकर भी पारदर्शिता की मांग की जाएगी। आंदोलनकारियों के अनुसार जनता को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि डिजिटल मुद्रा प्रणाली का संचालन किस प्रकार हो रहा है और उससे जुड़ी नीतियां किस संस्था के नियंत्रण में कार्य कर रही हैं।

आंदोलन के दौरान बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी कथित अवैध वसूली, मानसिक प्रताड़ना, प्रशासनिक निष्क्रियता और वित्तीय अनियमितताओं जैसे मुद्दों पर भी खुलकर आवाज उठाई जाएगी। आयोजकों ने मांग की है कि संबंधित मामलों में बैंक एवं एनबीएफसी संस्थाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जाए।

आंदोलनकारियों ने बैंकिंग व्यवस्था के आर्थिक मॉडल पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि देश में प्रचलित मुद्रा की तुलना में कई गुना अधिक ऋण वितरण किया गया है। आंदोलन में यह मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया जाएगा कि जब देश में लगभग 38 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा प्रचलन में है, तब केवल सरकारी बैंकों द्वारा ही 107 लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण वितरण कैसे किया गया। साथ ही निजी बैंकों और वित्तीय कंपनियों की ऋण व्यवस्था की भी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की जाएगी।

कार्यक्रम की रूपरेखा

दोपहर 12 बजे से विभिन्न विषय विशेषज्ञों और वक्ताओं द्वारा पर्यावरण, स्वास्थ्य, बैंकिंग और आर्थिक विषयों पर रिसर्च आधारित जानकारी साझा की जाएगी। इसके बाद दोपहर 2:30 बजे से बैंकिंग व्यवस्था, उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आम जनता पर पड़ रहे प्रभावों पर विशेष संबोधन आयोजित होगा। कार्यक्रम के अंतिम चरण में शाम 4 बजे आंदोलनकारी नारेबाजी और पैदल मार्च करते हुए कलेक्टर कार्यालय पहुंचेंगे, जहां ज्ञापन एवं शिकायत पत्र सौंपा जाएगा।

आंदोलन के संयोजकों ने सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं, युवाओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों से लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से कार्यक्रम में सहभागी बनने की अपील की है।

आयोजकों का कहना है कि यह आंदोलन किसी संस्था या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि “आर्थिक अन्याय, बैंकिंग प्रताड़ना और नागरिक अधिकारों की रक्षा” के लिए जनता की लोकतांत्रिक आवाज है।

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