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रायपुर, /
बस्तर अंचल के प्रतिभावान और जरूरतमंद युवाओं के सपनों को नई उड़ान देने के लिए दंतेवाड़ा जिला प्रशासन ने एक बेहद संवेदनशील और अनूठी शैक्षणिक पहल की है। जिले के आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन मेधावी विद्यार्थियों को देश-प्रदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों में उच्च शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से “उजर 100” योजना शुरू की गई है।
इस महत्वाकांक्षी योजना के सफल क्रियान्वयन, चयन प्रक्रिया और पात्रता नियमों को तय करने के लिए आज जिला पंचायत के सभाकक्ष में दोपहर 3 बजे एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसमें कार्ययोजना का खाका तैयार किया गया।
100 सीटों का वर्गवार निर्धारण, स्थानीय को प्राथमिकता
योजना के तहत कुल 100 सीटों का कोटा निर्धारित किया गया है। सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए इसमें वर्गवार सीटें तय की गई हैं। जिसमे अनुसूचित जनजाति (ST) के 76,अनुसूचित जाति (SC) के 06,अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के 14 और अनारक्षित (General) के 04 सीटें शामिल है। इसके साथ ही कुल सीटों में 6 प्रतिशत आरक्षण दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित रहेगा। योजना का लाभ केवल दंतेवाड़ा जिले के मूल निवासी छात्रों को ही मिलेगा, जिन्होंने प्रथम प्रयास में 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की हो।
5 लाख की आय सीमा, लेकिन 'सुपर टैलेंटेड' बच्चों को पूरी छूट
सामान्यतः योजना का लाभ उठाने के लिए परिवार की वार्षिक आय 5 लाख रुपये से कम होनी चाहिए। लेकिन प्रशासन ने प्रतिभा को नियमों में नहीं बांधा है। छत्तीसगढ़ बोर्ड (CGBSE) की प्रावीण्य सूची में जिले के शीर्ष 10 स्थान पाने वाले छात्रों और IIT, NIT, NEET, JEE, NDA व AIIMS जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय परीक्षाओं में चयन पाने वाले विद्यार्थियों पर आय की कोई सीमा लागू नहीं होगी। इसी तरह छत्तीसगढ़ बोर्ड के टॉप 100 या सीबीएसई के टॉप 20 छात्र, राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं में चयनित विद्यार्थी, नक्सल प्रभावित परिवारों के बच्चे, खनन प्रभावित ग्रामों के छात्र और बीपीएल (BPL) कार्डधारी परिवारों के होनहार बच्चे इस योजना में पहली प्राथमिकता पर होंगे।
पढ़ाई से लेकर रहने-खाने का खर्च उठाएगी सरकार; सीधे खाते में आएगा पैसा
"उजर 100" योजना के तहत चयनित विद्यार्थियों को कॉलेज की फीस, हॉस्टल, भोजन और अध्ययन सामग्री (किताबें-कॉपी) का पूरा खर्च दिया जाएगा। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों (Professional Courses) की पूरी फीस सीधे संबंधित शिक्षण संस्थान को भेजी जाएगी। वहीं, हॉस्टल और किताबों का खर्च डीबीटी (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से सीधे छात्र के बैंक खाते में जमा किया जाएगा।
काउंसिलिंग के लिए मिलेगी
हवाई यात्रा की सुविधा
जिला प्रशासन ने मेधावियों के प्रोत्साहन के लिए बड़े कदम उठाए हैं। यदि जिले का कोई छात्र IIT, NIT, AIIMS, NEET या NDA जैसी परीक्षाओं में चुना जाता है, तो उसे संस्थान में रिपोर्टिंग या काउंसिलिंग के लिए जाने हेतु बस, रेल या हवाई यात्रा की मुफ्त सुविधा दी जाएगी। इसके अलावा शानदार प्रदर्शन करने वाले छात्रों को नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र भी दिया जाएगा। ड्रॉप लेकर तैयारी करने वाले छात्रों को विशेष परिस्थिति में कोचिंग सहायता भी मिलेगी।
ऑफलाइन होंगे आवेदन, बनेगी वेटिंग लिस्ट
चयन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी रखने के लिए आवेदन ऑफलाइन माध्यम से जिला परियोजना कार्यालय समग्र शिक्षा में जमा किए जाएंगे। स्क्रूटनी, मेरिट लिस्ट और फिजिकल वेरिफिकेशन के बाद जिला स्तरीय कमेटी अंतिम मुहर लगाएगी। मुख्य सूची के साथ 50 विद्यार्थियों की एक प्रतीक्षा सूची (Waiting List) भी बनाई जाएगी, ताकि कोई सीट खाली रहने पर दूसरे हकदार को मौका मिल सके। "उजर 100" योजना दंतेवाड़ा के युवाओं के लिए मील का पत्थर साबित होगी। आर्थिक तंगी के कारण अब किसी भी होनहार का सपना नहीं टूटेगा। यहाँ के बच्चे अब राष्ट्रीय पटल पर जिले का नाम रोशन करेंगे।
ओस्लो / नई दिल्ली / एजेंसी /
भारत-नॉर्डिक तृतीय शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ओर्पो से महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता की। इस मुलाकात में दोनों देशों ने अपने संबंधों को डिजिटलीकरण और सतत विकास आधारित रणनीतिक साझेदारी के नए स्तर तक ले जाने की प्रतिबद्धता जताई।
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और शिक्षा जगत के बीच सहयोग को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया। भारत और फिनलैंड ने माना कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में डिजिटलीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), 5G/6G तकनीक, क्वांटम टेक्नोलॉजी और हरित विकास निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
व्यापार और तकनीकी सहयोग पर बड़ा फोकस
दोनों देशों ने व्यापार एवं निवेश, अंतरिक्ष, नवीकरणीय ऊर्जा, चक्रीय अर्थव्यवस्था, नवाचार, शिक्षा और लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में जारी सहयोग की समीक्षा की। वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार में लगातार वृद्धि पर संतोष व्यक्त करते हुए दोनों नेताओं ने वर्ष 2030 तक व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य दोहराया। फिनलैंड ने अपने तकनीकी क्षेत्र में भारतीय पेशेवरों के योगदान की खुलकर सराहना की। वहीं, दोनों पक्षों ने तकनीकी कंपनियों की बढ़ती साझेदारी और एक-दूसरे के बाजारों में विस्तार को सकारात्मक संकेत बताया।
गांधीनगर में होगा विश्व चक्रीय आर्थिक फोरम
बैठक की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि भारत और फिनलैंड ने सितंबर 2026 में गुजरात के गांधीनगर में विश्व चक्रीय आर्थिक फोरम की संयुक्त मेजबानी करने की घोषणा की। इसे हरित अर्थव्यवस्था और सतत विकास के क्षेत्र में वैश्विक सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
भारत-यूरोपीय संघ संबंधों पर भी चर्चा
दोनों नेताओं ने भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक साझेदारी की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया और भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को जल्द लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों में समन्वय मजबूत करने पर भी चर्चा हुई।
भारत और फिनलैंड के बीच संबंध लोकतांत्रिक मूल्यों, तकनीकी सहयोग और पारस्परिक विश्वास पर आधारित माने जाते हैं। फिनलैंड, यूरोपीय संघ और नॉर्डिक क्षेत्र में भारत का एक अहम रणनीतिक साझेदार बनकर उभर रहा है।
शौर्यपथ विशेष लेख।
पद की गरिमा बनाम व्यक्तिगत संबंध : दुर्ग कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल
दुर्ग की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर शहर कांग्रेस संगठन वर्षों बाद सक्रियता, ऊर्जा और संगठन विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ता नजर आ रहा है, तो दूसरी ओर उसी संगठन के भीतर पद की गरिमा और अनुशासन को लेकर कई ऐसे दृश्य सामने आ रहे हैं, जो आत्ममंथन की मांग करते हैं।
शहर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में धीरज बकरीवाल की नियुक्ति के बाद दुर्ग कांग्रेस की कार्यशैली में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दिया है। लंबे समय तक “रिमोट कंट्रोल” शैली के आरोप झेलने वाले संगठन में अब मैदान में सक्रिय नेतृत्व दिखाई दे रहा है। मंडल स्तर तक बैठकों का विस्तार, युवाओं की भागीदारी, पुराने कार्यकर्ताओं का पुनर्सक्रिय होना और आंदोलनों में बढ़ती भीड़ इस बात का संकेत है कि संगठनात्मक स्तर पर धीरज बकरीवाल लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं।
18 मई को “शहरी सरकार” के खिलाफ हुए कांग्रेस आंदोलन ने भी यह साबित किया कि दुर्ग कांग्रेस अब केवल औपचारिक राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। पहले जहां आंदोलनों में गिने-चुने चेहरे नजर आते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति संगठन सृजन की दिशा में सकारात्मक संकेत देती है।
लेकिन इसी आंदोलन के दौरान एक ऐसा दृश्य भी सामने आया जिसने कांग्रेस की अंदरूनी संस्कृति पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से “ए धीरज… ओ धीरज…” जैसे संबोधन इस्तेमाल किए गए। यह संबोधन व्यक्तिगत रिश्तों के स्तर पर सामान्य लग सकता है, लेकिन जब वही व्यक्ति संगठन का अधिकृत शहर अध्यक्ष हो, तब प्रश्न केवल नाम पुकारने का नहीं, बल्कि पद की गरिमा का बन जाता है।
राजनीतिक संगठनों की मजबूती केवल भीड़, नारों या आंदोलनों से तय नहीं होती। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके अनुशासन, संरचना और पदों के सम्मान से निर्मित होती है। यही वह बिंदु है जहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की कार्यशैली में बड़ा अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।
भाजपा में पद पर बैठा व्यक्ति उम्र में छोटा हो या बड़ा, व्यक्तिगत संबंध चाहे जैसे हों, सार्वजनिक मंच पर उसे उसके पद के अनुरूप संबोधित किया जाता है। यही कारण है कि संगठनात्मक अनुशासन भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। कार्यकर्ता यह समझता है कि वह केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि संगठनात्मक व्यवस्था का सम्मान कर रहा है।
दुर्ग शहर भाजपा का उदाहरण सामने है। भाजपा जिला अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक के अधीन पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। शायद ही ऐसा कोई अवसर देखने को मिला हो जब किसी विधायक या वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक रूप से अध्यक्ष पद की गरिमा को कमतर करने वाला व्यवहार किया हो। यही संगठनात्मक संस्कृति भाजपा को बूथ से लेकर सत्ता तक मजबूती प्रदान करती है।
कांग्रेस के भीतर समस्या यह नहीं कि वरिष्ठ नेता धीरज बकरीवाल को व्यक्तिगत रूप से “धीरज” कहकर संबोधित करते हैं। समस्या यह है कि सार्वजनिक मंच पर अध्यक्ष पद की गरिमा को किस नजर से देखा जा रहा है। यदि वरिष्ठ ही पद की औपचारिक मर्यादा का पालन नहीं करेंगे, तो नए कार्यकर्ताओं में संगठनात्मक अनुशासन की भावना कैसे विकसित होगी?
आज कांग्रेस जिस दौर से गुजर रही है, उसमें केवल विचारधारा या विरोध की राजनीति पर्याप्त नहीं है। संगठन को मजबूत करने के लिए आंतरिक अनुशासन, पदों का सम्मान और सामूहिक नेतृत्व की संस्कृति विकसित करना अनिवार्य हो गया है।
यह भी सच है कि धीरज बकरीवाल स्वयं शायद इन संबोधनों पर कोई आपत्ति न रखते हों। संभव है कि वे इसे वरिष्ठों का स्नेह मानते हों। लेकिन राजनीति में कई बार व्यक्ति की व्यक्तिगत सहजता से अधिक महत्वपूर्ण संस्था और पद की गरिमा होती है। अध्यक्ष केवल “धीरज” नहीं रहते, वे उस समय पूरे संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि परिवारवाद, गुटबाजी और “मैं” केंद्रित राजनीति से ऊपर उठे बिना संगठनात्मक पुनर्जीवन संभव नहीं है। यदि भाजपा के संगठनात्मक मॉडल में कुछ सकारात्मक तत्व हैं, तो उन्हें अपनाने में वैचारिक हार नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता दिखाई देती है।
आज जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस कार्यकर्ता यह महसूस करें कि संगठन किसी व्यक्ति विशेष का मंच नहीं, बल्कि सामूहिक राजनीतिक व्यवस्था है। जहां पद का सम्मान व्यक्ति से बड़ा होता है।
आंदोलन हजारों हो सकते हैं, भीड़ लाखों की हो सकती है, लेकिन यदि संगठन के भीतर ही पद और जिम्मेदारी का सम्मान कमजोर पड़ जाए, तो राजनीतिक ताकत धीरे-धीरे खोखली होने लगती है।
“ए धीरज… ओ धीरज…” से “अध्यक्ष साहब” तक का यह सफर केवल संबोधन बदलने का नहीं, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक सोच बदलने का सवाल है। और शायद यही वह परिवर्तन है जिसकी दुर्ग कांग्रेस को आने वाले समय में सबसे अधिक आवश्यकता है।
रायपुर/बीजापुर उप जेल में शिक्षा के माध्यम से बंदियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की एक सराहनीय पहल शुरू की गई है। कलेक्टर श्री विश्वदीप के मार्गदर्शन में “उल्लास साक्षरता कार्यक्रम” के तहत असाक्षर कैदियों और बंदियों के लिए नवसाक्षरता अभियान का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम में जिला शिक्षा अधिकारी श्री लखनलाल धनेलिया विशेष रूप से उपस्थित रहे।
इस अभियान के तहत बंदियों को पढ़ाई के लिए पेन, पेंसिल, पुस्तकें और व्हाइटबोर्ड जैसी अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराई गई। कार्यक्रम का उद्देश्य बंदियों को साक्षर बनाकर उनमें आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच और आत्मनिर्भरता विकसित करना है, ताकि वे भविष्य में समाज की मुख्यधारा से जुड़कर सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।
जिला शिक्षा अधिकारी श्री लखनलाल धनेलिया ने कहा कि शिक्षा जीवन बदलने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने बताया कि शासन का प्रयास है कि कोई भी व्यक्ति शिक्षा से वंचित न रहे। जेल में बंद असाक्षर लोगों को शिक्षित करना सामाजिक पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उप जेल प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बंदियों को नियमित अध्ययन के लिए प्रेरित किया और शिक्षा के महत्व के बारे में जानकारी दी। कार्यक्रम के दौरान बंदियों में सीखने को लेकर उत्साह और नई उम्मीद देखने को मिली।
“उल्लास साक्षरता कार्यक्रम” के माध्यम से उप जेल बीजापुर में शिक्षा का सकारात्मक वातावरण तैयार हुआ है। यह पहल बंदियों के जीवन में बदलाव लाने और उन्हें बेहतर भविष्य की ओर बढ़ाने का प्रेरणादायक प्रयास बन रही है।
जगदलपुर/बस्तर। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल बस्तर से मंगलवार को देश की आंतरिक सुरक्षा और विकास को लेकर बड़ा राजनीतिक एवं प्रशासनिक संदेश सामने आया। Amit Shah की अध्यक्षता में आयोजित मध्य क्षेत्रीय परिषद (Central Zonal Council) की 26वीं बैठक में नक्सलवाद, आदिवासी विकास, साइबर सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण और राज्यों के बीच समन्वय जैसे अहम मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई।
बैठक में Vishnu Deo Sai सहित Mohan Yadav, Pushkar Singh Dhami और उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यह बैठक केवल प्रशासनिक समन्वय तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे “नए भारत की आंतरिक सुरक्षा और विकास मॉडल” के रूप में भी देखा जा रहा है।
अमित शाह का बड़ा ऐलान — “भारत तय समय से पहले नक्सल मुक्त”
बैठक का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण बयान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का रहा। उन्होंने कहा कि सुरक्षा बलों के साहस, रणनीतिक अभियान और जवानों के बलिदान के कारण भारत तय समय सीमा से पहले ही “नक्सल मुक्त” हो चुका है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि वर्षों तक हिंसा और भय का प्रतीक रहे कई नक्सल प्रभावित क्षेत्र अब विकास, शिक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। शाह ने सुरक्षा बलों के योगदान को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि देश उनके बलिदान का सदैव ऋणी रहेगा।
विकास और सुशासन पर विशेष फोकस
बैठक में केवल सुरक्षा नहीं बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों पर भी विशेष जोर दिया गया। परिषद में जिन प्रमुख विषयों पर चर्चा हुई उनमें शामिल रहे:
कुपोषण समाप्त करने के लिए संयुक्त रणनीति
स्कूल ड्रॉपआउट कम करने के उपाय
महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों में शत-प्रतिशत सजा सुनिश्चित करने की कार्ययोजना
राज्यों में आधुनिक साइबर हेल्पलाइन स्थापित करने की पहल
केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर प्रशासनिक समन्वय
बैठक में यह भी माना गया कि केवल सुरक्षा अभियान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि विकास और विश्वास निर्माण ही स्थायी समाधान का आधार बनेंगे।
आदिवासी महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर जोर
बैठक में आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका आधारित योजनाओं को बढ़ावा देने पर भी विशेष चर्चा हुई। आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें गाय और भैंस उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि बस्तर जैसे क्षेत्रों में आर्थिक सशक्तिकरण और स्थानीय रोजगार ही उग्रवाद के खिलाफ सबसे प्रभावी सामाजिक हथियार साबित हो सकते हैं।
अमर वाटिका पहुंचकर शहीदों को दी श्रद्धांजलि
बैठक शुरू होने से पहले गृह मंत्री अमित शाह ने जगदलपुर स्थित अमर वाटिका पहुंचकर शहीद सुरक्षाकर्मियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान सुरक्षा बलों के जवानों के प्रति सम्मान और राष्ट्र सेवा के प्रति प्रतिबद्धता का संदेश भी दिया गया।
बस्तर से राष्ट्रीय संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बस्तर में इस उच्चस्तरीय बैठक का आयोजन अपने आप में एक प्रतीकात्मक संदेश है। कभी नक्सली हिंसा का गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र में अब राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और निवेश को लेकर बड़ी बैठकों का आयोजन यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार बस्तर को “संघर्ष क्षेत्र” नहीं बल्कि “संभावनाओं के क्षेत्र” के रूप में स्थापित करना चाहती है।
बैठक ने यह भी स्पष्ट किया कि आने वाले समय में केंद्र सरकार सुरक्षा और विकास—दोनों मोर्चों पर एक साथ आगे बढ़ने की रणनीति पर काम करेगी।
सुप्रीम कोर्ट में 2023 के कानून पर तीखी बहस, बड़ी संविधान पीठ को सौंपे जाने पर मंथन
नई दिल्ली। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी निष्पक्षता से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में आज 19 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई गंभीर संवैधानिक प्रश्न केंद्र में रहे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम Court की पीठ ने इस बात पर गंभीर विचार किया कि क्या इस मामले को कम से कम पांच न्यायाधीशों वाली बड़ी संविधान पीठ (Constitution Bench) को भेजा जाना चाहिए।
यह मामला केवल नियुक्ति प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, संस्थागत स्वायत्तता और संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) से जुड़ी बड़ी बहस का रूप ले चुका है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा बताते हुए कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की। अदालत ने यह संकेत दिया कि मामला केवल तकनीकी व्याख्या का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास का भी है।
संविधान पीठ को भेजने पर गहन बहस
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या इस विवाद में इतने व्यापक संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं कि इसे बड़ी संविधान पीठ को भेजा जाए। अदालत ने माना कि मामला चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता तथा कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन जैसे मूलभूत मुद्दों को छूता है।
हालांकि याचिकाकर्ताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। याचिकाकर्ता-इन-पर्सन एस.एन. शुक्ला सहित अन्य पक्षकारों ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने पूर्व निर्णयों में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के सिद्धांत स्पष्ट कर चुका है। ऐसे में मामले को बड़ी पीठ के पास भेजना केवल न्यायिक प्रक्रिया को लंबा करने जैसा होगा।
केंद्र सरकार ने कानून का किया बचाव
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने 2023 के कानून का जोरदार बचाव किया। उन्होंने अदालत से कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद को यह अधिकार प्राप्त है कि वह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मॉडल स्वयं तय करे।
सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल करना कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। सरकार के अनुसार संसद ने अपने विधायी अधिकारों का उपयोग करते हुए नया ढांचा तैयार किया है, जिसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट की पुरानी टिप्पणियों ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें
हालांकि पिछली सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई तीखी टिप्पणियां आज भी पूरे विवाद के केंद्र में बनी हुई हैं। अदालत पहले ही यह कह चुकी है कि मौजूदा चयन समिति में प्रधानमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री की उपस्थिति सरकार को स्थायी रूप से 2:1 का बहुमत देती है, जिससे नेता प्रतिपक्ष की भूमिका केवल “सजावटी” बनकर रह जाती है।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि जब सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए चीफ जस्टिस को शामिल किया जा सकता है, तो चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था में किसी तटस्थ सदस्य को शामिल करने से परहेज क्यों किया गया।
अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए थे कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं और यदि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर संदेह पैदा होता है, तो इसका सीधा असर लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ेगा।
अनोप बरनवाल फैसले से शुरू हुआ पूरा विवाद
यह पूरा संवैधानिक विवाद सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक “अनोप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023)” फैसले के बाद शुरू हुआ था। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति द्वारा की जाएगी।
इसके बाद केंद्र सरकार ने “मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023” पारित किया, जिसमें चयन समिति से चीफ जस्टिस को हटाकर उनकी जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया। इसी बदलाव को याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
लोकतंत्र की दिशा तय कर सकता है फैसला
संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में भारत की चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता की दिशा तय कर सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस कानून को संवैधानिक कसौटी पर असफल मानता है, तो चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में बड़े बदलाव संभव हैं।
फिलहाल देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला केवल एक कानून की वैधता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निष्पक्षता और संवैधानिक संतुलन की परीक्षा बन चुका है।
शौर्यपथ विशेष लेख
साभार- नरेंद्र मोदी, भारत के प्रधानमंत्री*
*और*
*जॉर्जिया मेलोनी, इटली गणराज्य मंत्रिपरिषद की अध्यक्ष*
भारत और इटली के संबंध अब एक निर्णायक दौर में पहुंच चुके हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में अभूतपूर्व तेजी से विस्तार हुआ है। यह संबंध केवल सौहार्दपूर्ण मित्रता तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अब स्वतंत्रता और लोकतंत्र के मूल्यों तथा भविष्य के साझा दृष्टिकोण पर आधारित एक विशेष रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। ऐसे समय में, जब पूरी दुनिया की व्यवस्था बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, इटली और भारत की साझेदारी उच्च राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर लगातार संवाद से आगे बढ़ रही है। यह संबंध अब एक नए और अधिक व्यापक स्तर पर पहुंच रहा है, जिसमें दोनों देशों की आर्थिक ताकत, सामाजिक रचनात्मकता और हजारों वर्षों पुरानी सभ्यतागत विरासत शामिल है।
हमारा सहयोग इस साझा समझ को दर्शाता है कि 21वीं सदी में समृद्धि और सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि देश कितनी क्षमता से नवाचार करें, ऊर्जा परिवर्तन का प्रबंधन करें और अपनी रणनीतिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करें। इसी उद्देश्य से हमने अपने द्विपक्षीय संबंधों को और गहरा तथा विविध बनाने का संकल्प लिया है, ताकि नए लक्ष्यों को हासिल किया जा सके और दोनों देशों की पूरक शक्तियों का बेहतर उपयोग हो सके। हम इटली की डिजाइन क्षमता, बेहतरीन विनिर्माण कौशल और विश्वस्तरीय सुपरकंप्यूटर तकनीक—जो उसे एक औद्योगिक महाशक्ति बनाती है—को भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि, इंजीनियरिंग प्रतिभा, बड़े पैमाने की क्षमता, नवाचार और 100 से अधिक यूनिकॉर्न तथा 2 लाख स्टार्ट-अप वाले उद्यमी इकोसिस्टम के साथ जोड़कर एक शक्तिशाली तालमेल बनाना चाहते हैं। यह केवल दो व्यवस्थाओं का साधारण मेल नहीं है, बल्कि ऐसा साझा मूल्य निर्माण है जिसमें दोनों देशों की औद्योगिक ताकतें एक-दूसरे को और अधिक मजबूत बनाती हैं।
यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) दोनों दिशाओं में व्यापार और निवेश बढ़ाने का रास्ता खोलता है। हमारा लक्ष्य 2029 तक भारत और इटली के बीच व्यापार को 20 अरब यूरो से आगे ले जाना है। इसमें रक्षा एवं एयरोस्पेस, स्वच्छ प्रौद्योगिकी, मशीनरी, ऑटोमोबाइल पुर्जे, रसायन, दवाइयां, वस्त्र, कृषि-खाद्य क्षेत्र और पर्यटन समेत कई क्षेत्रों पर विशेष ध्यान रहेगा। “मेड इन इटली” हमेशा से दुनिया भर में उत्कृष्टता का प्रतीक रहा है, और आज इसका स्वाभाविक तालमेल “मेक इन इंडिया पहल के उच्च गुणवत्ता वाले लक्ष्यों के साथ दिखाई देता है। इसी संदर्भ में, भारत के लिए उत्पादन में इतालवी कंपनियों की बढ़ती रुचि और इटली में भारतीय उद्योगों की बढ़ती मौजूदगी — जो अब दोनों पक्षों से मिलाकर 1000 से अधिक हो चुकी है — एक सकारात्मक संकेत है। यह हमारी सप्लाई चेन के एकीकरण को और मजबूत करेगी।
तकनीकी नवाचार हमारी साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। आने वाले दशकों में दुनिया एक बड़े तकनीकी बदलाव के दौर से गुजरेगी, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) क्वांटम कंप्यूटिंग, उन्नत विनिर्माण, महत्वपूर्ण खनिज और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में तेज प्रगति होगी। भारत का तेज़ी से बढ़ता नवाचार तंत्र और कुशल पेशेवरों की बड़ी संख्या, तथा इटली की उन्नत औद्योगिक क्षमता—इन क्षेत्रों में दोनों देशों के सहयोग को स्वाभाविक और रणनीतिक बनाती है। दोनों देशों के विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के बीच बढ़ती साझेदारी भी इसे मजबूती देगी।
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) पहले से ही दुनिया के कई देशों, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों, के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है। विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आज हमारे समाज और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल रही है। इटली और भारत लंबे समय से इस दिशा में सहयोग कर रहे हैं, ताकि एआई का विकास जिम्मेदार और मानव-केंद्रित हो।
भारत और इटली एआई को समावेशी विकास का एक शक्तिशाली माध्यम भी मानते हैं, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के लिए। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और आसान, बहुभाषी तकनीकों के जरिए एआई सामाजिक और डिजिटल खाइयों को कम कर सकता है, न कि उन्हें और बढ़ा सकता भारत के मानव विज़न- यानी तकनीक के केंद्र में मानव को रखने की सोच और इटली की मानव-केंद्रित “एल्गोर-एथिक्स” की अवधारणा, जो उसकी मानवतावादी परंपरा पर आधारित है, पर आगे बढ़ते हुए हमारी साझेदारी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बने।
हमारा दृष्टिकोण भारत की विशाल डिजिटल क्षमता को इटली की नैतिक और औद्योगिक विशेषज्ञता के साथ जोड़ता है, ताकि तकनीक मानव गरिमा की सेवा कर सके।
सुरक्षित डिजिटल सहयोग, क्षमता निर्माण और मजबूत साइबर ढांचे से जुड़ी श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों को साझा करके, हम एक ऐसा खुला, भरोसेमंद और समान डिजिटल वातावरण बनाना चाहते हैं, जिसमें हर देश एआई का उपयोग कर सके और उससे लाभ उठा सके। यही सोच इटली की जी7 अध्यक्षता और 2026 में नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट के निष्कर्षों का मुख्य आधार है। एआई को इंसानों की ओर से इंसानों के लिए बनाई गई तकनीक मानने का अर्थ है यह स्पष्ट करना कि तकनीक न तो मनुष्य की जगह ले सकती है और न ही उसके मूल अधिकारों को कमजोर कर सकती है। इसका उपयोग जनमत को प्रभावित करने या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करने के लिए भी नहीं होना चाहिए।
आज की तेजी से जुड़ी हुई दुनिया में स्वतंत्रता और मानव गरिमा की रक्षा का हमारा दृष्टिकोण इसी चुनौती पर आधारित है।
हमारा सहयोग अंतरिक्ष क्षेत्र तक भी फैला हुआ है। अंतरिक्ष अनुसंधान और सैटेलाइट तकनीक में भारत की उल्लेखनीय प्रगति तथा इटली की एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में उत्कृष्टता, संयुक्त परियोजनाओं और नई पीढ़ी की तकनीकों के विकास के लिए बड़े अवसर प्रदान करती है।
राष्ट्रों की समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा और स्थिरता बेहद आवश्यक हैं। इसलिए इटली और भारत रक्षा, सुरक्षा और रणनीतिक तकनीकों जैसे क्षेत्रों में अपने सहयोग को और मजबूत करना चाहते हैं। हमारा सहयोग महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, तथा आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क, मादक पदार्थों की तस्करी, साइबर अपराध और मानव तस्करी जैसी चुनौतियों के खिलाफ मजबूती बढ़ाने में मदद करेगा।
ऊर्जा हमारी साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण आधार है। दुनिया में ऊर्जा के विविध स्रोतों की ओर बढ़ रहे बदलाव के लिए नवाचार, निवेश और सहयोग की आवश्यकता है। भारत और इटली नवीकरणीय ऊर्जा से लेकर हाइड्रोजन तकनीक, तथा स्मार्ट ग्रिड से लेकर मजबूत बुनियादी ढांचे तक कई क्षेत्रों में साथ काम कर रहे हैं।
ग्रीन हाइड्रोजन निर्यात का वैश्विक केंद्र बनने की भारत की पहल अपार संभावनाएं रखती है। यह इटली की नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना में उन्नत तकनीक और यूरोप के लिए ऊर्जा प्रवेश द्वार के रूप में उसकी रणनीतिक भूमिका के साथ पूरी तरह मेल खाती है।इस संदर्भ में भारत की अगुवाई वाली प्रमुख पहलों- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए), आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना के लिए गठबंधन (सीडीआरआई) और ग्लोबल बायोफ्यूल्स एलायंस (जीबीए) में अन्य देशों के साथ हमारा सहयोग भी बेहद महत्वपूर्ण है।
भौतिक, डिजिटल और मानवीय संपर्क ही वह कड़ी है जो हमें एक-दूसरे से जोड़ती है। भारत और इटली दोनों वैश्विक अर्थव्यवस्था के दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों-इंडो-पैसिफिक और भूमध्यसागर के केंद्र में स्थित हैं। अब इन क्षेत्रों को अलग-अलग नहीं, बल्कि आपस में जुड़े हुए क्षेत्रों के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, हम एक नए “इंडो-मैडिटेरेनियन” क्षेत्र के उभरने को देख रहे हैं, जो व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, डेटा और विचारों का एक महत्वपूर्ण गलियारा बन रहा है और हिंद महासागर को यूरोप से जोड़ता है। इसी आपस में जुड़े हुए क्षेत्र में हमारा संबंध स्वाभाविक रूप से एक विशेष रणनीतिक साझेदारी के रूप में विकसित होता है- ऐसी साझेदारी, जो दो महाद्वीपों को जोड़ती है और नई वैश्विक परिस्थितियों को आकार देती है।
इस संदर्भ में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) एक ऐसी दूरदर्शी योजना है, जिसका उद्देश्य आधुनिक परिवहन और बुनियादी ढांचे, डिजिटल नेटवर्क, ऊर्जा प्रणालियों और मजबूत सप्लाई चेन के माध्यम से हमारे क्षेत्रों को जोड़ना है। भारत और इटली अन्य साझेदार देशों के साथ मिलकर इस दृष्टि को वास्तविकता में बदलने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।
हम अपने साझा चुनौतियों का समाधान दोनों देशों के गहरे संबंधों और लंबे सांस्कृतिक जुड़ाव के आधार पर कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति में "धर्म" का विचार उस जिम्मेदारी की भावना को दर्शाता है, जो हमारे कार्यों का मार्गदर्शन करना चाहिए। वहीं "वसुधैव कुटुंबकम्"-अर्थात “पूरी दुनिया एक परिवार है” का सिद्धांत आज के आपस में जुड़े डिजिटल युग में और भी अधिक प्रासंगिक लगता है।
ये मूल्य इटली की मानवतावादी परंपरा से भी मेल खाते हैं, जिसकी जड़ें पुनर्जागरण काल में हैं। यह परंपरा हर व्यक्ति की गरिमा और संस्कृति की उस शक्ति पर जोर देती है, जो समाजों और लोगों को एकजुट कर सकती है। इसलिए हमारी साझा दृष्टि का उद्देश्य लोगों को केंद्र में रखते हुए भारत-इटली साझेदारी को मजबूत, आधुनिक और भविष्य उन्मुख आधार प्रदान करना है।
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दुर्ग। शौर्यपथ विशेष
दुर्ग नगर पालिक निगम की महापौर अलका बाघमार के कार्यकाल को 1 मार्च 2025 से वर्तमान समय तक लगभग 15 माह पूर्ण होने जा रहे हैं। लेकिन इन 15 महीनों में जिस तरह विवाद, प्रशासनिक टकराव, संगठनात्मक असंतोष और जनसुविधाओं से जुड़े प्रश्न लगातार सामने आए हैं, उसने अब राजनीतिक गलियारों में एक नए शब्द को जन्म दे दिया है — “अविश्वास”।
हालांकि प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनी गई महापौर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए अभी वैधानिक रूप से लगभग 9 माह का समय शेष है, किंतु नगर निगम की सामान्य सभा से लेकर भाजपा संगठन और वार्ड स्तर तक जिस प्रकार की चर्चा दिखाई दे रही है, उसने यह संकेत अवश्य दे दिया है कि शहर सरकार की कार्यप्रणाली अब केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी सवालों के घेरे में है।
विवादों की वह श्रृंखला जिसने बढ़ाई राजनीतिक बेचैनी
महापौर के कार्यकाल में कई ऐसे मुद्दे सामने आए जिन्हें लेकर लगातार जनचर्चा बनी रही।
अवैध रूप से संचालित बताए जा रहे “राम रसोई” प्रकरण में कार्रवाई को लेकर उठे प्रश्न।
सड़क पर अतिक्रमण और होटल संचालन संबंधी शिकायतों के बावजूद कठोर कदम नहीं उठाने के आरोप।
चर्चगेट क्षेत्र के सामने कथित अवैध बाजार संचालन पर प्रशासनिक नरमी की चर्चा।
सफाई व्यवस्था को लेकर निगम प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव।
सत्ता पक्ष के ही वार्डों में सफाई प्रभावित होने के आरोप।
अधिकारियों के साथ समन्वय की कमी और सार्वजनिक विवाद की स्थितियां।
शहर के मध्य क्षेत्र में बदबू और स्वच्छता संकट पर कथित निष्क्रियता।
वार्ड विकास कार्यों के आवंटन में भेदभाव के आरोप।
संगठन, मंत्री और पार्षदों के बीच तालमेल की कमी।
इन सबके बीच सामान्य सभा की बैठक में सत्ता पक्ष के दो दर्जन से अधिक पार्षदों द्वारा अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
स्थिति तब और चर्चा में आ गई जब सामान्य सभा के सभापति द्वारा भी यह टिप्पणी सामने आई कि कार्यप्रणाली से भारतीय जनता पार्टी की छवि प्रभावित हो रही है।
प्रोटोकॉल बैठक में पुलिस की एंट्री ने बढ़ाई अटकलें
हाल ही में जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की प्रोटोकॉल संबंधी बैठक के दौरान दो थाना प्रभारी और नगर पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारियों की निगम परिसर में उपस्थिति ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया।
क्योंकि:
वहां कोई आंदोलन नहीं था,
न ही विरोध प्रदर्शन की स्थिति थी,
न कोई कानून व्यवस्था संकट सार्वजनिक रूप से दिखाई दे रहा था।
ऐसे में सवाल उठने लगे कि आखिर इतनी पुलिस फोर्स निगम परिसर तक क्यों पहुंची?
क्या यह केवल प्रोटोकॉल था या प्रशासनिक अविश्वास का कोई संकेत?
शहर की राजनीतिक फिज़ा में यह घटना “आग में घी” डालने जैसी साबित हुई।
अब चर्चा क्यों हो रही है ‘अविश्वास प्रस्ताव’ की?
राजनीति संभावनाओं पर चलती है।
और जब सत्ता पक्ष के भीतर ही असंतोष की फुसफुसाहट सुनाई देने लगे, तब राजनीतिक समीकरणों की चर्चा स्वाभाविक हो जाती है।
यद्यपि वर्तमान में कानूनी रूप से अविश्वास प्रस्ताव तुरंत संभव नहीं है, लेकिन निगम की आंतरिक परिस्थितियों और बढ़ते असंतोष ने इस विषय को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
कई भाजपा नेता और पार्षद अब दबी जुबान में यह स्वीकार करते नजर आते हैं कि यदि कार्यप्रणाली में सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले समय में यह केवल निगम तक सीमित मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि विधानसभा चुनावों तक इसका असर दिखाई दे सकता है।
क्योंकि आम जनता प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों की तकनीकी सीमाओं को नहीं देखती —
उसे केवल सड़क, सफाई, बदबू, अतिक्रमण और व्यवस्था का अनुभव दिखाई देता है।
और उसका सीधा राजनीतिक मूल्यांकन सत्ता पक्ष से जुड़ जाता है।
क्या कहता है कानून? — महापौर को हटाने के वैधानिक रास्ते
छत्तीसगढ़ नगरीय निकाय कानूनों के अनुसार प्रत्यक्ष प्रणाली से चुने गए महापौर को हटाने के मुख्यतः दो संवैधानिक रास्ते हैं:
1. पार्षदों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव
इसके लिए:
महापौर के पदग्रहण के शुरुआती 2 वर्षों तक अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता।
कुल निर्वाचित पार्षदों के कम से कम 1/3 हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं।
कलेक्टर विशेष बैठक बुलाते हैं।
बैठक में 3/4 पार्षदों की उपस्थिति आवश्यक होती है।
प्रस्ताव पारित करने के लिए उपस्थित एवं मतदान करने वाले पार्षदों के 2/3 बहुमत की आवश्यकता होती है, जो कुल निर्वाचित सदस्यों के आधे से अधिक होना चाहिए।
अर्थात यह केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि अत्यंत कठिन और संख्या-आधारित संवैधानिक प्रक्रिया है।
2. राज्य सरकार द्वारा बर्खास्तगी
अधिनियम की धारा 19-B के तहत राज्य सरकार विशेष परिस्थितियों में महापौर को पद से हटा सकती है।
इसके आधार हो सकते हैं:
कर्तव्यों में गंभीर लापरवाही,
पद के दुरुपयोग के आरोप,
भ्रष्टाचार या दुराचरण,
वैधानिक दायित्वों का उल्लंघन।
हालांकि इससे पहले सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होता है।
राजनीतिक संदेश क्या है?
दुर्ग नगर निगम की वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत दे रही हैं कि केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी संवाद और समन्वय की चुनौती बढ़ रही है।
यदि आने वाले महीनों में:
संगठन और निगम प्रशासन के बीच तालमेल नहीं सुधरा,
पार्षदों की नाराज़गी कम नहीं हुई,
जनसुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर ठोस परिणाम नहीं आए,
तो यह मामला केवल निगम की सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा।
शहरी सरकार की कार्यप्रणाली का सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य के निगम चुनावों पर भी दिखाई दे सकता है।
और यही कारण है कि आज दुर्ग की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा किसी विकास योजना की नहीं, बल्कि एक प्रश्न की हो रही है —
“क्या शहर सरकार के भीतर ही अविश्वास की नींव पड़ चुकी है?”
नई दिल्ली, ।
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी गई है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने मंगलवार को लगातार दूसरी बार ईंधन दरों में इजाफा किया, जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। पिछले सप्ताह दोनों ईंधनों में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बाद अब लगभग 90 पैसे प्रति लीटर तक की नई वृद्धि लागू की गई है।
राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत में 87 पैसे और डीजल में 91 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। तेल कंपनियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार और बढ़ती लागत के कारण कीमतों में संशोधन किया गया है।
तेल मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार, पिछली बढ़ोतरी के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर प्रतिदिन लगभग ₹750 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यही कारण है कि कंपनियां लगातार कीमतों में संशोधन कर रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन कीमतों में लगातार वृद्धि का असर परिवहन, खाद्य वस्तुओं और दैनिक उपयोग की चीजों पर भी पड़ सकता है। इससे आम जनता को आने वाले दिनों में और अधिक महंगाई का सामना करना पड़ सकता है।
वहीं विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है, जबकि सरकार का कहना है कि वैश्विक परिस्थितियों और तेल आयात लागत का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ रहा है।
नई दिल्ली/ ।
दुनियाभर में तेजी से बढ़ती डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया के दुरुपयोग के बीच यौन उत्पीड़न, डीपफेक और ब्लैकमेल से जुड़े मामलों ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। अमेरिका के वित्तीय केंद्र वॉल स्ट्रीट से लेकर भारत के विभिन्न राज्यों तक हाल के महीनों में सामने आए सेक्स स्कैंडलों ने समाज, कानून व्यवस्था और साइबर सुरक्षा पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिका की दिग्गज वित्तीय संस्था जेपी मॉर्गन (JPMorgan) में एक बड़े यौन उत्पीड़न विवाद ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, बैंक के एक वरिष्ठ बैंकर ने अपनी महिला बॉस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मामला तब और अधिक चर्चा में आया जब इससे जुड़े कथित AI-निर्मित डीपफेक चित्र और सोशल मीडिया मीम्स इंटरनेट पर वायरल होने लगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते दुरुपयोग ने निजी छवि, प्रतिष्ठा और मानसिक सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। डीपफेक तकनीक के जरिए किसी व्यक्ति की नकली तस्वीरें और वीडियो बनाकर उन्हें वायरल करना अब वैश्विक साइबर अपराध का बड़ा रूप लेता जा रहा है।
भारत में भी हाल के वर्षों में कई हाई-प्रोफाइल मामले सामने आए हैं।
मई 2024 में कर्नाटक का चर्चित प्रज्वल रेवन्ना सेक्स स्कैंडल देश के सबसे बड़े राजनीतिक विवादों में शामिल रहा। इस मामले ने राजनीतिक गलियारों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक व्यापक बहस को जन्म दिया था।
इसके अलावा, अप्रैल 2026 में महाराष्ट्र के अमरावती में सामने आए एक बड़े सेक्स स्कैंडल ने लोगों को झकझोर दिया। पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि 19-20 वर्ष के कुछ युवकों ने कई युवतियों के आपत्तिजनक वीडियो बनाकर ब्लैकमेल और वसूली का कथित रैकेट चला रखा था।
विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, एआई टूल्स और डिजिटल तकनीकों का गलत इस्तेमाल अब साइबर अपराधों को और अधिक खतरनाक बना रहा है। निजी डेटा की चोरी, मॉर्फ्ड फोटो, डीपफेक वीडियो और ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग जैसे मामलों में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में सख्त साइबर कानून, तेज जांच और डिजिटल साक्ष्यों की निगरानी बेहद जरूरी हो गई है। साथ ही लोगों को सोशल मीडिया पर निजी जानकारी साझा करते समय अधिक सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है।
इन घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि तकनीक जहां सुविधा और विकास का माध्यम बन रही है, वहीं उसका दुरुपयोग समाज के लिए गंभीर खतरा भी बन सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि AI और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के सुरक्षित एवं जिम्मेदार उपयोग को लेकर वैश्विक स्तर पर मजबूत नीतियों और जागरूकता की आवश्यकता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
