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दुर्ग / शौर्यपथ
दुर्ग शहर, जो कभी निष्पक्ष पत्रकारिता और मजबूत संवाद परंपरा के लिए जाना जाता था, इन दिनों एक अजीब विडंबना का गवाह बन रहा है। यहां अब सिर्फ राजनेता ही राजनीति नहीं कर रहे—बल्कि पत्रकारों के बीच भी सियासत अपने चरम पर है। और इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि इस ‘कलम की लड़ाई’ में अब राजनीतिक दलों के मीडिया प्रभारी भी खुलकर भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं।
? प्रेस क्लब की दीवारों के भीतर ‘दो खेमों’ की कहानी
वरिष्ठ पत्रकारों के पुराने प्रेस क्लब में लंबे समय से चल रहे आंतरिक मतभेद ने आखिरकार एक नए प्रेस क्लब के जन्म को जन्म दिया। सामान्यतः इसे लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देखा जा सकता था, लेकिन यहां कहानी कुछ और ही है।
नए प्रेस क्लब के अस्तित्व में आते ही पुराने क्लब के कुछ सदस्यों की सक्रियता संगठन मजबूती की दिशा में नहीं, बल्कि नए मंच को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति में बदलती दिखी।
परिणाम—पत्रकारों के बीच संवाद की जगह अब अविश्वास और आरोपों की दीवार खड़ी हो गई है।
? भाजपा कार्यालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस: ‘मीडिया मैनेजमेंट’ या ‘मीडिया विभाजन’?
हाल ही में भाजपा कार्यालय में मंत्री गजेंद्र यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया।
बताया जाता है कि भाजपा की मीडिया टीम ने बिना स्पष्ट सूचना के पत्रकारों को दो हिस्सों में बांटकर अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर दी।
यह कोई तकनीकी चूक नहीं लगती—क्योंकि प्रेस विज्ञप्तियां तो सभी पत्रकारों तक नियमित रूप से पहुंचती हैं।
सवाल यह है कि जब सूचना भेजी जा सकती है, तो समान मंच क्यों नहीं दिया गया?
इस घटना के बाद जो बहस और विवाद सामने आए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह सिर्फ ‘समन्वय की कमी’ नहीं, बल्कि सुनियोजित विभाजन भी हो सकता है।
? कांग्रेस भी पीछे नहीं: ‘भेदभाव की नीति’ सर्वदलीय?
यदि यह माना जाए कि यह समस्या केवल भाजपा तक सीमित है, तो यह अधूरी सच्चाई होगी।
कांग्रेस के मीडिया प्रबंधन पर भी ऐसे ही आरोप लगते रहे हैं—जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस में चयनात्मक आमंत्रण और ‘पसंदीदा पत्रकारों’ को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति खुलकर सामने आती है।
इससे यह संकेत मिलता है कि पत्रकारों के बीच की दरार को राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से साधने में लगे हैं।
? ‘पत्रकार’ की परिभाषा भी विवाद में
स्थिति का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि प्रेस क्लब की सदस्यता और ‘पत्रकार’ की पहचान भी सवालों के घेरे में है।
ऐसे कई नाम सामने आते हैं जो नियमित प्रकाशन भी नहीं कर पाते, लेकिन किसी अन्य पत्र की एजेंसी लेकर ‘पत्रकार’ कहलाने की होड़ में शामिल हैं।
इस प्रवृत्ति का असर सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं—यह वरिष्ठ और गंभीर पत्रकारों की साख पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
? ‘3-4 एकड़ जमीन’ का शिगूफा: हकीकत या हास्य?
इसी बीच एक कथित दावे ने पूरे शहर में चर्चा का विषय बना दिया—कि शासन द्वारा प्रेस क्लब के लिए 3-4 एकड़ जमीन मुफ्त में दी गई है, जहां पत्रकारों की कॉलोनी बनाई जाएगी।
हालांकि, यह दावा अब तक किसी ठोस आधार पर खरा नहीं उतरा और शहर में इसे अधिकतर लोग मजाक या ‘राजनीतिक गुब्बारा’ ही मान रहे हैं।
ऐसे बयानों ने गंभीर मुद्दों को भी हल्का बना दिया है।
? बड़े आयोजन, छोटी सोच: सरोज पांडे कार्यक्रम भी विवादों में
देश-प्रदेश की वरिष्ठ नेता सरोज पांडे के हालिया कार्यक्रम में भी यही तस्वीर दोहराई गई।
इतने बड़े आयोजन में प्रेस कॉन्फ्रेंस का दो हिस्सों में बंट जाना न केवल मीडिया प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि क्या जानबूझकर ऐसा किया गया?
परिणाम—कार्यक्रम को वह व्यापक प्रचार नहीं मिल सका, जिसका वह हकदार था।
? ‘कलम’ अगर बंट गई, तो सवाल कौन पूछेगा?
दुर्ग में पत्रकारों के बीच बढ़ती यह खाई केवल व्यक्तिगत या संगठनात्मक विवाद नहीं है—यह लोकतांत्रिक संवाद के लिए खतरे की घंटी है।
जब पत्रकार ही आपसी खेमेबाजी में उलझ जाएंगे,
जब राजनीतिक दल उन्हें अपने हिसाब से ‘मैनेज’ करने लगेंगे,
और जब मंच संवाद का नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का बन जाएगा—
तब सबसे बड़ा नुकसान होगा सच्चाई और जनता के अधिकार का।
दुर्ग को यह तय करना होगा—
पत्रकारिता ‘प्रतिस्पर्धा’ रहेगी या ‘प्रतिशोध’?
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
