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May 19, 2026
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“ए धीरज… ओ धीरज…” से “अध्यक्ष साहब” तक का सफर आखिर कब तय करेगी दुर्ग कांग्रेस? Featured

  • rounak group

शौर्यपथ विशेष लेख।

पद की गरिमा बनाम व्यक्तिगत संबंध : दुर्ग कांग्रेस के सामने बड़ा सवाल

दुर्ग की राजनीति इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर शहर कांग्रेस संगठन वर्षों बाद सक्रियता, ऊर्जा और संगठन विस्तार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ता नजर आ रहा है, तो दूसरी ओर उसी संगठन के भीतर पद की गरिमा और अनुशासन को लेकर कई ऐसे दृश्य सामने आ रहे हैं, जो आत्ममंथन की मांग करते हैं।

शहर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में धीरज बकरीवाल की नियुक्ति के बाद दुर्ग कांग्रेस की कार्यशैली में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई दिया है। लंबे समय तक “रिमोट कंट्रोल” शैली के आरोप झेलने वाले संगठन में अब मैदान में सक्रिय नेतृत्व दिखाई दे रहा है। मंडल स्तर तक बैठकों का विस्तार, युवाओं की भागीदारी, पुराने कार्यकर्ताओं का पुनर्सक्रिय होना और आंदोलनों में बढ़ती भीड़ इस बात का संकेत है कि संगठनात्मक स्तर पर धीरज बकरीवाल लगातार अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं।

18 मई को “शहरी सरकार” के खिलाफ हुए कांग्रेस आंदोलन ने भी यह साबित किया कि दुर्ग कांग्रेस अब केवल औपचारिक राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। पहले जहां आंदोलनों में गिने-चुने चेहरे नजर आते थे, वहीं अब बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति संगठन सृजन की दिशा में सकारात्मक संकेत देती है।

लेकिन इसी आंदोलन के दौरान एक ऐसा दृश्य भी सामने आया जिसने कांग्रेस की अंदरूनी संस्कृति पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से “ए धीरज… ओ धीरज…” जैसे संबोधन इस्तेमाल किए गए। यह संबोधन व्यक्तिगत रिश्तों के स्तर पर सामान्य लग सकता है, लेकिन जब वही व्यक्ति संगठन का अधिकृत शहर अध्यक्ष हो, तब प्रश्न केवल नाम पुकारने का नहीं, बल्कि पद की गरिमा का बन जाता है।

राजनीतिक संगठनों की मजबूती केवल भीड़, नारों या आंदोलनों से तय नहीं होती। किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके अनुशासन, संरचना और पदों के सम्मान से निर्मित होती है। यही वह बिंदु है जहां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की कार्यशैली में बड़ा अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।

भाजपा में पद पर बैठा व्यक्ति उम्र में छोटा हो या बड़ा, व्यक्तिगत संबंध चाहे जैसे हों, सार्वजनिक मंच पर उसे उसके पद के अनुरूप संबोधित किया जाता है। यही कारण है कि संगठनात्मक अनुशासन भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। कार्यकर्ता यह समझता है कि वह केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि संगठनात्मक व्यवस्था का सम्मान कर रहा है।

दुर्ग शहर भाजपा का उदाहरण सामने है। भाजपा जिला अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक के अधीन पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। शायद ही ऐसा कोई अवसर देखने को मिला हो जब किसी विधायक या वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक रूप से अध्यक्ष पद की गरिमा को कमतर करने वाला व्यवहार किया हो। यही संगठनात्मक संस्कृति भाजपा को बूथ से लेकर सत्ता तक मजबूती प्रदान करती है।

कांग्रेस के भीतर समस्या यह नहीं कि वरिष्ठ नेता धीरज बकरीवाल को व्यक्तिगत रूप से “धीरज” कहकर संबोधित करते हैं। समस्या यह है कि सार्वजनिक मंच पर अध्यक्ष पद की गरिमा को किस नजर से देखा जा रहा है। यदि वरिष्ठ ही पद की औपचारिक मर्यादा का पालन नहीं करेंगे, तो नए कार्यकर्ताओं में संगठनात्मक अनुशासन की भावना कैसे विकसित होगी?

आज कांग्रेस जिस दौर से गुजर रही है, उसमें केवल विचारधारा या विरोध की राजनीति पर्याप्त नहीं है। संगठन को मजबूत करने के लिए आंतरिक अनुशासन, पदों का सम्मान और सामूहिक नेतृत्व की संस्कृति विकसित करना अनिवार्य हो गया है।

यह भी सच है कि धीरज बकरीवाल स्वयं शायद इन संबोधनों पर कोई आपत्ति न रखते हों। संभव है कि वे इसे वरिष्ठों का स्नेह मानते हों। लेकिन राजनीति में कई बार व्यक्ति की व्यक्तिगत सहजता से अधिक महत्वपूर्ण संस्था और पद की गरिमा होती है। अध्यक्ष केवल “धीरज” नहीं रहते, वे उस समय पूरे संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं।

कांग्रेस को यह समझना होगा कि परिवारवाद, गुटबाजी और “मैं” केंद्रित राजनीति से ऊपर उठे बिना संगठनात्मक पुनर्जीवन संभव नहीं है। यदि भाजपा के संगठनात्मक मॉडल में कुछ सकारात्मक तत्व हैं, तो उन्हें अपनाने में वैचारिक हार नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता दिखाई देती है।

आज जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस कार्यकर्ता यह महसूस करें कि संगठन किसी व्यक्ति विशेष का मंच नहीं, बल्कि सामूहिक राजनीतिक व्यवस्था है। जहां पद का सम्मान व्यक्ति से बड़ा होता है।

आंदोलन हजारों हो सकते हैं, भीड़ लाखों की हो सकती है, लेकिन यदि संगठन के भीतर ही पद और जिम्मेदारी का सम्मान कमजोर पड़ जाए, तो राजनीतिक ताकत धीरे-धीरे खोखली होने लगती है।

“ए धीरज… ओ धीरज…” से “अध्यक्ष साहब” तक का यह सफर केवल संबोधन बदलने का नहीं, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक सोच बदलने का सवाल है। और शायद यही वह परिवर्तन है जिसकी दुर्ग कांग्रेस को आने वाले समय में सबसे अधिक आवश्यकता है।

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