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May 19, 2026
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क्या चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर मंडरा रहा है संवैधानिक संकट? Featured

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सुप्रीम कोर्ट में 2023 के कानून पर तीखी बहस, बड़ी संविधान पीठ को सौंपे जाने पर मंथन

नई दिल्ली। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और चुनावी निष्पक्षता से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में आज 19 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई गंभीर संवैधानिक प्रश्न केंद्र में रहे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम Court की पीठ ने इस बात पर गंभीर विचार किया कि क्या इस मामले को कम से कम पांच न्यायाधीशों वाली बड़ी संविधान पीठ (Constitution Bench) को भेजा जाना चाहिए।

यह मामला केवल नियुक्ति प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब यह देश में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, संस्थागत स्वायत्तता और संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) से जुड़ी बड़ी बहस का रूप ले चुका है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा बताते हुए कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की। अदालत ने यह संकेत दिया कि मामला केवल तकनीकी व्याख्या का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास का भी है।

संविधान पीठ को भेजने पर गहन बहस

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि क्या इस विवाद में इतने व्यापक संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं कि इसे बड़ी संविधान पीठ को भेजा जाए। अदालत ने माना कि मामला चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता तथा कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन जैसे मूलभूत मुद्दों को छूता है।

हालांकि याचिकाकर्ताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। याचिकाकर्ता-इन-पर्सन एस.एन. शुक्ला सहित अन्य पक्षकारों ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने पूर्व निर्णयों में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के सिद्धांत स्पष्ट कर चुका है। ऐसे में मामले को बड़ी पीठ के पास भेजना केवल न्यायिक प्रक्रिया को लंबा करने जैसा होगा।

केंद्र सरकार ने कानून का किया बचाव

केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने 2023 के कानून का जोरदार बचाव किया। उन्होंने अदालत से कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद को यह अधिकार प्राप्त है कि वह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मॉडल स्वयं तय करे।

सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल करना कोई संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। सरकार के अनुसार संसद ने अपने विधायी अधिकारों का उपयोग करते हुए नया ढांचा तैयार किया है, जिसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।

कोर्ट की पुरानी टिप्पणियों ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें

हालांकि पिछली सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई तीखी टिप्पणियां आज भी पूरे विवाद के केंद्र में बनी हुई हैं। अदालत पहले ही यह कह चुकी है कि मौजूदा चयन समिति में प्रधानमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री की उपस्थिति सरकार को स्थायी रूप से 2:1 का बहुमत देती है, जिससे नेता प्रतिपक्ष की भूमिका केवल “सजावटी” बनकर रह जाती है।

कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि जब सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए चीफ जस्टिस को शामिल किया जा सकता है, तो चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था में किसी तटस्थ सदस्य को शामिल करने से परहेज क्यों किया गया।

अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए थे कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं और यदि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर संदेह पैदा होता है, तो इसका सीधा असर लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ेगा।

अनोप बरनवाल फैसले से शुरू हुआ पूरा विवाद

यह पूरा संवैधानिक विवाद सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक “अनोप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023)” फैसले के बाद शुरू हुआ था। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति द्वारा की जाएगी।

इसके बाद केंद्र सरकार ने “मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023” पारित किया, जिसमें चयन समिति से चीफ जस्टिस को हटाकर उनकी जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया गया। इसी बदलाव को याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

लोकतंत्र की दिशा तय कर सकता है फैसला

संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में भारत की चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता की दिशा तय कर सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस कानून को संवैधानिक कसौटी पर असफल मानता है, तो चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में बड़े बदलाव संभव हैं।

फिलहाल देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला केवल एक कानून की वैधता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की निष्पक्षता और संवैधानिक संतुलन की परीक्षा बन चुका है।

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