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March 10, 2026
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बात-बात में चमचे/भक्त का युद्ध लड़ रहे क्रांतिकारी योद्धाओं को समर्पित

  • devendra yadav birth day

शौर्य की बातें / जब लोकतंत्र का निर्माण हुआ था तब पक्ष और विपक्ष की रचना की गई थी इस सोच के साथ कि जब विपक्ष सरकार से सवाल करेगा तो तानाशाही, निरंकुशता पर रोक लगेगी। सरकार से सवाल पूछे जाएंगे तो सरकार अच्छे से अच्छा काम करने की कोशिश करेगी, देश को अपनी पैतृक संपत्ति समझकर राज नही करेगी। एक जिम्मेदार लोकतंत्र के लिए एक सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी है। पर अफसोस ये है कि कुछ वर्ग पूरा आशावादी बन बैठा है जिसको हर बात पर कोई छुपा मास्टर स्ट्रोक नजर आता है।
आप अगर हमारे साथ नही तो हमारे खिलाफ हो, ये अहंकार, ये असभ्यता ही तो निरंकुशता की पहचान है। मैं उनको भी सही नही कहूंगा जो हर मुद्दे पर केवल सरकार को कोसते नजर आते हैं। असल में समझदारी की लाइन इन दोनों के बीच है।
अगर हर व्यक्ति एक ही नेता एक ही पार्टी एक ही सिद्धांत को चुन लेगा तो विविधता तो खत्म हो जाएगी और एकरसता आ जायेगी जो सर्वांगीण विकास में निःसंदेह बाधक है। हांजी हांजी के चमचों को पसंद करने वाले अक्सर इन्ही चाटुकारों के बीच घुसे रहते हैं। इनकी दुनिया बहुत छोटी होती है। जब कोई दूसरा पक्ष दिखाता है तो इनका अहंकार गुस्से के रूप में फटकार बाहर आता है।
एक भाई साहब ने तो ये तक कह दिया कि देश के pm का विरोध नही कर सकते? अरे भाई तो विपक्ष क्यो बैठा है संसद में? सबको बाहर कर दीजिए और सारी पावर मोदीजी को दे दीजिए।
ये सुनने में उसी को अच्छा लगेगा जिसे लगता है मोदीजी वही करेंगे जैसे वो चाहता है क्योकि उनकी सोच एक है। यही सोच तो इटली में मुसोलिनी, जर्मनी में हिटलर जैसों को जन्म देती है। ये सभी नेता प्रसिद्ध रहे। निर्विरोध रहे, इनकी अवहेलना इनका अपमान राष्ट्र का अपमान माना जाता था। मिश्र के फराहो राजा को भी देवताओं के द्वारा नियुक्त माना जाता था और विरोध की मनाही थी।
इसी आधार पर आज भी एक किताब है जिस पर शक और शुबह नही की जा सकती। जरा सोचिए आप किस तरह के भारत का निर्माण चाहते हैं? केवल अच्छा अच्छा देखने वाला भी उतना ही समझदार है जितना सिर्फ बुरा बुरा देखने वाला।
आये दिन फेसबुक पर इन दो धड़ों में बहस होती रहती है। मेरी बात सुनो मैं सही, हमारी बात सुनो हम सही, हमारे नेता की बात सुनो हमारा नेता सही। ये तीनो विचार एक ही हैं बस इनका दायरा अलग अलग है। सच बताऊँ तो ये बचपना ही है क्योकि कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नही हो सकता। कोई व्यक्ति हर बात हर काम सही नही कर सकता। गुण दोष सभी मे भरा हुआ है। पर जब बात एक राष्ट्र की आती है जिसके अंदर डेढ़ अरब लोग हैं तो गलती की गुंजाइश कम हो जाती है।
जनता मालिक है नौकर नही, हम वोटर है पार्टी के प्रवक्ता नही, अगर मान भी लिया जाए कि हमारा नेता देवतुल्य है तो भी क्या देवताओं ने गलतियां नही की? इसीलिए लोकतंत्र की रक्षा इसी में है कि शक्तिशाली से सवाल किया जाए। जब हमारा नेता सही होगा हम पीछे चलेंगे, जब गलती करेगा तो कुर्सी से उतारना भी हमारा अधिकार है। अपनी इज्जत पहले कीजिये आपके नेता तो इज्जतदार हैं ही।
आप जनता हैं, जनता ही रहिए .

लेख - डॉ. सिद्धार्थ शर्मा - सुपेला भिलाई 

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