July 31, 2026
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    शहर सरकार के प्रोटोकॉल विवाद और पुलिस की एंट्री पर तीखा कटाक्ष: क्या 'महाभियोग/ अविश्वास प्रस्ताव ' की दहलीज पर हैं महापौर? Featured

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       दुर्ग। शौर्यपथ । दुर्ग नगर पालिक निगम के इतिहास में 'शहर सरकार' का ऐसा रंग-ढंग शायद ही कभी देखा गया हो। जिस कुर्सी पर कभी समन्वय और विकास की राजनीति हुआ करती थी, आज वहां केवल विवादों का 'हाई-वोल्टेज ड्रामा' चल रहा है। निगम गलियारों से लेकर चाय के ठेलों तक अब बस एक ही सुगबुगाहट है—क्या महापौर अलका बाघमार के खिलाफ 'महाभियोग/ अविश्वास प्रस्ताव ' आएगा?
    नाराजगी सिर्फ विपक्ष (कांग्रेस) को नहीं है; सत्ता पक्ष के अपने ही पार्षद सामान्य सभा में भेदभाव और वार्डों की उपेक्षा का आरोप लगाकर अपनी ही मुखिया को आईना दिखा चुके हैं। लेकिन हाल ही में जो वाकया हुआ, उसने तो नगर निगम को किसी 'थ्रिलर फिल्म' का सेट बना दिया।

    जब बिना किसी विरोध-प्रदर्शन के निगम पहुंच गई 'पुलिस की फौज'
    निगम परिसर में उस वक्त हड़कंप मच गया जब बिना किसी धरने, प्रदर्शन या हंगामे के अचानक दो थानों के प्रभारी और सीएसपी दुर्ग लाव-लश्कर के साथ धमक पड़े। चर्चा है कि महापौर ने अन्य विभागों के कार्यपालन अभियंताओं को प्रोटोकॉल का पाठ पढ़ाने के लिए अपने केबिन में बुलाया था।
    अधिकारी शांति से चर्चा कर ही रहे थे कि पुलिस की इस 'सरप्राइज एंट्री' ने कई सवाल खड़े कर दिए:
    आखिर बिना किसी विवाद के पुलिस प्रशासन को किसने और क्यों फोन घुमाया?
    क्या अब शहर सरकार को अपने ही अधिकारियों से संवाद करने के लिए 'खाकी' के साए की जरूरत पड़ रही है?या फिर अधिकारियो को महापौर के व्यवहार पर विश्वास नहीं है ?
    सोशल मीडिया पर महापौर का एक वीडियो भी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह भरे मंच से अधिकारियों को तल्ख अंदाज में 'प्रोटोकॉल' की नसीहत देती नजर आ रही हैं। राजनीति के जानकार चुटकी ले रहे हैं कि जनता के बुनियादी मुद्दों पर इतनी सख्ती दिखाई जाती, तो आज शहर की सूरत कुछ और होती।

    विकास का 'वन-मैन शो': मंत्री गजेंद्र यादव की सक्रियता से बढ़ीं दूरियां?
    एक तरफ जहां महापौर अपनी घटती लोकप्रियता और अंतर्कलह से जूझ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के शिक्षा मंत्री और दुर्ग शहर के विधायक गजेंद्र यादव के जमीनी प्रयासों ने विकास कार्यों की झड़ी लगा दी है। शहर में जो भी बड़े और ऐतिहासिक काम दिख रहे हैं, वे सीधे मंत्री जी के खाते में जा रहे हैं:

    स्टेडियम परिसर                               भव्य बैडमिंटन कोर्ट का निर्माण
    पॉलिटेक्निक कॉलेज परिसर                अत्याधुनिक स्विमिंग पूल की सौगात
    शहरी कनेक्टिविटी केनाल रोड का निर्माण और जेल चौक से पुलगांव चौक तक फोर लेन सड़क की शुरुआत
    सौंदर्यीकरण एवं जन-सुविधा राजेंद्र पार्क चौक का कायाकल्प,

    गया नगर में सांस्कृतिक भवन, और समृद्धि बाजार में सब्जी मंडी का संधारण

    इन सभी बड़े प्रोजेक्ट्स का क्रेडिट (श्रेय) सीधे मंत्री गजेंद्र यादव और उनके समर्थकों को मिल रहा है। इस 'क्रेडिट वॉर' ने महापौर की बेचैनी को और बढ़ा दिया है। लेकिन सवाल यह है कि जनता महापौर को क्रेडिट दे भी तो क्यों?
    बदहाली का शिकार दुर्ग: बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती जनता
    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सुशासन के संकल्प और उपमुख्यमंत्री व नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव द्वारा राशि की कोई कमी न रखने के बावजूद, दुर्ग नगर निगम बदहाली के नए कीर्तिमान गढ़ रहा है।

    निगम की नाकामियों की लंबी फेहरिस्त:
    इंदिरा मार्केट की दुर्दशा: व्यापार का मुख्य केंद्र आज पूरी तरह बदहाल है।
    सुराना कॉलेज के सामने नरक: गंदगी और बदबूदार वातावरण से छात्र और राहगीर हलाकान हैं।
    गुमठी आवंटन में भ्रष्टाचार: आरोप हैं कि इस पूरे खेल में शहरी सरकार की मौन सहमति है।
    अवैध कब्जों को संरक्षण: चतुर्भुज राठी जैसे अवैध कब्जाधारियों के साथ मंच साझा करने से भाजपा के 'जीरो टॉलरेंस' के दावे पर सवाल उठ रहे हैं।
    सड़क पर अवैध बाजार: शनिवार को चर्चगेट पर लगने वाला अवैध बाजार यातायात और व्यवस्था को ठेंगा दिखा रहा है।

    क्या 'साय सरकार' के सुशासन को आईना दिखा रही हैं महापौर?
    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहां एक ओर प्रदेश को पारदर्शिता और विकास की पटरी पर दौड़ा रहे हैं, वहीं दुर्ग निगम की यह कार्यप्रणाली सरकार की छवि को बट्टा लगा रही है। हालात ये हैं कि अपनी ही पार्टी के पार्षद अब वार्डों में जनता का सामना करने से कतराने लगे हैं।
    राजनीतिक गलियारों में यह तीखा कटाक्ष भी चल रहा है कि महापौर अलका बाघमार के ऐसे आचरण को देखकर लगता है मानो वह खुद कांग्रेस के साथ मिलकर आगामी चुनावों में भाजपा प्रत्याशी की विदाई की स्क्रिप्ट लिख रही हों।
    निगम के भीतर कल हुई 'पुलिसिया ड्रामे' की गूंज अब दुर्ग से निकलकर रायपुर में संगठन के बड़े नेताओं के कानों तक पहुंच चुकी है। देखना दिलचस्प होगा कि सुशासन का दम भरने वाला भाजपा संगठन इस 'स्वघोषित प्रोटोकॉल सरकार' पर कब और क्या एक्शन लेता है, या फिर पार्षदों का बढ़ता असंतोष सीधे 'महाभियोग/ अविश्वास प्रस्ताव ' का रास्ता साफ करेगा!
    दुर्ग निगम की इस प्रशासनिक खींचतान और संगठन के भीतर चल रहे इस शीतयुद्ध को लेकर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि समन्वय की कमी विकास कार्यों को पूरी तरह प्रभावित कर रही है?

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