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सेहत /शौर्यपथ / आपको अगर कोई स्नैक्स खाने का मन करता है, तो आप किशमिश खा सकते हैं। स्वाद के साथ सेहत के लिए भी किशमिश एक हेक्दी स्नैक्स माना जाता है। आइए, जानते हैं इसके फायदे-
किशमिश में फॉस्फोरस, कैल्शियम और पोटैशियम पाया जाता है जो बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में मदद करता है। बच्चों को किशमिश खिलाने से मस्तिष्क को पोषण मिलता है और यादाश्त मजबूत होती है। किशमिश में उच्च मात्रा में फाइबर होता है
कब्ज दूर करती है किशमिश
किशमिश खाने से कब्ज में बहुत फायदा मिलता है। इसे पानी में भिगाकर खाने से कब्ज दूर होती है। अगर आपको कब्ज, एसिडिटी और थकान की समस्या है, तो यह काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। इसका नियमित रूप से सेवन करने से जल्द आपको फायदा नजर आएगा।
खून की कमी दूर करने के लिए
किशमिश में पर्याप्त मात्रा में विटामिन बी कॉम्प्लेक्स पाया जाता है जिससे खून की कमी नहीं होती। आप में अगर खून की कमी है तो आप 7-10 किशमिश का सेवन रोजाना कर सकते हैं।
ब्लड प्रेशर
यदि आपके घर में किसी को उच्च रक्तचाप की समस्या है तो रात को आधे गिलास पानी में 8-10 किशमिश भिगो दें। सुबह उठकर बिना कुछ खाएं किशमिश के पानी को पी लें। आप चाहें तो भीगी हुई किशमिश को खा भी सकते हैं। इससे कुछ दिन में उच्च रक्तचाप की समस्या में आराम मिलेगा।
लिवर को सेहतमंद रखता है
प्रतिदिन किशमिश के पानी का सेवन करना आपके लिवर को सेहतमंद बनाए रखने और उसे सुचारू रूप से कार्य करने के लिए प्रेरित करने का काम भी करता है। साथ ही आपके मेटाबॉलिज्म के स्तर को नियंत्रित करने में भी सहायक है।
वजन बढ़ाने में मददगार
अगर आप अंडरवेट हैं और अपने वजन को बढ़ाना चाहते हैं, तो किशमिश आपकी मदद कर सकती है। किशमिश फ्रुक्टोज से भरपूर होती है, जो शरीर का वजन बढ़ाने में मदद कर सकती है।
खेल /शौर्यपथ / दिल्ली कैपिटल्स के सलामी बल्लेबाज शिखर धवन का मानना है कि टीम पहले की तुलना में काफी मजबूत है और आईपीएल का खिताब जीतने के बेहद करीब है। शिखर को दिल्ली ने पिछले साल अपनी टीम में शामिल किया था और उन्होंने आईपीएल के पिछले सत्र में 16 मैचों में 521 रन बनाए थे। शिखर पहले सनराइजर्स हैदराबाद के लिए खेलते थे। 34 साल के शिखर ने कहा, “कुछ सालों बाद दिल्ली की टीम में वापस आना सुखद है। दिल्ली हमेशा मेरा घर रहा है और दिल के काफी करीब रहा है।''
उन्होंने कहा, ''मेरे ख्याल से टीम पहले की तुलना में काफी मजबूत है और आईपीएल जीतने के काफी करीब है। मुझे यकीन है कि हम जल्द आईपीएल का खिताब जीतेंगे और प्रशंसकों को ट्रॉफी देंगे। वे इसके हकदार हैं, क्योंकि हमारे प्रशंसक हमेशा टीम का समर्थन करते हैं।”
परिवार वालों के साथ समय बिताकर इसे अवसर में बदल रहा हूं
कोरोना के कारण लॉकडाउन में क्रिकेट गतिविधियां ठप्प पड़ी हुई है और ऐसे में खिलाड़ी घरवालों के साथ समय बिता रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैं महामारी के दौरान परिवार वालों के साथ समय बिताकर इसे अवसर में बदल रहा हूं। वह ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं और मुझे उनसे मिलने का काफी कम समय मिलता है, क्योंकि मुझे लगातार यात्रा करनी पड़ती है।”
मैदान पर वापसी के लिए इंतजार नहीं कर पा रहा
बल्लेबाज ने कहा, “मुझे खुशी है कि मैं अपने परिवार के साथ समय बिता रहा हूं और उनके करीब आ रहा हूं। हालांकि मैं दोबारा मैदान पर वापसी के लिए इंतजार नहीं कर पा रहा हूं। लेकिन इसके साथ ही मैं इस बात से दुखी नहीं हूं कि मैं घर में समय व्यतीत कर रहा हूं।”
अब खेलते समय कैमरे की तरफ देखकर जश्न मनाऊंगा
खाली स्टेडियम में खेलने के सवाल पर शिखर ने कहा कि दर्शकों के बिना खेलने से क्रिकेट बिल्कुल बदल जाएगा। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि दर्शकों के बिना खेलने से क्रिकेट बदल जाएगा। उदाहरण के तौर पर मैं खेलते समय कैमरे की तरफ देखकर जश्न मनाऊंगा, जिससे प्रशंसक मुझे टीवी पर देखें।”
कई बार चोट के कारण टीम से बाहर होना पड़ा
लंबे समय तक भारतीय टीम में शामिल रहने के बावजूद कई बार उन्हें चोट के कारण टीम से बाहर होना पड़ा है, लेकिन शिखर का मानना है कि सकारात्मक रहने से मुझे मदद मिली है। शिखर ने कहा, “मेरी इच्छाशक्ति बहुत मजबूत है और चोट से मुझे दुख नहीं होता। मैं हमेशा सकारात्मक रहता हूं क्योंकि यह आपको सुधार लाने में मददगार होता है। मुझे लगता है कि जरुरी है क्योंकि आपको अपने ऊपर भरोसा करना होता है।”
हम एक-दूसरे को अंडर-19 के दिनों से जानते हैं
रोहित शर्मा के साथ ओपनिंग करने पर उन्होंने कहा कि उन्हें रोहित के साथ संवाद करने में आसानी होती है। उन्होंने कहा, “हम एक-दूसरे को अंडर-19 के दिनों से जानते हैं और मैदान के अंदर तथा बाहर हमारी अच्छी दोस्ती है। उनके साथ संवाद करने में मुझे आसानी होती है, जिसका फायदा मैदान पर होता है। बल्लेबाजी करते वक्त अगर मुझे परेशानी होती है तो मैं उनसे बात करता हूं।”
भारतीय टीम एक परिवार की तरह
सलामी बल्लेबाज ने कहा, “सिर्फ मैदान पर ही नहीं बल्कि मैदान के बाहर भी ओपनिंग साझेदार और टीम के खिलाड़ियों के साथ बेहतर रिश्ते बनाए रखना जरुरी है। भारतीय टीम एक परिवार की तरह है। हम लगातार साथ में यात्रा करते हैं। करीब साल में 200 दिन साथ में रहते हैं, इससे एक दूसरे के साथ रिश्ते बनाने में आसानी होती है।”
आईसीसी टूर्नामेंट में शानदार रिकॉर्ड पर शिखर ने कहा, “हम इन टूर्नामेंटों के लिए अलग से तैयारी नहीं करता। मैं भाग्यशाली हूं कि मैंने विश्वकप और चैंपियंस ट्रॉफी से पहले अपनी लय प्राप्त की। एक खिलाड़ी होने के नाते मैं प्रतिदिन खुद को तैयार करता हूं और हर दिन अच्छा प्रदर्शन करना चाहता हूं। मुझे बेहद खुशी होती है कि मैं बड़े टूर्नामेंटों में टीम के लिए बेहतर प्रदर्शन कर पाता हूं।”
मनोरंजन / शौर्यपथ / कोरोना वायरल और लॉकडाउन में होने की वजह से फिल्म मेकर्स का अब OTT प्लेटफॉर्म्स पर अपनी फिल्में रिलीज करने का सिलसिला जारी है। फिल्म गुलाबो सिताबो के बाद अब विद्या बालन स्टारर फिल्म शकुंतला देवी बायोपिक का प्रीमियर अब सिनेमाघरों के बजाए अमेजन प्राइम वीडियो पर होने जा रहा है। इस फिल्म में विद्या, ह्यूमन कंप्यूटर मानी जाने वाली गणितज्ञ शकुंतला देवी के रोल में नजर आएंगी। खबरों की मानें तो शकुंतला देवी की रिलीज़ डेट भी फाईनल कर ली गई है। ये फिल्म 31 जुलाई को रिलीज़ हो रही है। हालांकि रिलीज डेट को लेकर फिल्म मेकर्स की तरफ से अभी तक कोई ऑफिशियल बयान नहीं आया है।
आपको बता दें कि हाल ही में अमेजन प्राइम वीडियो ने इस बात का ऐलान कर बताया था कि शकुंतला देवी बायोपिक को 200 देशों और क्षेत्रों के खास मेम्बर्स के लिए विशेष रूप से प्रीमियर किया जाएगा।
बता दें कि ये फिल्म शकुंतला देवी के जीवन पर आधारित है, जो सेकंड के भीतर अविश्वसनीय रूप से कठिन से कठिन सवाल को चुटकी में सुलझा लेने के लिए प्रसिद्ध है। इस फिल्म में विद्या बालन संग सान्या मल्होत्रा ने भी काम किया है। सान्या इस फिल्म में शकुंतला देवी की बेटी की भूमिका निभाती हुई नजर आएंगी। साथ ही अमित साध और जिस्शु सेनगुप्ता भी अहम भूमिका में नजर आएंगे। शकुंतला देवी बायोपिक का निर्देशन अनु मेनन ने किया है और इसे लिखा भी उन्होंने ही है। इस फिल्म को सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स प्रोडक्शंस और विक्रम मल्होत्रा ने प्रोड्यूस किया है। कहानी को अनु मेनन और नयनिका महतानी ने लिखा है, जबकि डायलॉग इशिता मोइतरास ने लिखे हैं।
मनोरंजन / शौर्यपथ / बॉलीवुड की सनशाइन गर्ल अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडीज महामारी के कारण हुए लॉकडाउन के दौरान भी समय का सदुपयोग करना और चीजों के प्रति सकारात्मक रवैया बनाए रखना निश्चित रूप से जानती हैं। अपने समय का सदुपयोग करते हुए दूसरों को प्रेरित करना उन्हें अच्छे से आता है!
जैकलीन फर्नांडीज से जब लॉकडाउन के दौरान व्यस्त रहने के उनके अनुभव के बारे में पूछा गया, तो अभिनेत्री ने कहा, हां, मेरी फिल्म की रिलीज, प्रोमोशन, सलमान के साथ गाना, बादशाह के साथ गाना, मैगजीन शूट और अब शो- जब काम की बात आती है, तो मुझे महसूस ही नहीं हो रहा है कि मैं लॉकडाउन में हूं, शुक्र है कि ऐसा हो रहा है।
अभिनेत्री ने आगे कहा, व्यक्तिगत रूप से मैं सकारात्मक बने रहने की कोशिश कर रही हूं और वह सब कर रही हूं जिससे मैं खुद को व्यस्त रख सकूं। मैं यथासंभव प्रोडक्टिव बने रहने की कोशिश करती हूं। घर में रहना और अपने रोजमर्रा के काम के लिए बाहर न जाना, कुल मिलाकर यह हर किसी के लिए एक कठिन समय रहा है, लेकिन मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि मैं खुद को व्यस्त रखने में सक्षम रही हूं। हमें इस समय का जितना संभव हो सके उतना सदुपयोग करना चाहिए।
साथ ही मुझे उम्मीद है कि इस कठिन समय के खत्म होते ही हम सब एक बार फिर से अपनी सामान्य जिंदगी की शुरुआत करेंगे। जैकलीन पिछले कुछ दिनों तक अपनी हालिया रिलीज फिल्म ‘मिसेज सीरियल किलर’ के प्रोमोशन में व्यस्त थीं, जिसमें वह एक अनदेखे किरदार में नजर आई हैं। अभिनेत्री ने इस साल सुपरस्टार सलमान खान के साथ ‘तेरे बिना’ के अलावा ‘मेरे अंगने में’ और ‘गेंदा फूल’ जैसे कुछ बेहतरीन हिट गाने भी दिए हैं।
नजरिया /शौर्यपथ /एक वेबिनार में केरल की एक महिला ने कहा कि उसके रिश्तेदार अमेरिका में रहते हैं। लॉकडाउन के इन दिनों में माता-पिता, दोनों को काम पर जाना पड़ रहा है, जबकि दोनों छोटे बच्चे घर में अकेले रहते हैं। वे भारी परेशानी में हैं कि क्या करें। बच्चों की सुरक्षा की चिंता में काम भी ठीक से नहीं कर पाते हैं। दूसरी रिश्तेदार महिलाओं ने कहा कि अमेरिका के अधिकांश स्थानों पर बच्चों के स्कूल और कॉलेज इस पूरे साल के लिए बंद कर दिए गए हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अब नौकरी पर कैसे जाएं। वैसे भी करोड़ों नौकरियां जा चुकीं। हर एक की नौकरी पर अमेरिका में संकट मंडरा रहा है। आज बच्चों के लिए नौकरी छोड़ दें, तो कल मिलना बेहद मुश्किल है। एक नौकरी में खर्चा भी नहीं चल सकता। कल बच्चे बड़े होंगे, तो उनके खर्चे बढ़ेंगे। आज कमाए पैसे कल काम आएंगे। ऐसे में क्या करें? बच्चों को पूरे दिन के लिए अकेला कैसे छोड़ें। वे किसी दुर्घटना या अपराध के शिकार हो जाएं, तो क्या करेंगे?
अमेरिका में इन दिनों बहुतायत में ऐसे बच्चे हैं, जो स्कूल बंद होने के कारण घरों में हैं। स्कूल के अलावा खेल-कूद तथा अन्य गतिविधियों में भी भाग लेने कहीं नहीं जा सकते। अमेरिका में बहुत से माता-पिता चाहते हैं कि स्कूल खुलें और वे बच्चों को वहां भेज सकें।
इन दिनों लॉकडाउन के कारण विमान सेवाएं भी बंद ही हैं, आवाजाही की कोई गुंजाइश नहीं, इसलिए ऐसा भी नहीं हो सकता कि भारत से माता या पिता अपने माता-पिता को बुला लें। वैसे भी भारतीय माता-पिताओं के बारे में विदेश में मशहूर है कि वे अपने बच्चों के बच्चे पालने विदेश आते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि अकसर बच्चों को अपने माता-पिता तभी याद आते हैं, जब उन्हें अपने बच्चे पलवाने होते हैं या कोई और काम होता है। लेकिन दादा-दादी या नाना-नानी इसे खुशी-खुशी मान लेते हैं। तीसरी पीढ़ी से उनका लगाव हजार परेशानियों और उपेक्षा के होते हुए भी कम नहीं होता, लेकिन इस दौर की मजबूरी का क्या करें? देश-विदेश में बिखरे हुए ऐसे परिवार परेशान हैं। वह तो भला हो तकनीक का कि बात हो जाती है।
लेकिन अपने देश भारत में क्या हाल है? हाल ही में दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा था कि अभी तो स्कूल खोलने की बात सोची भी नहीं जा सकती। बहुत से स्कूल ऑनलाइन पढ़ा रहे हैं। बहुतों ने बिना परीक्षा लिए बच्चों को अगली कक्षा में प्रमोट कर दिया है, लेकिन इस लेखिका ने फेसबुक पर बहुत-सी युवा माताओं की लिखी बातें पढ़ी हैं। वे कह रही हैं कि स्कूल खुल भी जाएं, तो वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगी। एक मां ने लिखा कि अगर बच्चे का एक साल का नुकसान हो भी जाए, तो परवाह नहीं, बच्चे की जान से ज्यादा कीमती कुछ भी नहीं है। बच्चा ठीक रहा, तो पढ़-लिख भी लेगा। एक मां ने तो यह भी लिखा कि अगर बच्चे को घर से पढ़ाने के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी, तो वह छोड़ देगी। शायद बच्चों के पिता भी ऐसा ही सोचते होंगे। जब समाज और परिवार में बदलाव हो रहे हैं, तो सभी को थोड़ा बदलना होगा। समय केअनुरूप समझौते करने पडें़गे। आज परिवार में परस्पर एक-दूसरे की ज्यादा चिंता करना जरूरी है और मां-बाप की चिंता ऐसे माहौल में सबसे ज्यादा है।
माता-पिता की चिंता तब और भी जायज हो उठती है, जब बार-बार कहा जा रहा है कि कोरोना की जद में अब बच्चे भी हैं। एक अध्ययन में पिछले दिनों कहा गया था कि नौ साल के बाद बच्चों के लिए कोरोना का खतरा बढ़ जाता है। जबकि अब बता रहे है कि कोई भी इस वायरस के खतरे से बाहर नहीं है। ऐसे में, आखिर कौन माता-पिता होंगें, जो अपने बच्चों की जान खतरे में डालना चाहेंगे। भारत में रहने वाले माता-पिता अब भी अपने बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा किसी और बात को नहीं मानते। अपने यहां चूंकि बुजुर्गों के अलावा घर में मदद करने के लिए घरेलू सहायक भी आसानी से मिल जाते हैं, उनका खर्चा भी अमेरिका में मिलने वाले सहायकों के मुकाबले बहुत कम होता है, इसलिए हो सकता है कि कई माता-पिता बच्चों के घर में रहते हुए भी नौकरी पर चले जाएं। अमेरिका हो या भारत, हर जगह समय के साथ तालमेल बिठाना होगा और हम बच्चों के आसपास एक नई तरह की सामाजिकता का विकास देखेंगे।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) क्षमा शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार
सम्पादकीय लेख /शौर्यपथ /भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों की ताजा रैंकिंग हमेशा की तरह सुखद और अनुकरणीय है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने गुरुवार को भारतीय शैक्षणिक संस्थानों की एनआईआरएफ रैंकिंग 2020 जारी कर दी और स्वाभाविक ही ओवरऑल कैटेगरी में आईआईटी, मद्रास पहले स्थान पर है। मद्रास स्थित यह इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट योग्यता के सारे मानकों पर अव्वल रहा है। यहां की शिक्षण गुणवत्ता, परिवेश, पाठ्यक्रम, अनुशासन, परिणाम, शोध इत्यादि सभी जरूरी मोर्चे चाकचौबंद हैं। यहां पढ़कर निकले युवाओं की जिंदगी आसान हो जाती है और सबसे अच्छी बात कि यह संस्थान निरंतर अपनी गुणवत्ता बनाए हुए है। इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट की कैटेगरी में भी आईआईटी, मद्रास टॉप पर आया है, तो अचरज नहीं। देश के तमाम इंजीनियरिंग और शिक्षण संस्थानों के प्रबंधकों को एक बार आईआईटी, मद्रास के समग्र शिक्षण स्वरूप का अध्ययन जरूर करना चाहिए। छात्रों की ऐसी बहुत सारी छोटी-छोटी शैक्षणिक और मानसिक जरूरतें होंगी, जिनकी पूर्ति करके यह संस्थान टॉप पर बना हुआ है।
भारतीय विश्वविद्यालयों की बात करें, तो इस कैटेगरी में आईआईएससी, बेंगलुरु की बादशाहत कायम है। दूसरे स्थान पर जेएनयू, दिल्ली और तीसरे पर बीएचयू का होना पूरे देश के लिए गौरव की बात है। ये ऐसे नामी विश्वविद्यालय हैं, जिन पर देश की निगाह टिकती है और इनकी श्रेष्ठता सिद्ध होना, दूसरे तमाम संस्थानों को प्रेरित करता आया है। हालांकि एक सोचने की बात जरूर है कि इन सूचियों में टॉप पर वर्षों से वही नाम क्यों चले आ रहे हैं? क्या सिर्फ टॉप 15 संस्थान अपनी गुणवत्ता बनाए हुए रैंकिंग में बने हुए हैं? जहां एक ओर, यह सकारात्मक बात है, वहीं दूसरी ओर, इससे यह भी पता चलता है कि उच्च गुणवत्ता के नए संस्थान वांछित गति से सामने नहीं आ रहे हैं। सर्वश्रेष्ठ मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट की कैटेगरी में आईआईएम, अहमदाबाद का अव्वल आना, दूसरे स्थान पर आईआईएम, बेंगलुरु का रहना, इन संस्थानों की बनी हुई गुणवत्ता का प्रमाण है। चिकित्सा मेडिकल कॉलेज कैटेगरी में एम्स, दिल्ली अगर टॉप पर है, तो जाहिर है, उस पर लोगों की निर्भरता का ही यह नतीजा है।
क्या इस रैंकिंग का अंतरराष्ट्रीय महत्व है? हां, ऐसी सूची से दूसरे देशों के छात्रों को भी भारत में शिक्षा की गुणवत्ता केबारे में सूचना मिलती है। हालांकि क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2021 के अनुसार, भारत की ओर से आईआईटी, मुंबई सर्वश्रेष्ठ है, वह विश्व स्तर पर 172वें स्थान पर है। जबकि यही संस्थान भारत की ओवरऑल रैंकिंग में चौथे स्थान पर बताया गया है। विश्व रैंकिंग के पैमानों को हम भले न मानें, लेकिन तब भी हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि हम श्रेष्ठता का एक सुनिश्चित पैमाना तय करें और अपने तमाम संस्थानों को उस दिशा में प्रेरित करें। ऐसी सूचियों का विस्तार से विश्लेषण होता है और होना भी चाहिए। जो संस्थान रैंकिंग में पिछड़ गए हैं, उनके प्रबंधकों, शिक्षकों और छात्रों को कतई उदास नहीं होना चाहिए। ध्यान रहे, ये तमाम टॉप संस्थान देश के बमुश्किल 10 शहरों में हैं, जबकि अच्छी पढ़ाई हर जगह संभव है। इसके लिए जरूरी है कि सभी संस्थान और हम पूरी ईमानदारी से कोशिश करें।
मेलबॉक्स /शौर्यपथ / जहां एक तरफ देश कोरोना जैसे अदृश्य दुश्मन से लड़ रहा है, तो दूसरी तरफ स्त्रियां अपनी आबरू की रक्षा के लिए संघर्षशील हैं। कोरोना-काल में भी महिलाओं को केवल उपभोग की वस्तु समझने वाले लोगों की संख्या न सिर्फ बढ़ रही है, बल्कि उनकी सोच दिनोंदिन और घृणित भी हो रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, भारत में हर 15 मिनट पर किसी महिला से छेड़छाड़ और हर 29 मिनट पर बलात्कार होता है। यह तो वह आंकड़ा है, जो दर्ज हो पाता है, जबकि अधिकांश मामले तो लोक-लाज की वजह से सामने ही नहीं आ पाते। सरकारों ने भले ही इसे रोकने के लिए कठोर कानून बनाए हैं, पर स्थिति यथावत बनी हुई है। अगर विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लोगों में महिलाओं के मुद्दों को लेकर जागरूकता व संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाया जाए, तो शायद इन आंकड़ों में कमी देखने को मिले।
आयुष कुमार, दरभंगा, बिहार
खत्म होता खौफ
बाजार निकलने पर पता ही नहीं चलता कि भारत कोरोना जैसी जानलेवा महामारी की जद में है। सड़कों पर भीड़ बनी हुई है और लोग मास्क सिर्फ नाममात्र को पहन रहे हैं। दुकानों में भी पहले की तरह लोग गप्पे लगा रहे हैं। फिजिकल डिस्टेंसिंग नाम की कोई चीज नहीं है। खबर है कि अकेले दिल्ली में जुलाई तक साढ़े पांच लाख कोरोना के मरीज हो जाएंगे, जबकि न्यूजीलैंड ने कोरोना-मुक्त होकर बता दिया है कि सरकार की सख्ती व जनता के सहयोग से बड़ी से बड़ी बीमारी से लड़ा जा सकता है। हमें समझना होगा कि जान है, तभी जहान है। अभी बीमारी ने तो रफ्तार पकड़ी है, खत्म कहां हुई है।
विनय मोहन, सेक्टर 18, जगाधरी
बाल मजदूरी के खिलाफ
कोरोना महामारी के बीच आज विश्व बाल श्रम निषेध दिवस का महत्व कुछ और बढ़ जाता है। इस साल महामारी की वजह से वैश्विक आजीविका और श्रम बाजार को लगे गहरे झटके से विश्व भर के लाखों बच्चों पर बाल श्रम का खतरा मंडरा रहा है। दुनिया भर में बाल श्रम के आंकड़ों पर एक नजर डालें, तो पांच से 18 साल के 21.8 करोड़ बच्चे रोजगार में हैं, जिनमें से लगभग 7.3 करोड़ बच्चे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से खतरनाक कामों में लगे हैं। महामारी के इस भीषण दौर में वैश्विक गरीबी, श्रम बल की तुलना में काम का अभाव और अभिभावकीय मृत्यु दर में वृद्धि के कारण बच्चों की बड़ी संख्या बाल श्रम की ओर जाएगी। ऐसे में, बाल श्रम को रोकने के लिए सरकारों और समुदायों को मिलकर कड़ी प्रतिबद्धता के साथ आगे आना होगा। हमें स्वहित से निकलकर खुद की मानवीय संवेदना को जगाते हुए बच्चों के कोमल हाथों में काम की बजाय खिलौने और कलम थमाने होंगे। उन्हें खुद के सपने जीते हुए उसे साकार करने की तरफ भी प्रेरित करना होगा, ताकि एक बेहतर कल बन सके।
अंकित कुमार मिश्रा
पटसा, समस्तीपुर
कर्ज की वसूली
भगोड़े व्यवसायी नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के 1,350 करोड़ रुपये के गहने जब्त करके हांगकांग से भारत लाए गए हैं। यह ईडी की एक बड़ी कार्रवाई है। अमूमन देखा जाता है कि बैंकों द्वारा छोटे कारोबारियों, किसानों और मजदूरों को दिए गए कर्ज को वापस लेने के लिए कठोर कदम उठाए जाते हैं, मगर बड़े खिलाड़ियों पर हाथ नहीं डाला जाता। ताजा घटनाक्रम से भविष्य में बैंकों के साथ होने वाली धोखाधड़ी को रोकने में सहायता मिलेगी। इससे जनता में अच्छा संदेश गया है कि अब बड़े लोगों पर भी कुर्की जैसी कार्रवाई की जा सकती है। अब सरकार को विजय माल्या सहित सभी भगोड़े बैंक डिफॉल्टरों का प्रत्यर्पण कराना चाहिए।
विवेक गुप्ता, शादीपुर, बिजनौर
ओपिनियन /शौर्यपथ / वर्ष 2015 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सतत विकास के जो लक्ष्य तय किए थे, उनमें हर प्रकार की बाल मजदूरी का अंत एक प्रमुख लक्ष्य था। दुनिया को गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, पर्यावरण आदि से जुड़े लक्ष्यों को 2030 तक हासिल करना है, जबकि बाल मजदूरी सहित मानव दासता के खात्मे का लक्ष्य 2025 रखा गया है। अब इस लक्ष्य को हासिल करने में महज साढ़े चार साल बचे हैं। मगर कोरोना महामारी सिर्फ स्वास्थ्य और आर्थिक से जुड़ा संकट नहीं है, यह बच्चों के भविष्य का संकट भी है।
दो दशक पहले साल 2000 में दुनिया में बाल मजदूरों की संख्या करीब 26 करोड़ थी, जो हम सबके साझा प्रयासों से घटकर अब 15 करोड़ रह गई है। इसी अनुभव के आधार पर यह भरोसा था कि निश्चित अवधि में योजनाबद्ध तरीके से इस बुराई का खात्मा किया जा सकता है। लेकिन पिछले पांच वर्षों में जितनी राजनीतिक इच्छाशक्ति, धन-राशि, नैतिक जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता की जरूरत थी, दुर्भाग्य से उसका अभाव रहा। पिछले साल अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के महानिदेशक गाए रायडर ने एक कार्यक्रम में चिंता जाहिर करते हुए आशंका भी जताई थी कि जिस रफ्तार से हम चल रहे हैं, उससे सन् 2025 में भी 12 करोड़ बाल मजदूर बचे रहेंगे। हालांकि तब मैंने कई विश्व नेताओं के सामने उन्हें विनम्रतापूर्वक चुनौती देते हुए कहा था कि हमें आशावादी होना चाहिए। आज की दुनिया बाल मजदूरी को खत्म करने में पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने और कई नेताओं ने मेरी बात का समर्थन भी किया था। लेकिन, तब मुझे नहीं पता था कि कोरोना वायरस हमारे सामने और भी बड़ी चुनौती लेकर आएगा। मौजूदा हालात में बाल मजदूरी, बाल विवाह, वेश्यावृत्ति और बच्चों का उत्पीड़न बढ़ने का खतरा है, इसलिए अब पहले से अधिक ठोस और त्वरित उपायों की जरूरत है। गुलामी और तरक्की साथ-साथ नहीं चल सकते, लिहाजा गुलामी का अंत तो करना ही पड़ेगा।
कोरोना महामारी के कारण इस साल विश्व के करीब छह करोड़ नए बच्चे बेहद गरीबी में धकेले जा सकते हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में बाल मजदूर बनेंगे। सरकारें 30 करोड़ बच्चों को मध्याह्न भोजन या स्कूल जाने के बदले उनके माता-पिता को नकद धन-राशि देती हैं। एक बार लंबी अवधि के लिए स्कूल छूट जाने के बाद ज्यादातर गरीब बच्चे दोबारा नहीं लौटते। अर्जेंटीना में 2018 में हुई शिक्षकों की लंबी हड़ताल के बाद स्कूलों में बच्चों की संख्या घटी और बाल मजदूरी बढ़ी। लाइबीरिया में फैली इबोला महामारी के बाद भी ऐसा ही हुआ था। कोरोना का ज्यादा दुष्प्रभाव सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े और कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। उनकी गरीबी व बेरोजगारी और बढ़ेगी। इसका खामियाजा उनके बच्चों को भुगतना पड़ेगा। ब्राजील, कोलंबिया, आइवरी कोस्ट और घाना के कोको उत्पादन, पूर्वी एशिया के मछली पालन आदि क्षेत्रों में तेजी से बाल मजदूरी बढ़ने का खतरा है। भारत के लाखों प्रवासी श्रमिकों के बच्चों की भी यही हालत हो सकती है।
महामारी के असामान्य हालात में बाल मजदूरी बढ़ने से रोकने के लिए हमें कुछ ठोस उपाय करने होंगे। पहला, लॉकडाउन के बाद यह सुनिश्चित करना होगा कि स्कूल खुलने पर सभी छात्र कक्षाओं में वापस लौट सकें। इसके लिए स्कूल खुलने से पहले और उसके बाद भी, उनको दी जाने वाली नकद प्रोत्साहन राशि, मध्याह्न भोजन, वजीफे आदि को जारी रखना होगा। भारत में मध्याह्न भोजन और ब्राजील, कोलंबिया, जाम्बिया व मैक्सिको में अभिभावकों को नकद भुगतान जैसे कार्यक्रमों का बहुत लाभ हुआ है। इन्हें अन्य देशों में भी लागू करने से बाल मजदूरी कम होगी। मेक्सिको और सेनेगल जैसे देशों में शिक्षा के स्तर में सुधार से बाल मजदूरी कम हुई है।
दूसरा, शिक्षा क्षेत्र में प्रौद्योगिकी को सस्ता और सुलभ बनाकर गरीब व पिछड़े परिवारों के बच्चों को पढ़ाई से जोड़ा जाना जरूरी है। तीसरा, सरकारें गरीबों के बैंक खातों में नकद पैसा दें। साथ ही भविष्य में रोजी-रोटी के लिए उन्हें सस्ते व सुलभ कर्ज उपलब्ध कराएं, ताकि वे साहूकारों के चंगुल में न फंसें और अपने बच्चों को बंधुआ मजदूरी और मानव-व्यापार से बचा सकें। चौथा, अर्थव्यवस्था सुधारने और निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकारें श्रमिक कानूनों को लचीला बना रही हैं। इससे असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों में गरीबी और उनके बच्चों में बाल मजदूरी बढ़ेगी। बाल व बंधुआ मजदूरी के कानूनों में कतई ढील नहीं देनी चाहिए। पांचवां, देशी और विदेशी कंपनियां सुनिश्चित करें कि उनके उत्पादन व आपूर्ति-शृंखला में बाल मजदूरी नहीं कराई जाएगी। सरकारें निजी कंपनियों के सामान की बड़ी खरीदार होती हैं, इसलिए वे सिर्फ बाल मजदूरी से मुक्त सामान ही खरीदें।
दूरदर्शी और निर्णायक नेतृत्व का सबसे जरूरी पैमाना है कि वह नीतियों, कार्यक्रमों और आर्थिक नियोजन में अपने देश के बच्चों को कितनी प्राथमिकता देता है? मैंने विश्व भर के 45 नोबेल पुरस्कार विजेताओं, 20 भूतपूर्व राष्ट्राध्यक्षों, 2 संयुक्त राष्ट्र एजेंसी केप्रमुखों और दलाई लामा, आर्कबिशप डेसमंड टूटू, गॉर्डन ब्राउन जैसी 21 हस्तियों के साथ मिलकर अमीर राष्ट्रों से मांग की है कि कोरोना महामारी के आपात फंड के लिए घोषित पांच हजार अरब डॉलर की राशि का 20 प्रतिशत, यानी एक हजार अरब डॉलर दुनिया के 20 फीसदी उपेक्षित व निर्धन बच्चों और उनके परिवारों पर खर्च किया जाए। हमने अलग-अलग राष्ट्राध्यक्षों से भी इसी अनुपात में खर्च की मांग की है।
बाल मजदूरी, गरीबी और अशिक्षा में त्रिकोणीय रिश्ता है। वे एक-दूसरे को जन्म देते और चलाते हैं, जो समावेशी विकास, सामाजिक व आर्थिक न्याय और मानव अधिकारों में सबसे बड़ी बाधा है। आज अंतरराष्ट्रीय बाल श्रम विरोधी दिवस पर हमारी नैतिक जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा हो गई है। सिर्फ सुरक्षित और खुशहाल बचपन से सुरक्षित और खुशहाल दुनिया बनाई जा सकती है। यदि समाज, सरकारें, उद्योग, व्यापार जगत, धार्मिक संस्थाएं, मीडिया, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां और विश्व समुदाय अपने बच्चों के बचपन को सुरक्षित और खुशहाल नहीं बना पाए, तो हम एक पूरी पीढ़ी को बर्बाद करने के दोषी होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) कैलाश सत्यार्थी, नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित समाजसेवी
दुर्ग । शौर्यपथ । ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी से खरीदा गया मोबाइल वारंटी अवधि में खराब हुआ तो उसे सुधारा नहीं गया। समस्याग्रस्त मोबाइल बेचने और उसमें सुधार नहीं करने के लिये निर्माता कंपनी पैनासोनिक इंडिया, ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी फ्लिपकार्ट एवं सुपेला भिलाई स्थित सर्विस सेंटर आरवी सोलुशन को जिला उपभोक्ता फोरम दुर्ग के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने व्यवसायिक कदाचरण एवं सेवा में निम्नता का जिम्मेदार माना और 15 हजार रुपये हर्जाना लगाया।
ग्राहक की शिकायत
परिवाद के मुताबिक कैंप 1 भिलाई निवासी ओमप्रकाश साहू ने पैनासोनिक इंडिया कंपनी का मोबाइल ऑनलाइन शॉपिंग के माध्यम से दिनांक 23 अप्रैल 2017 को 8999 रुपये में खरीदा था, जिसमें कंपनी द्वारा 1 वर्ष की वारंटी प्रदान की गई थी लेकिन मोबाइल में खरीदने के बाद ही समस्या आनी शुरू हो गई। मोबाइल हैंग हो जाता था और अपने आप बंद हो जाता था, जिससे परेशान होकर परिवादी ने उसे भिलाई स्थित सर्विस सेंटर आरवी सोलुशन के पास दिखाया तब सर्विस सेंटर द्वारा मोबाइल का सॉफ्टवेयर अपडेट कर परिवादी को वापस कर दिया गया। मोबाइल में बार-बार खराबी आने लगी मोबाइल की समस्या लेकर परिवादी 12 जून 2017, 22 जून 2017, 09 जुलाई 2017 तथा 28 जुलाई 2017 को सर्विस सेंटर गया लेकिन कुछ दिन चलने के बाद मोबाइल पुनः खराब हो जाता था। अंत में दिनांक 20 सितंबर 2017 को मोबाइल के टच पैनल ने काम करना बंद कर दिया और मोबाइल हैंग होने लगा, जिसके बाद सर्विस सेंटर ने मोबाइल को सुधारने के लिए अपने पास रखा लेकिन कोई समाधान नहीं किया। जिसके बाद परिवादी ने उपभोक्ता फोरम की शरण ली।
अनावेदकगण का जवाब
प्रकरण में ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी फ्लिपकार्ट ने कहा कि उसका काम विक्रेताओं से सामान लेकर क्रेता तक पहुंचाने का है। मोबाइल में यदि कोई त्रुटि थी तो उसके लिए निर्माता कंपनी के सर्विस सेंटर से संपर्क किया जाना था। सर्विस सेंटर ने लिखित जवाब दिया कि परिवादी जितनी बार मोबाइल लेकर सर्विस सेंटर आया उसे उतनी बार भली-भांति सुधार कर दिया गया था। ऑनलाइन शॉपिंग के माध्यम से क्रय किए गए मोबाइल की जवाबदारी ऑनलाइन विक्रेता कंपनी तथा निर्माता कंपनी की होती है।
फोरम का फैसला
जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये एवं लता चंद्राकर ने प्रकरण में पेश दस्तावेजों और तर्कों के आधार पर यह पाया कि मोबाइल सुधार के समय जारी किए गए कस्टमर डिटेल से मोबाइल के सर्विस सेंटर में बनने के लिए बार-बार दिए जाने की पुष्टि होती है। मोबाइल में हैंग होने और बार-बार बंद होने जैसी समस्याएं थी। कंपनी द्वारा परिवादी को नया मोबाइल प्रदान करने की पेशकश से भी इस बात की पुष्टि होती है कि परिवादी द्वारा खरीदे गए मोबाइल में निर्माणगत त्रुटि थी। जिसका निदान करने में अनावेदकगण असफल रहे थे। मोबाइल खरीदने के 3 महीने में वारंटी अवधि में ही हैंग होने लगा था जिसे सुधार कर देने में अनावेदकगण असफल रहे। कंपनी द्वारा किए गए दावे के अनुसार मोबाइल नहीं था, परिवादी के साथ व्यवसायिक कदाचरण किया गया है।
जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये एवं लता चंद्राकर ने मोबाइल की कीमत 8999 रुपये, मानसिक क्षतिपूर्ति स्वरूप 5000 रुपये, तथा वाद व्यय के रूप में 1000 रुपये कुल मिलाकर 14999 रुपये निर्माता कंपनी पैनासोनिक इंडिया, ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी फ्लिपकार्ट एवं सुपेला भिलाई स्थित सर्विस सेंटर आरवी सोलुशन पर हर्जाना लगाते हुए एक माह के भीतर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित परिवादी को अदा करने का आदेश दिया।
दुर्ग । शौर्यपथ । अवैध व्यापार पर लगाम लगाने में दुर्ग निगम सदैव से उदासीन रहा । शहर के पटरी पार इलाके में पिछले साल भी सालो से चल रहे पानी पाउच की फैक्ट्री पर निगम द्वारा समाचार पत्रों में खबर प्रकाशित होने के बाद कार्यवाही की गई । अब एक नया मामला सामने आया है । पटरी पार क्षेत्र में स्थित कादंबरी नगर में सेव नमकीन की फैक्ट्री संचालित है । आवासीय क्षेत्र में संचालित इस उद्योग के मालिक का कहना है कि शासन से सभी अनुमति प्राप्त है । हो सकता है अनुमति भी मिली हो किन्तु आवासीय इलाके में शासन से सेव , नमकीन उद्योग के लिए अनुमति किस आधार पर प्राप्त हुई .
आवासीय क्षेत्र में व्यापार ...
प्राप्त जानकारी के अनुसार आनंद नमकीन ( राज फ़ूड प्रोडक्ट ) कादंबरी नगर के दो मंजिला आवास में सेव / मिक्स्जर की एक छोटी सी फेक्ट्री है . जिसमे 10 से 12 लोगो के काम करने की भी खबर है . आवासीय क्षेत्र में नमकीन फेक्ट्री में . नमकीन के निर्माण में भट्टी का भी उपयोग होता है ऐसे में आवासीय क्षेत्र में क्या संचालक द्वारा अग्नि शमन , प्रदुषण आदि के नियमो का पालन किया जाता है . जाँच का विषय यह भी है कि जिस भवन में यह संस्था संचालित है उस भवन का निगम को टेक्स आवासीय के रूप में दिया जाता है साथ ही इस भवन में संचालित संस्था को निगम के लाइसेंस विभाग द्वारा व्यापार करने की अनुमति भी प्राप्त है .
होनी चाहिए लाइसेंस जारी करने वाले अधिकारी की जाँच
आनंद नमकीन एक आवासीय परिसर में संचालित है और इसे गुमास्ता लाइसेंस निगम दुर्ग में ज़ारी हुआ है साथ ही ट्रेड लाइसेंस भी दुर्ग निगम द्वारा जारी हुआ है . आवासीय परिसर पर लघु उद्योग के रूप में संचालित संस्था को लाइसेंस देते समय तात्कालिक अधिकारी द्वारा आखिर किस पैमाना के तहत ट्रेड व गुमास्ता लाइसेंस जारी किया गया है यह भी जाँच का विषय है क्या तात्कालिक लाइसेंस प्रभारी दुर्गेश गुप्ता द्वारा मामले को संज्ञान में लेकर मामले की निष्पक्ष जाँच की जाएगी और दोषी सम्बंधित अधिकारियों पर निगम प्रशासन कार्यवाही करेगा .
बड़ा सवाल ...
सालो से लघु उद्योग संचालित इस भवन में आखिर शासन के किन किन नियमो के तहत निरिक्षण कर अनुमति प्रदान की गयी. भवन के आधे हिस्से का व्यावसायिक उपयोग करने वाले संचालक द्वारा आखिर व्यवसायिक भवन का आवासीय टेक्स देकर शासन को अँधेरे में रखा जा रहा है क्या निगम प्रशासन मामले को संज्ञान लेकर नियमानुसार कार्यवाही करेगा ?
बता दे कि परिसर के आज बाजू आवासीय इलाका है साथ ही प्रथम तल में जो फेक्ट्री संचालित है उसके भूतल में निवास स्थान है । बता दे कि सेव फेक्ट्री में बड़ी बड़ी भट्टियों का उपयोग होता है इस स्थिति में सुरक्षा मानकों का भी विशेष ख्याल रखना पड़ता है । क्या आवासीय कॉलोनी में इस तरह के लघु उद्योग के लिए आवासीय बिल्डिग का व्यवसायिक उपयोग कर संचालन कर्ता द्वारा शासन की आंख में धूल झोंका जा रहा है ? क्या दुर्ग निगम मामले को संज्ञान में ले निष्पक्ष जांच व कार्यवाही करेगा ?
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
