
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
राम रसोई के नाम पर सड़क पर कब्जा, धर्म स्थल के सामने कब्ज़े की दीवार , और प्रशासन की चुप्पी — क्या यही है सुशासन ?
शौर्यपथ विशेष
एक ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार सुशासन की बात कर रहे हैं,धर्म रक्षा की बात कर रहे है सुशासन पर्व मनाया जा रहा है, और जनता को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि सरकार पारदर्शिता, न्याय और कानून के राज के लिए प्रतिबद्ध है प्रदेश में राम राज्य की स्थापना हो रही है । वहीं दूसरी ओर, उन्हीं की सरकार में नियुक्त अधिकारी ज़मीनी स्तर पर सुशासन को खुलेआम आईना दिखाते नजर आ रहे हैं , हिन्दुओ के आराध्य प्रभु राम की सत्य और निति की बातो का विरोध करते नजर आ रहे है । दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में सामने आया मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक है, बल्कि सरकार के दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह और धर्म व प्रभु राम के नाम पर अवैध कब्ज़े सन्देश खड़ा करता है।
दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में गणेश मंदिर के सामने स्थित एक सार्वजनिक मार्ग और श्रद्धालुओं के लिए उपयोग में आने वाला स्थल, राम रसोई के संचालक द्वारा सड़क पर कब्जा कर लिया गया है। यह कोई खाली भूमि नहीं थी, बल्कि वर्षों से आम जनता के आवागमन और त्योहारों के दौरान प्रार्थना स्थल के रूप में प्रयुक्त होती रही है। इसके बावजूद यह अवैध कब्जा आज भी जस का तस बना हुआ है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल को इस अवैध कब्जे की पूरी जानकारी होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई? आम जनता ने विरोध दर्ज कराया, आवाज उठाई, लेकिन धनवानों के प्रभाव और गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी के सामने जनता की आवाज दबती चली गई। यह चुप्पी केवल लापरवाही नहीं, बल्कि कहीं न कहीं अवैध कब्जाधारियों को दिया गया मौन समर्थन प्रतीत होती है।
एक तरफ शहर के चौक-चौराहों पर अतिक्रमण की भरमार है, दूसरी ओर निगम प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने के लिए गरीबों की छोटी-छोटी गुमटियों पर बुलडोज़र चलाकर कार्रवाई का ढोल पीटता है। प्रश्न यह है कि कानून सिर्फ कमजोरों के लिए ही क्यों सक्रिय होता है? धनवानों और प्रभावशाली लोगों के सामने प्रशासन की कलम क्यों सूख जाती है?
राम रसोई जैसे पवित्र नाम का उपयोग कर शासकीय भूमि और सड़क पर कब्जा करना न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि धार्मिक आस्था पर भी प्रहार है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने कभी अन्याय और नियमों के विरुद्ध आचरण नहीं किया, लेकिन उन्हीं के नाम पर आज अवैध कब्जा किया जा रहा है — और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
यह और भी चिंताजनक है कि यह सब उस दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में हो रहा है, जहाँ प्रदेश सरकार के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री ललित चंद्राकर, भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे, प्रदेश संगठन मंत्री जितेंद्र वर्मा और दुर्ग जिला भाजपा अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक जैसे बड़े नेताओं के निवास हैं। इन सबके बीच खुलेआम अवैध कब्जे पर कार्रवाई न होना क्या इस बात का संकेत नहीं है कि मुख्यमंत्री का सुशासन दुर्ग में सिर्फ काग़ज़ों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित है?
निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल द्वारा शहर की बिगड़ती व्यवस्था पर मौन, अवैध कब्जाधारियों पर कार्रवाई से परहेज और चुनिंदा कार्रवाई की नीति, यह स्पष्ट करती है कि संवैधानिक शक्तियों का उपयोग जनहित में नहीं, बल्कि मनमर्जी और प्रभाव के आधार पर किया जा रहा है।
दुर्ग नगर निगम की यह स्थिति सरकार के लिए चेतावनी है। यदि समय रहते ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो सुशासन का दावा जनता की नजर में खोखला साबित होगा। सवाल साफ है — क्या सरकार सच में सुशासन चाहती है, या फिर कुछ अधिकारी अपनी चुप्पी से पूरे शासन को कठघरे में खड़ा करने पर आमादा हैं?
दुर्ग / शौर्यपथ
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार जहां सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को अपनी प्राथमिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम से सामने आया एक प्रकरण इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। मामला न केवल प्रशासनिक निर्णयों की असंगतता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार छोटे कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई और वरिष्ठ अधिकारियों पर महज औपचारिक माफी की नीति अपनाई जा रही है।
दो साल बाद पदोन्नति निरस्त : पीडि़त कौन, दोषी कौन?
दुर्ग नगर निगम में वर्षों से पंप अटेंडेंट के रूप में कार्यरत कर्मचारी राजू लाल चंद्राकर को तत्कालीन आयुक्त लोकेश चंद्राकर के कार्यकाल में विभागीय पदोन्नति समिति (ष्ठक्कष्ट) की संस्तुति पर जल कार्य निरीक्षक के पद पर पदोन्नति प्रदान की गई थी। यह पदोन्नति किसी एक अधिकारी के व्यक्तिगत निर्णय से नहीं, बल्कि विधिवत गठित समिति की अनुशंसा पर हुई थी।
इस समिति में —
दिनेश नेताम, कार्यपालन अभियंता
जितेंद्र सोमैया, सहायक अभियंता (वर्तमान में सेवानिवृत्त)
राजकमल बोरकर, कार्यालय अधीक्षक
जावेद अली, तत्कालीन स्वास्थ्य अधिकारी
भूपेंद्र गोईर, सहायक ग्रेड-3
शामिल थे। स्थापना प्रभारी बंजारे द्वारा आवश्यक अभिलेख समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे। समिति ने उपलब्ध पद, सेवा अभिलेख और नगरीय निकाय नियमों के आधार पर राजू लाल चंद्राकर को पदोन्नति देने का निर्णय लिया।
वर्तमान आयुक्त का आदेश और उठा विवाद
लगभग दो वर्ष तक जल कार्य निरीक्षक के पद पर कार्य करने के बाद, जुलाई 2025 में वर्तमान आयुक्त सुमित अग्रवाल ने एक आदेश जारी कर न केवल राजू लाल चंद्राकर की पदोन्नति निरस्त कर दी, बल्कि उन्हें पुन: पंप अटेंडेंट के पद पर डिमोशन दे दिया। साथ ही, पदोन्नति समिति के सभी सदस्यों को नोटिस जारी किया गया।
नोटिस के जवाब में समिति के सभी सदस्यों ने स्पष्ट किया कि —पदोन्नति नगरीय निकाय नियमों के अनुरूप थी,पद की उपलब्धता मौजूद थी,पूर्व में भी इसी प्रकार की पदोन्नतियां हो चुकी हैं। इसके बावजूद, समिति के उत्तरों को अस्वीकार कर दिया गया। परिणाम यह रहा कि — समिति के सदस्यों को केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया,जबकि कर्मचारी राजूलाल चंद्राकर को पदावनत कर दिया गया।यही बिंदु आज दुर्ग निगम में सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक मामला
राजू लाल चंद्राकर ने वेतन और पद से जुड़े विवाद को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। एक शपथ पत्र में स्वयं आयुक्त सुमित अग्रवाल ने यह स्वीकार किया कि राजू लाल चंद्राकर उनके अधीनस्थ कर्मचारी हैं और जल कार्य निरीक्षक के रूप में कार्यरत रहे हैं।
प्रशासनिक कानून के जानकारों का कहना है कि — यदि पदोन्नति अवैध थी, तो दो वर्षों तक कार्य क्यों कराया गया? और यदि अवैध नहीं थी, तो डिमोशन का आधार क्या है? यही प्रश्न अब माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।
नियम विरुद्ध पदोन्नति थी तो अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
इस पूरे प्रकरण का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह है कि — यदि मान लिया जाए कि पदोन्नति नियमों के विरुद्ध थी, तो फिर:पदोन्नति समिति के सदस्यों पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं? ,स्थापना शाखा और फाइल आगे बढ़ाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं?
सिर्फ एक कर्मचारी को दंडित कर देना और निर्णय लेने वाले अधिकारियों को "चेतावनी का गुलदस्ता" थमा देना, प्रशासनिक न्याय की अवधारणा पर सवाल खड़े करता है। निगम के भीतर इसे निजी द्वेष और भेदभावपूर्ण नीति के रूप में देखा जा रहा है।
चयनात्मक कार्रवाई का लंबा इतिहास
दुर्ग निगम में यह पहला मामला नहीं है। वर्तमान आयुक्त के कार्यकाल में उच्च अधिकारियों की प्रताडऩा से त्रस्त कर्मचारियों द्वारा आत्महत्या के मामले सामने आए,बाद में नियमों को शिथिल कर आनन-फानन में परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति दी गई,जबकि अन्य समान मामलों में कर्मचारी महीनों से निलंबन झेल रहे हैं।
इसी तरह, सहायक राजस्व निरीक्षक थान सिंह यादव पर पार्किंग घोटाले में पेनल्टी लगने और लॉलीपॉप विज्ञापन घोटाले में भौतिक सत्यापन के दौरान अनियमितता बरतने के आरोप हैं। इन मामलों में निगम को राजस्व हानि हुई, परंतु कार्रवाई का दायरा ठेकेदार तक सीमित रहा — कर्मचारी फिर बच निकले।
सुशासन पर आईना
दुर्ग नगर निगम की यह कार्यप्रणाली अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रही। यह मामला सीधे तौर पर राज्य सरकार के सुशासन के दावों पर असर डाल रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बार-बार सुशासन की बात करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ अधिकारी यदि अपनी संवैधानिक शक्तियों का चयनात्मक और मनमाना प्रयोग करते हैं, तो उसकी आंच सरकार तक पहुंचना स्वाभाविक है।
अब सबकी निगाहें माननीय उच्च न्यायालय के फैसले पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल राजू लाल चंद्राकर के भविष्य का निर्धारण करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही किसकी होगी?और क्या वास्तव में दुर्ग निगम में 'कानून सबके लिए समानÓ है?फिलहाल, दुर्ग में चर्चा का बाजार गर्म है और सवाल एक ही है — क्या यह सुशासन है, या सत्ता की छाया में पनपता भेदभाव?
दुर्ग (शौर्यपथ)। जनवरी–फरवरी के निगम चुनावों में सुशासन का वादा कर जीत का दावा करने वाली ट्रिपल-इंजन सरकार का दुर्ग नगर निगम पर दिखता चेहरा अब सवालों के घेरे में है। स्थानीय नागरिकों, पार्षदों और विकास कार्यों से जुड़े ठेकेदारों का आरोप है कि निगम प्रशासन में भेदभाव और निष्क्रियता ऐसी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है कि शहर की रोज़मर्रा की समस्याएँ — अतिक्रमण, खुले नाले-पानी और अधूरे काम — सामान्य हो गए हैं।
नागरिकों का कहना है कि नगर आयुक्त सुमित अग्रवाल केवल कपड़ा लाइन पर बार-बार कार्रवाई कर के अपनी रिपोर्ट-कार्ड चमकाने में लगे हैं, जबकि गणेश मंदिर के सामने सड़क पर खुलेआम कब्जा और चर्च रोड पर बिना अनुमति लगा अवैध बाजार, समृद्धि बाजार में अवैध अतिक्रमण जैसे मामलों पर पर निगम आयुक्त का मौन रहना चिंता बढ़ाने वाला है। विभागीय सूत्रों की माने तो निगम के पास पिछले वर्ष से राजस्व वसूली में भारी वृद्धि हुई — लगभग ढाई गुना — और तमाम सरकारी राशि उपलब्ध होने के बाबजूद शहर के विकास कार्य रुकावटों का शिकार हैं।
ठेकेदारों व कर्मियों का आरोप है कि भुगतान महीनों तक रुके रहने से परियोजनाओं की रफ्तार ठप पड़ जाती है; इसके परिणामस्वरूप आम जनता को जहरीले पानी, अधूरी सड़कें , सड़कों पर आवारा पशुओं की फौज और अतिक्रमण वाली समस्याओं का दंश सहना पड़ रहा है। कई कर्मचारी व अधिकारी भी प्रशासनिक दमन व असमंजस की शिकायत करते हैं — “कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं, अधिकारी और कर्मचारी दहशत में हैं।”
एक ओर जहाँ स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि ठेके व अनुबंधों में अनियमितताएँ हैं — खासकर ‘लॉलीपॉप’ अनुबंध से जुड़े मामलों में जिसमेंखुलेआम राजस्व की हानि हुई बावजूदइसकेजिम्मेदार अधिकारी पर निगम प्रशासन द्वारा कार्यवाही न होने से “नैतिकता और जवाबदेही की कमी” के सन्देश जनता तक जा रहे हैं। निगम कार्यालय में कंप्यूटरों की अदला-बदली और अन्य व्यवस्थागत गड़बड़ियों के कारण विभागीय जवाबदेही भी प्रश्नचिह्न के नीचे आ चुकी है — नागरिकों का मत है कि जहरीले पानी मामले में प्लेसमेंट-कर्मचारी पर कार्रवाई कर के कागजी कार्यवाही दिखाई जा रही है, असल जिम्मेदारी अनछुई रह जाती है।
इन सभी आरोपों व शिकायतों के बीच सबसे अहम सवाल यह उठता है कि जब नगरीय निकाय विभाग उपमुख्यमंत्री अरुण साव के पास है तो क्या मंत्रालय स्तर पर किसी सख्त हस्तक्षेप की जरूरत नहीं दिखती? चुनावी मंचों पर सुशासन की बातें करने वाले उपमुख्यमंत्री के पास विभाग होने के बावजूद दुर्ग में प्रशासनिक बदहाली जारी रहना सीधे तौर पर उनकी नीतिगत जवाबदेही पर भी प्रश्न खड़ा करता है।
नगर पालिक निगम के मौजूदा आयुक्त को स्थानीय गतिविधियों व शिकायतों से अवगत कराया जा चुका है — लेकिन हालात में कोई ठोस सुधार न होना जनता के मन में यह आशंका पैदा कर रहा है कि क्या प्रशासन कुछ खास लोगों के प्रति नरम रवैया अपनाकर समग्र जनता की समस्याओं को अनदेखा कर रहा है। पार्षदों और नागरिक समूहों की मांग है कि या तो तुरंत सघन निरीक्षण कर दोषियों को कड़ी सजा दी जाए या फिर स्वतंत्र जांच कराई जाए ताकि शहर के विकास और सुशासन की बातें सिर्फ चुनावी बयानों तक सीमित न रहें।
दुर्ग। शौर्यपथ।
दुर्ग शहर का प्रशासन इस समय जिस तरह की निष्क्रियता और अनदेखी का परिचय दे रहा है, वह न केवल जनता के लिए चिंता का विषय है बल्कि शासन की छवि पर भी गहरा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
इंदिरा मार्केट से बस स्टैंड के बीच स्थित प्रसिद्ध गणेश मंदिर के सामने, जहां हर बुधवार को हजारों की भीड़ उमड़ती है, वहां राम रसोई संचालक द्वारा सड़क पर ही अवैध कब्ज़ा कर होटल संचालन की तैयारी प्रशासन की नाकामी की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आई है।
गणेश पक्ष के दौरान लगातार 10 दिनों तक यहां श्रद्धालुओं का भारी आवागमन बना रहता है। ऐसे समय और ऐसी संवेदनशील जगह पर सड़क घेरकर कब्ज़ा करना सीधे-सीधे जनता के जीवन, धार्मिक आस्था और शहर की यातायात सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।
लेकिन सवाल उठता है—
क्या यह सब शहर की प्रथम नागरिक को नहीं दिख रहा?
क्या महापौर अलका बाघमार की नजर सिर्फ कुर्सी की सुविधाओं, विशेष चाय और प्रशासकीय दिखावे तक सीमित रह गई है?
धार्मिक आस्था के सामने होटल संचालन का समर्थन?
जहां जनता गणेश मंदिर में आस्था लेकर आती है,वहीं महापौर बाघमार की निष्क्रियता ने ऐसा वातावरण बना दिया है कि प्रभु राम के नाम का उपयोग कर होटल चलाने वाले संचालक अब सड़क को अपनी निजी संपत्ति समझने लगे हैं।
यह स्थिति सिर्फ दुर्ग शहर के नागरिकों का अपमान नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ की साय सरकार और केंद्र की मोदी सरकार की धर्म और आस्था के प्रति गहरे प्रेम की छवि को भी धूमिल करती है। यह वही सरकार है जो “अवैध कब्ज़ों पर जीरो टॉलरेंस” की बात करती है, लेकिन दुर्ग में उसके ही महापौर के रहते सड़क पर कब्ज़ा कर धार्मिक स्थल के सामने धंधा चलना आम बात बन गया है।
भीड़, अराजकता और महापौर की चुप्पी
गणेश मंदिर के सामने प्रतिदिन और विशेष दिनों में बढ़ती भीड़ के बावजूद महापौर बाघमार की ओर से
न कोई कार्रवाई, न चेतावनी, न रोकथाम—कुछ भी नहीं। ऐसा लगता है कि शहर की समस्याएँ उनके प्रशासनिक एजेंडे में कहीं हैं ही नहीं। शहर जाम से भर जाए, श्रद्धालु परेशान हों, सड़क पर अफरातफरी हो—लेकिन महापौर की प्राथमिकताएँ कुछ और ही हैं।
जनता यह सवाल पूछ रही है—
क्या हमने महापौर चुना था या अवैध कब्ज़ों का संरक्षण करने वाली प्रशासकीय ढाल?
क्या महापौर की सक्रियता सिर्फ कर्मचारियों पर दबाव बनाने, छोटी-मोटी दिखावे की बैठकों तक सीमित है?
क्या दुर्ग शहर एक निष्क्रिय नेतृत्व की वजह से अपने सबसे बुरे दौर में प्रवेश कर चुका है?
गणेश मंदिर जैसे धार्मिक स्थल के सामने सड़क पर कब्ज़ा कोई साधारण मामला नहीं है। यह शहर की संस्कृति, श्रद्धा, यातायात सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। और इन सभी मोर्चों पर महापौर अलका बाघमार की पूर्ण असफलता और निष्क्रियता अब जनता के लिए असहनीय होती जा रही है।
नगर निगम की राजनीति में ‘पोस्टर से गायब चेहरा’ बन गया नया संकेत;
शहर की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक छिड़ी बहस — क्या टूट रही है सरकार और निगम की साझी तालमेल की डोर?
दुर्ग। शौर्यपथ।
राजनीति में चेहरे बहुत कुछ कह जाते हैं — खासकर तब, जब किसी आयोजन या उत्सव की तस्वीरों में कोई चेहरा जानबूझकर गायब किया गया हो। ऐसी ही एक तस्वीर ने आज दुर्ग की नगर राजनीति में नए विवाद को जन्म दे दिया है। नगर निगम दुर्ग की महापौर श्रीमती अलका बाघमार ने हाल ही में जीएसटी-2 बी फार्मा उत्सव पर सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर करते हुए एक पोस्ट साझा की। लेकिन इस पोस्ट में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उसमें प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री और दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के विधायक गजेन्द्र यादव की तस्वीर नदारद थी — जबकि उसी पोस्ट में दूसरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों को स्थान मिला।
इस एक ‘गायब चेहरे’ ने अब पूरे शहर में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा यही है कि आखिर महापौर और मंत्री के बीच ठंडी जंग क्यों चल रही है?
? क्या यह दूरी सिर्फ राजनीतिक है या व्यक्तिगत भी?
महापौर अलका बाघमार और मंत्री गजेन्द्र यादव, दोनों ही एक ही दल से आते हैं। इसके बावजूद दोनों के बीच संबंधों में रंजिश और दूरी लंबे समय से सुर्खियों में रही है। जानकारों का कहना है कि नगर निगम के कई विकास कार्यों और बजट अनुमोदन के दौरान भी महापौर ने मंत्री की सिफारिशों को नज़रअंदाज़ किया था।
अब जब महापौर ने सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पोस्ट में मंत्री को दरकिनार कर दिया, तो यह संकेत काफी गहरे हैं — मानो यह कहा जा रहा हो कि “निगम अब अपने बूते चलेगा।”
? क्या विकास की गाड़ी अब पटरी से उतर रही है?
शहर की मौजूदा स्थिति इस राजनीतिक खींचतान की कीमत चुका रही है।
मुख्य मार्गों पर फैला कचरा, सड़कों के गड्ढे, जगह-जगह जलभराव, और स्ट्रीट लाइटों के बंद रहने से नागरिक परेशान हैं।
आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या, निर्माण कार्यों की धीमी रफ्तार और भ्रष्टाचार के आरोपों ने नगर निगम की छवि को इतिहास की सबसे बदहाल स्थिति में पहुँचा दिया है।
दीपावली के ठीक पहले ठेकेदारों को बकाया भुगतान में भी भारी कटौती ने हालात और बिगाड़ दिए। ठेकेदारों को “10–20 प्रतिशत” भुगतान कर संतोष कराने की कोशिश हुई, परंतु बाकी राशि के अभाव में कई काम ठप पड़ गए।
? जनता के मन में सवाल – “क्या अकेले महापौर शहर संभाल लेंगी?”
जनता के बीच यह चर्चा तेज है कि अगर महापौर अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरियां बनाए रखेंगी, तो क्या निगम को प्रदेश सरकार का सहयोग मिल पाएगा?
राज्य सरकार की योजनाओं, निधियों और विकास कार्यों में तालमेल आवश्यक है — और यदि यह तालमेल टूट गया, तो उसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।
? “पोस्टर पॉलिटिक्स” का संदेश क्या है?
राजनीति में कहा जाता है कि पोस्टर से गायब चेहरा, रिश्तों की सच्चाई बयान कर देता है।
महापौर की पोस्ट में मंत्री का नाम या तस्वीर शामिल न करना सिर्फ एक सोशल मीडिया घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। यह संदेश साफ है — दुर्ग नगर निगम की प्रमुख अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान गढ़ने के रास्ते पर हैं।
परंतु सवाल यह भी है कि क्या इस स्वतंत्रता का खामियाजा शहर भुगतेगा?
क्या दुर्ग का विकास अब राजनीतिक अहंकार और व्यक्तिगत टकराव के बीच कुर्बान हो जाएगा?
? निष्कर्ष:
दुर्ग की जनता ने महापौर अलका बाघमार को नगर निगम का नेतृत्व इस उम्मीद से सौंपा था कि वे शहर को विकास की नई दिशा देंगी।
परंतु आज शहर की तस्वीर कुछ और कहती है — सड़कों पर गड्ढे हैं, गलियों में अंधेरा है, और सोशल मीडिया पर ‘गायब चेहरे’ की बहस जारी है।
ऐसे में यह सवाल अब और गहरा हो गया है कि —
> “क्या महापौर अलका बाघमार अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरी बनाकर, दुर्ग के विकास की धारा को आगे बढ़ा पाएंगी?”
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
