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दुर्ग।
मुख्यमंत्री के नाम पर जिस “सुशासन मॉडल” का ढोल पीटा जा रहा है, दुर्ग नगर निगम की हकीकत उस दावे को सरेआम चुनौती दे रही है। नगर निगम दुर्ग के आयुक्त सुमित अग्रवाल पर लगे गंभीर आरोप अब प्रशासनिक गलियारों की फुसफुसाहट नहीं रहे, बल्कि जनता के गुस्से और आक्रोश की खुली आवाज बन चुके हैं। भेदभाव, मनमानी, पद के दुरुपयोग और सत्ता के संरक्षण में चल रहे कथित भ्रष्ट तंत्र ने दुर्ग शहर को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या कानून केवल आम आदमी के लिए है?
हिंदू युवा मंच, दुर्ग के जिला प्रभारी राजा देवांगन के नेतृत्व में सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने जिलाधीश को एक तीखा, तथ्यपूर्ण और सवालों से भरा ज्ञापन सौंपते हुए नगर निगम आयुक्त की भूमिका पर सीधे-सीधे उंगली उठाई। ज्ञापन किसी राजनीतिक बयानबाज़ी का दस्तावेज नहीं, बल्कि उन सबूतों का पुलिंदा है जो यह दर्शाता है कि निगम में सत्ता का दुरुपयोग किस तरह खुलकर किया जा रहा है।
ज्ञापन और सामने आए दस्तावेज बताते हैं कि आयुक्त द्वारा अधीनस्थ कर्मचारियों से निजी कार्य कराए गए, व्यक्तिगत सुविधाओं के लिए दबाव बनाया गया और विरोध करने वालों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। हालात इतने बिगड़े कि एक निगम कर्मचारी को न्याय के लिए माननीय उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा। यह घटना अपने आप में निगम प्रशासन की कार्यसंस्कृति पर करारा तमाचा है।
यह कोई एक मामला नहीं है, बल्कि विवादों की पूरी श्रृंखला है—
अशोक परिहार प्रकरण: शिकायतें आईं, पर जिम्मेदारों पर कार्रवाई शून्य।
लॉलीपॉप विज्ञापन बोर्ड मामला: नियमों की अनदेखी, केवल कागजी खानापूर्ति।
राम रसोई संचालन: नियमों को ताक पर रखकर संचालन।
मंदिर के सामने अवैध राम रसोई शेड: जानकारी होते हुए भी जानबूझकर आंख मूंदना।
इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि निगम में कानून समान नहीं, बल्कि “संपर्क और संरक्षण” देखकर लागू होता है।
हिंदू युवा मंच ने सवाल उठाया है कि जब एक बड़े शहर का शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी ही नियमों को रौंदता दिखाई दे, तो आम नागरिक किससे न्याय की उम्मीद करे? यदि यही सुशासन है, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि पारदर्शिता केवल पोस्टरों और मंचों तक ही क्यों सीमित है?
हिंदू युवा मंच ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष न्यायिक या उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो संगठन सड़क से सदन तक आंदोलन करेगा। इसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।
साथ ही, संगठन ने यह भी मांग की है कि—
की गई कार्रवाई की लिखित जानकारी सार्वजनिक की जाए
आयुक्त को जांच पूर्ण होने तक पद से पृथक किया जाए
निगम में व्याप्त भ्रष्ट तंत्र को ध्वस्त किया जाए
आज दुर्ग की जनता यह नहीं पूछ रही कि आरोप क्यों लगे, बल्कि यह पूछ रही है कि अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या शासन इस चुनौती को स्वीकार करेगा या फिर यह मामला भी बाकी फाइलों की तरह धूल में दबा दिया जाएगा?
यह लड़ाई किसी एक संगठन की नहीं, बल्कि दुर्ग की जनता के सम्मान, अधिकार और सुशासन की साख की है।
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
