July 24, 2026
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    "राम रसोई" विवाद: पूर्व सभापति राजेश यादव के कार्यकाल में हुए भूमि आवंटन पर उठे गंभीर सवाल, मिलीभगत के आरोप

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    दुर्ग। शौर्यपथ। दुर्ग शहर में गरीबों को सस्ते भोजन के नाम पर शुरू हुई “राम रसोई” अब सेवा का केंद्र न रहकर विवादों, अवैध कब्जों और राजनीतिक सांठगांठ का अड्डा बन गई है। ताजा खुलासों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जिसे जनता 'सरकारी योजना' समझ रही थी, वह दरअसल एक अपंजीकृत संस्था का निजी उपक्रम है, जो प्रभु श्री राम के पवित्र नाम की ओट में नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है।

    सरकारी योजना नहीं, निजी 'होटल' का मायाजाल

     “राम रसोई” कोई शासकीय योजना नहीं है। इसे भाजपा नेता चतुर्भुज राठी द्वारा एक ऐसी संस्था के माध्यम से चलाया जा रहा है जिसका कोई वैधानिक पंजीकरण तक नहीं है। नगर निगम अधिनियमों को ठेंगा दिखाते हुए इस अपंजीकृत संस्था को बेशकीमती शासकीय भूमि थमा दी गईं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन ने 'राम' नाम के आगे घुटने टेक दिए थे या फिर फाइलों के नीचे राजनीतिक रसूख की चमक ने अधिकारियों को अंधा कर दिया था?

    सड़क पर कब्जा, आस्था का 'दुरुपयोग'

    प्रभु श्री राम, जो मर्यादा और नियमों के प्रतीक हैं, उनके नाम पर नियमों की बलि चढ़ाई जा रही है। आरोप है कि संचालक चतुर्भुज राठी ने न केवल आवंटित स्थानों पर बल्कि आम सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर भी अवैध कब्जे कर लिए हैं। भक्ति की चादर ओढ़कर किया जा रहा यह कृत्य सीधे तौर पर प्रभु श्री राम के नाम का दुरुपयोग है। क्या सत्ताधारी दल के नेता होने का अर्थ यह है कि आप भक्ति को ढाल बनाकर 'होटल' संस्कृति को 'सेवा' का नाम दे देंगे?

    राजेश यादव और अजय शर्मा: जुगलबंदी के पीछे का खेल

    इस पूरे खेल की स्क्रिप्ट कांग्रेस शासनकाल में ही लिख दी गई थी। तत्कालीन सभापति राजेश यादव के कार्यकाल में बिना किसी ठोस प्रक्रिया या परिषद की विधिवत अनुमति के भूमि का आवंटन संदेह पैदा करता है।

    गवाह बने 'विपक्ष': कांग्रेस नेता अजय शर्मा का इस अनुबंध में गवाह बनना यह साबित करता है कि भ्रष्टाचार और बंदरबांट के मामलों में 'पक्ष' और 'विपक्ष' की दीवारें ढह जाती हैं।

    यह कहना गलत नहीं होगा कि यादव की सहमति और शर्मा की गवाही ने इस अवैध साम्राज्य की नींव रखी।

    भाजपा की छवि पर 'राठी' का प्रहार?

    एक ओर भारतीय जनता पार्टी राम मंदिर और राम राज्य की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं के नेता चतुर्भुज राठी पर अनुबंध उल्लंघन के गंभीर आरोप हैं।

    अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन: दो समय के भोजन के वादे के बावजूद केवल दोपहर में दुकान सजाई जा रही है।

    धार्मिक स्थलों पर अतिक्रमण: मंदिरों और धर्मशालाओं को निजी जागीर की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

    ऐसे कृत्य न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की छवि को भी जनता की नजरों में धूमिल कर रहे हैं।

    मौन विपक्ष और रसूखदार संरक्षण

    हैरत की बात यह है कि नगर निगम में विपक्ष (कांग्रेस) इस मुद्दे पर 'मौन व्रत' धारण किए हुए है। जानकारों का कहना है कि जब पूर्व सरकार के चहेते नेता (अजय शर्मा) खुद गवाह बनकर बैठे हों, तो विरोध की आवाज निकले भी तो कैसे? यह राजनीति, संरक्षण और निजी स्वार्थ का एक ऐसा त्रिकोण बन चुका है जिसमें पिस केवल आम जनता और नियम रहे हैं।

    कटाक्ष: सेवा या सिस्टम का शिकार? > "राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट" वाली कहावत आज दुर्ग की सड़कों पर 'राम रसोई' के रूप में चरितार्थ हो रही है। जब अपंजीकृत संस्थाएं सड़कों पर कब्जा करने लगें और 'राम' के नाम पर नियमों को सूली पर चढ़ाया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि यहाँ 'भोजन' नहीं, बल्कि 'सिस्टम' परोसा जा रहा है।

    निष्कर्ष: अब समय आ गया है कि प्रशासन गहरी नींद से जागे और इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराए। क्या एक अपंजीकृत संस्था को शहर की सड़कों और सार्वजनिक संपत्तियों पर 'राम नाम' का बैनर लगाकर कब्जा करने की छूट दी जा सकती है? दुर्ग की जनता अब 'सेवा' के पीछे छिपे इस 'व्यापार' का सच जानना चाहती है।

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    Last modified on Thursday, 16 April 2026 17:42

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