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April 27, 2026
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विकास की 'प्यास' या बेजुबानों की 'आह'? महापौर अलका और देवनारायण की जिद में सुलगता दुर्ग! Featured

प्रतीकात्मक चित्र प्रतीकात्मक चित्र
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दुर्ग। सूरज आग उगल रहा है, पारा आसमान छू रहा है और दुर्ग शहर दुनिया के सबसे गर्म शहरों की फेहरिस्त में 12वें पायदान पर अपनी बदहाली दर्ज करा रहा है। ऐसे में जब इंसान और बेजुबान जानवर बूंद-बूंद पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, दुर्ग नगर निगम "विकास" का ऐसा चश्मा पहनकर बैठा है जिसे जनता का दर्द और मूक जानवरों की प्यास नजर नहीं आ रही।

देवनारायण की 'डंके की चोट' और खाली होता तालाब

शक्ति नगर वार्ड में इन दिनों एक अजीबोगरीब तमाशा चल रहा है। पीडब्ल्यूडी प्रभारी देवनारायण चंद्राकर अपने वार्ड में 45 लाख रुपये के 'सौंदर्यीकरण' की ऐसी जिद पाले बैठे हैं कि भीषण गर्मी में भी तालाब को खाली कराया जा रहा है। लाखों गैलन पानी बहाया जा रहा है ताकि कंक्रीट का विकास खड़ा हो सके।

 पूर्व में हुई घटना:पिछले साल ब्लीचिंग पाउडर से हजारों मछलियों का दम घोंटने वाली "शहरी सरकार" इस बार बेजुबान जानवरों के हलक सुखाने की तैयारी में है। शायद पार्षद महोदय के लिए 45 लाख के टेंडर की चमक, उन प्यासे जानवरों की आंखों की नमी से ज्यादा कीमती है।

महापौर अलका बाघमार: 'चयनित' विकास और तकनीकी अंधापन

शहर की प्रथम नागरिक, महापौर अलका बाघमार अपनी उपलब्धियों के कसीदे तो पढ़ती हैं, लेकिन उनके 'तकनीकी ज्ञान' पर अब सवाल उठने लगे हैं। दुर्ग शायद दुनिया का इकलौता ऐसा शहर होगा जहाँ पेवर ब्लॉक के नीचे सीमेंट का बेस बनाया जा रहा है। यह तकनीकी रूप से कितना सही है, यह तो इंजीनियर जानें, लेकिन जनता इसे "भ्रष्टाचार की नई परत" कह रही है।

महापौर की अनदेखी के कुछ नमूने:

अधूरे उद्यान: दादा-दादी पार्क के सामने शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव द्वारा शुरू किया गया उद्यान 2 साल बाद भी अपनी बदहाली पर रो रहा है।

अधूरे नाले: वार्ड-43 कसारीडीह में नाले का काम अधूरा छोड़ दिया गया है, जो अब जनता के लिए जी का जंजाल बन चुका है।

गंदगी का साम्राज्य: सुराना कॉलेज के सामने कचरे का अंबार और सड़ांध मारता वातावरण महापौर की 'स्वच्छ दुर्ग' की दावों की पोल खोल रहा है।

आवारा पशु: सड़कों पर आवारा पशुओं की फौज खड़ी है, लेकिन निगम प्रशासन चैन की नींद सो रहा है।

क्या 'पटरी पार' ही पूरा दुर्ग है?

शहर के गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि क्या महापौर के लिए विकास का मतलब सिर्फ 'पटरी पार' का क्षेत्र है? बाकी शहर को क्या गंदगी, बदबू और पानी की किल्लत के हवाले कर दिया गया है? भ्रष्टाचार चाहे बाजार विभाग हो या पीडब्ल्यूडी, अपनी चरम सीमा पर है।

पुरानी गलतियों की ढाल कब तक?

निगम की सत्ता में बैठे लोग अक्सर पुरानी सरकारों की कमियां गिनाकर अपनी खाल बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन हुजूर, याद रखिए कि जनता ने आपको उन्हीं कमियों को दूर करने के लिए चुना था, उन्हें दोहराने या उनसे भी बदतर हालात पैदा करने के लिए नहीं।

निष्कर्ष का कड़वा सच:

विकास जरूरी है, पर क्या वह विकास बेजुबानों की जान और जनता की प्यास की कीमत पर होना चाहिए? दुर्ग शहर में आज 'विकास की वीरांगना' के पोस्टर तो चमक रहे हैं, लेकिन उन पोस्टरों के पीछे छिपी प्यास और तड़प की आवाज सुनने वाला कोई नहीं है। महापौर जी और पीडब्ल्यूडी प्रभारी जी, याद रखिएगा— कंक्रीट के जंगल प्यास नहीं बुझाते!

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