July 24, 2026
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    दुर्ग जिला अस्पताल की बदहाल व्यवस्था पर फूटा जनाक्रोश “इलाज कम, रेफर ज्यादा” के आरोपों के बीच बजरंग दल ने खोला मोर्चा, CMO को सौंपा ज्ञापन Featured

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    मरीजों की पीड़ा, अव्यवस्था और चिकित्सकीय कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल — स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत ने बढ़ाई चिंता

    दुर्ग/शौर्यपथ विशेष।
    दुर्ग जिला अस्पताल, जिसे जिले का सबसे बड़ा शासकीय स्वास्थ्य संस्थान माना जाता है, इन दिनों गंभीर सवालों और जन असंतोष के केंद्र में आ गया है। करोड़ों रुपये की शासकीय योजनाओं, संसाधनों और स्वास्थ्य सुविधाओं के दावों के बीच मरीजों को राहत मिलने के बजाय लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि सामान्य बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी उपचार देने के बजाय “हायर सेंटर रेफर” करना एक सामान्य प्रक्रिया बनती जा रही है।

    सूत्रों और मरीजों से प्राप्त शिकायतों के अनुसार यदि किसी मरीज को आंख, सामान्य सर्जरी अथवा अन्य उपचार की आवश्यकता हो और उसे शुगर या बीपी जैसी सामान्य बीमारी हो, तो कई मामलों में चिकित्सकों द्वारा तत्काल रायपुर रेफर करने की सलाह दी जाती है। जबकि निजी चिकित्सकों का मानना है कि नियंत्रित शुगर और बीपी की स्थिति में ऐसे मरीजों का उपचार जिला स्तर पर संभव है।


    “सिर्फ पर्ची वाले मरीजों का अस्पताल?”

    जनचर्चाओं में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या जिला अस्पताल अब केवल उन्हीं मरीजों के लिए रह गया है जिन्हें बिना जोखिम और जटिलता के आसानी से उपचार दिया जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी उम्मीद लेकर आने वाले मरीज पहले कई प्रकार की जांच, मेडिकल फिटनेस और कागजी प्रक्रिया पूरी करते हैं, लेकिन अंततः उन्हें उपचार के बजाय रेफर कर दिया जाता है। इससे मरीज आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से टूटते नजर आ रहे हैं।


    जच्चा-बच्चा केंद्र पर भी सवाल

    विश्वस्त सूत्रों के अनुसार जिला अस्पताल के जच्चा-बच्चा केंद्र में भी बीपी और शुगर का हवाला देकर गर्भवती महिलाओं को बाहर रेफर किए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई मामलों में वही मरीज बाद में निजी नर्सिंग होम में सफलतापूर्वक उपचार प्राप्त कर लेते हैं। यदि यह स्थिति सही है, तो यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जिम्मेदारी दोनों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।


    अस्पताल परिसर में अव्यवस्था के आरोप

    जिला अस्पताल परिसर की व्यवस्थाओं को लेकर भी कई गंभीर आरोप सामने आए हैं। मरीजों और परिजनों के अनुसार:

    • अस्पताल परिसर में बाहरी एजेंटों की सक्रियता बढ़ी हुई है
    • मरीजों को निजी नर्सिंग होम की ओर मोड़ने की चर्चाएं होती हैं
    • दवाइयों के लिए मरीजों को बाहर भटकना पड़ता है
    • परिसर में अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं
    • समुचित लिफ्ट सुविधा के अभाव में बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और गंभीर मरीज सीढ़ियां चढ़ने को मजबूर हैं

    इन सभी मुद्दों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की निष्क्रियता लोगों की नाराजगी का कारण बन रही है।


    बजरंग दल ने खोला मोर्चा, CMO को सौंपा ज्ञापन

    बुधवार को इन सभी अव्यवस्थाओं और शिकायतों को लेकर बजरंग दल ने जिला अस्पताल परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। संगठन के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. दानी से मुलाकात कर अस्पताल में व्याप्त अनियमितताओं, चिकित्सकीय लापरवाही और मरीजों की समस्याओं को लेकर विस्तृत ज्ञापन सौंपा।

    ज्ञापन में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, दवाइयों की अनुपलब्धता, गर्भवती महिलाओं के प्रवेश समय को लेकर नियमों में बदलाव, अस्पताल में बाहरी एजेंटों की सक्रियता, ऑपरेशन थिएटर की तकनीकी समस्याएं, ओपीडी में दवा वितरण की सीमाएं, दिव्यांग प्रमाणपत्र प्रक्रिया में विलंब और कैंसर वैक्सीनेशन जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए।

    बजरंग दल के जिला संयोजक रतन यादव ने कहा कि जिन मामलों का संबंध राज्य शासन से है, उन्हें विभागीय मंत्री और शासन स्तर तक पहुंचाकर सुधार की मांग की जाएगी। उन्होंने कहा कि जिला अस्पताल की व्यवस्था में व्यापक सुधार और जवाबदेही तय करना अब जनहित का बड़ा मुद्दा बन चुका है।


    स्वास्थ्य अधिकारी ने जांच और कार्रवाई का दिया आश्वासन

    जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. दानी ने संगठन को अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार और अनियमितताओं की जांच कर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है। साथ ही राज्य शासन से जुड़े मुद्दों को उच्च स्तर तक पहुंचाने की बात भी कही गई है।


    सबसे बड़ा सवाल — जवाबदेह कौन?

    दुर्ग जिला अस्पताल की मौजूदा स्थिति अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि जनविश्वास से जुड़ा प्रश्न बनती जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि:

    • क्या जिला अस्पताल उपचार का केंद्र है या केवल रेफरल व्यवस्था का माध्यम?
    • क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जिम्मेदारी से ज्यादा औपचारिकता हावी हो चुकी है?
    • करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मरीजों को भरोसेमंद इलाज क्यों नहीं मिल पा रहा?
    • और क्या अस्पताल प्रशासन एवं जिम्मेदार अधिकारी इस व्यवस्था की नैतिक जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं?

    स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर उठ रहे ये सवाल अब केवल अस्पताल परिसर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पूरे जिले में चर्चा और चिंता का विषय बन चुके हैं।

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