July 24, 2026
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    "श्याम-सुमित संवाद और अलका मौन! क्या दुर्ग निगम की सामान्य सभा में जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़ रहे अधिकारी?" Featured

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    सभापति श्याम शर्मा की जवाबतलबी और आयुक्त सुमित अग्रवाल के जवाबों ने खड़े किए सवाल — क्या महापौर और विभागीय प्रभारियों पर घट रहा है भरोसा?

    दुर्ग। लोकतांत्रिक संस्थाओं की सबसे बड़ी ताकत उनकी परंपराएं और जवाबदेही की व्यवस्था होती है। सदन चाहे लोकसभा का हो, विधानसभा का हो या फिर नगर निगम की सामान्य सभा का, लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही कहता है कि जनता के सवालों का जवाब जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि दें। अधिकारी प्रशासन चलाते हैं, जबकि जवाबदेही निर्वाचित नेतृत्व की होती है।

    लेकिन दुर्ग नगर पालिक निगम की सामान्य सभा में बीते कुछ समय से जो दृश्य दिखाई दे रहे हैं, उन्होंने लोकतांत्रिक परंपराओं को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।

    सामान्य सभा में बार-बार ऐसी स्थिति बन रही है, जहां पार्षद सीधे अधिकारियों से जवाब मांग रहे हैं और उससे भी आगे बढ़कर स्वयं सभापति श्याम शर्मा अधिकारियों से स्पष्टीकरण लेते दिखाई दे रहे हैं। हालिया विशेष सामान्य सभा में निगम आयुक्त आईएएस सुमित अग्रवाल को जवाब देने के लिए आगे लाया गया, जबकि इससे पहले भी स्वास्थ्य अधिकारी और अन्य अधिकारियों से सदन में प्रत्यक्ष जवाबतलबी होती रही है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह स्थिति सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था से अलग दिखाई देती है। परंपरागत रूप से सदन में विभागीय प्रभारी, महापौर अथवा निर्वाचित प्रतिनिधि जवाब देते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अधिकारी तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराते हैं। लेकिन दुर्ग निगम में मानो व्यवस्था उलटती दिखाई दे रही है।

    सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि सदन में अधिकारियों के जवाब को ही अंतिम और विश्वसनीय माना जा रहा है तो फिर विभागीय प्रभारी और महापौर की राजनीतिक जवाबदेही का स्थान कहां रह जाता है?

    विशेष रूप से स्वास्थ्य विभाग को लेकर लगातार उठ रहे विवादों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। वर्ष भर की सामान्य सभाओं में स्वास्थ्य विभाग से जुड़े मामलों ने बार-बार सुर्खियां बटोरी हैं। स्वास्थ्य प्रभारी नीलेश अग्रवाल की कार्यप्रणाली पर विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के पार्षदों द्वारा भी सवाल खड़े किए जाते रहे हैं।

    आलोचकों का कहना है कि यदि हर सामान्य सभा में स्वास्थ्य विभाग ही विवादों का केंद्र बन रहा है तो यह विभागीय नेतृत्व की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। वहीं महापौर अलका बाघमार का इन विवादों पर लगातार मौन रहना भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

    शहर की प्रथम नागरिक होने के नाते महापौर से अपेक्षा की जाती है कि वे विभागीय जवाबदेही सुनिश्चित करें और सदन में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका को मजबूत बनाएं। लेकिन सामान्य सभा में बढ़ती अधिकारी-केंद्रित जवाबदेही को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या निगम प्रशासन पर निर्वाचित नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ रही है या फिर स्वयं जनप्रतिनिधियों का भरोसा अपने ही नेतृत्व पर कम हो रहा है?

    सभापति श्याम शर्मा की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सभापति का प्रमुख दायित्व सदन की गरिमा और प्रक्रियाओं का संरक्षण माना जाता है। ऐसे में अधिकारियों से प्रत्यक्ष जवाबतलबी की बढ़ती परंपरा को कुछ लोग प्रक्रिया की मजबूरी बता रहे हैं तो कुछ इसे सदन की स्थापित मर्यादाओं से विचलन के रूप में देख रहे हैं।

    दिलचस्प बात यह भी है कि विपक्षी कांग्रेस पार्षदों ने भी इस प्रवृत्ति का खुलकर विरोध नहीं किया। जबकि विपक्ष में अनुभवी और कानूनी समझ रखने वाले वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी के बावजूद इस विषय पर स्पष्ट आपत्ति सामने नहीं आई। इससे यह प्रश्न और गहरा हो गया है कि क्या दुर्ग निगम की राजनीति में एक नई परंपरा स्थापित की जा रही है, या फिर लोकतांत्रिक जवाबदेही की मूल भावना धीरे-धीरे प्रशासनिक जवाबदेही के पीछे धकेली जा रही है?

    फिलहाल दुर्ग नगर निगम की सामान्य सभा में उभरा "श्याम-सुमित संवाद मॉडल" शहर की राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सदन में जवाबदेही की बागडोर पुनः निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के हाथों में लौटेगी, या फिर अधिकारियों से प्रत्यक्ष जवाबतलबी की यह नई परंपरा ही दुर्ग निगम की पहचान बन जाएगी।

    (यह लेख उपलब्ध तथ्यों, सदन की कार्यवाही से जुड़े सार्वजनिक विमर्श तथा राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है।)

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