January 26, 2026
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दुर्ग। शौर्यपथ।
दुर्ग शहर का प्रशासन इस समय जिस तरह की निष्क्रियता और अनदेखी का परिचय दे रहा है, वह न केवल जनता के लिए चिंता का विषय है बल्कि शासन की छवि पर भी गहरा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
इंदिरा मार्केट से बस स्टैंड के बीच स्थित प्रसिद्ध गणेश मंदिर के सामने, जहां हर बुधवार को हजारों की भीड़ उमड़ती है, वहां राम रसोई संचालक द्वारा सड़क पर ही अवैध कब्ज़ा कर होटल संचालन की तैयारी प्रशासन की नाकामी की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आई है।
गणेश पक्ष के दौरान लगातार 10 दिनों तक यहां श्रद्धालुओं का भारी आवागमन बना रहता है। ऐसे समय और ऐसी संवेदनशील जगह पर सड़क घेरकर कब्ज़ा करना सीधे-सीधे जनता के जीवन, धार्मिक आस्था और शहर की यातायात सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।

लेकिन सवाल उठता है—
क्या यह सब शहर की प्रथम नागरिक को नहीं दिख रहा?
क्या महापौर अलका बाघमार की नजर सिर्फ कुर्सी की सुविधाओं, विशेष चाय और प्रशासकीय दिखावे तक सीमित रह गई है?

धार्मिक आस्था के सामने होटल संचालन का समर्थन?

जहां जनता गणेश मंदिर में आस्था लेकर आती है,वहीं महापौर बाघमार की निष्क्रियता ने ऐसा वातावरण बना दिया है कि प्रभु राम के नाम का उपयोग कर होटल चलाने वाले संचालक अब सड़क को अपनी निजी संपत्ति समझने लगे हैं।
यह स्थिति सिर्फ दुर्ग शहर के नागरिकों का अपमान नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ की साय सरकार और केंद्र की मोदी सरकार की धर्म और आस्था के प्रति गहरे प्रेम की छवि को भी धूमिल करती है। यह वही सरकार है जो “अवैध कब्ज़ों पर जीरो टॉलरेंस” की बात करती है, लेकिन दुर्ग में उसके ही महापौर के रहते सड़क पर कब्ज़ा कर धार्मिक स्थल के सामने धंधा चलना आम बात बन गया है।

भीड़, अराजकता और महापौर की चुप्पी

गणेश मंदिर के सामने प्रतिदिन और विशेष दिनों में बढ़ती भीड़ के बावजूद महापौर बाघमार की ओर से
न कोई कार्रवाई, न चेतावनी, न रोकथाम—कुछ भी नहीं। ऐसा लगता है कि शहर की समस्याएँ उनके प्रशासनिक एजेंडे में कहीं हैं ही नहीं। शहर जाम से भर जाए, श्रद्धालु परेशान हों, सड़क पर अफरातफरी हो—लेकिन महापौर की प्राथमिकताएँ कुछ और ही हैं।

जनता यह सवाल पूछ रही है—
क्या हमने महापौर चुना था या अवैध कब्ज़ों का संरक्षण करने वाली प्रशासकीय ढाल?
क्या महापौर की सक्रियता सिर्फ कर्मचारियों पर दबाव बनाने, छोटी-मोटी दिखावे की बैठकों तक सीमित है?
क्या दुर्ग शहर एक निष्क्रिय नेतृत्व की वजह से अपने सबसे बुरे दौर में प्रवेश कर चुका है?

गणेश मंदिर जैसे धार्मिक स्थल के सामने सड़क पर कब्ज़ा कोई साधारण मामला नहीं है। यह शहर की संस्कृति, श्रद्धा, यातायात सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। और इन सभी मोर्चों पर महापौर अलका बाघमार की पूर्ण असफलता और निष्क्रियता अब जनता के लिए असहनीय होती जा रही है।

20 अगस्त को तीन नए चेहरों ने ली शपथ, विभाग भी आवंटित — पूर्व CM बोले, कांग्रेस सरकार को नहीं मिली थी अनुमति, अब भाजपा ने कैसे कर लिया विस्तार?

रायपुर। शौर्यपथ ।
   छत्तीसगढ़ की राजनीति एक बार फिर गरमाती दिख रही है। प्रदेश में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मुख्यमंत्री के साथ कुल 14 मंत्रियों की सरकार अब सत्ता संचालन कर रही है। 20 अगस्त को शपथ ग्रहण के साथ ही तीन नए चेहरों – दुर्ग से गजेंद्र यादव, आरंग से गुरु खुशवंत सिंह एवं सरगुजा संभाग से राजेश अग्रवाल – को कैबिनेट मंत्री बनाया गया और देर शाम इन्हें विभाग भी आवंटित कर दिए गए।
लेकिन, इस विस्तार के तुरंत बाद प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “मौजूदा मंत्रिमंडल अवैधानिक है।” बघेल के मुताबिक, कांग्रेस सरकार ने 2018 से ही 14 मंत्री शामिल करने की कोशिशें की थीं और इस विषय को न केवल विधानसभा में उठाया गया बल्कि केंद्र को भी प्रस्ताव भेजा गया था, मगर तत्कालीन केंद्र शासन ने अनुमति नहीं दी।
   अब सवाल यह उठ रहा है कि भाजपा सरकार ने किस आधार पर 14 मंत्रियों का मंत्रिमंडल गठित किया और क्या इसे केंद्र की औपचारिक मंजूरी मिली है?
"हरियाणा मॉडल" की तर्ज पर छत्तीसगढ़
   सूत्र बताते हैं कि राज्य में "हरियाणा मॉडल" अपनाते हुए 14 सदस्यों की कैबिनेट बनाई गई है। लेकिन पूर्व CM के आरोपों ने यह बहस शुरू कर दी है कि क्या इस मॉडल को प्रदेश में लागू करने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया पूरी की गई है, या फिर यह सिर्फ़ राजनीतिक प्रयोग है?
सियासी गर्माहट और आने वाले सवाल
   भूपेश बघेल के बयान के बाद से कांग्रेस हमलावर है और भाजपा को इस पर स्पष्टीकरण देना होगा कि आखिर अब जो संख्या बढ़ाई गई, उसकी संवैधानिक वैधता क्या है। प्रदेश की सियासत में अब चर्चाओं का नया दौर शुरू हो गया है—“क्या राज्य सरकार ने केंद्र की मंजूरी लेकर ही यह कदम उठाया है या फिर यह निर्णय सिर्फ़ राजनीतिक दबाव और दिखावे के तहत लिया गया?”
आगे की राजनीतिक दिशा
  एक तरफ भाजपा सरकार अपने नए मंत्रियों के साथ प्रशासनिक गति पकड़ने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इस “ग़ैरक़ानूनी मंत्रिमंडल” के मुद्दे पर आर-पार की लड़ाई की रणनीति बना रहा है। आने वाले दिनों में इस मसले पर न केवल विधानसभा में तेज़ हलचल देखने को मिलेगी, बल्कि प्रदेश की जनता भी सरकार और विपक्ष दोनों की राजनीतिक चालों पर कड़ी नज़र बनाए रखेगी।
? यह खबर राजनीतिक निहितार्थों से भरपूर है और सीधे तौर पर जनता के विश्वास बनाम संवैधानिक वैधता की बहस खड़ी करती है।

दुर्ग शहर की अव्यवस्था से जनता निराश, अतिक्रमण और गंदगी ने बढ़ाई परेशानी; कैबिनेट मंत्री बने गजेंद्र यादव से विकास की नई गाथा लिखने की आस

दुर्ग / शौर्यपथ / नगरीय निकाय चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी प्रत्याशी श्रीमती अलका बाघमार ने शहरवासियों से अतिक्रमण मुक्त दुर्ग, स्वच्छ और व्यवस्थित बाजार, भ्रष्टाचार पर कड़ी कार्रवाई जैसी कई बड़ी घोषणाएँ की थीं। इन वादों पर भरोसा जताते हुए दुर्ग की जनता ने मतदान के माध्यम से उन्हें महापौर के रूप में चुना। लेकिन महज़ कुछ महीनों के कार्यकाल में ही नगर सरकार की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है।
  शहर के मुख्य मार्गों पर आवारा पशुओं का जमावड़ा, जवाहर नगर से सुराना कॉलेज तक फैली गंदगी और कचरे के ढेर, सड़कों के किनारे अवैध अतिक्रमण, जगह-जगह बुझी पड़ी स्ट्रीट लाइटें और थोड़ी-सी बारिश में ही पूरे शहर का जलभराव जैसी समस्याओं ने जनता को निराश किया है। दो महीने तक चले 'महासफाई अभियानÓ का परिणाम भी कुछ घंटों की बारिश में ही धुल गया।
  इन हालातों ने न केवल महापौर की कार्यशैली पर बल्कि महापौर चयन में निर्णायक भूमिका निभाने वाले दुर्ग लोकसभा सांसद विजय बघेल की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। जनता का मानना है कि जिस प्रत्याशी को उन्होंने सांसद के प्रभाव से चुना, वही अब अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही हैं।
जनता की आवाज़
  व्यापारीयो का कहना है – "बाजार क्षेत्र में हर दिन ट्रैफिक जाम और गंदगी से जूझना पड़ता है। हम उम्मीद कर रहे थे कि महापौर बनने के बाद कुछ सुधार होगा, परंतु हालात जस के तस हैं।"
  स्थानीय निवासियों ने कहा – "महज कुछ घंटों की बारिश में ही पूरा इलाका जलमग्न हो जाता है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। जनता पूछ रही है कि आखिर सफाई और नालों की देखरेख का जिम्मा किसका है?"

सुराना कॉलेज के छात्र बोले – "हमारे कॉलेज के सामने कचरे के ढेर और आवारा मवेशियों की समस्या महीनों से बनी हुई है। प्रशासन और नगर निगम दोनों ही सिर्फ आश्वासन देते हैं।"

अब नजरें टिकी हैं मंत्री गजेंद्र यादव पर
 ऐसे में अब उम्मीद की किरण दिख रही है दुर्ग शहर के विधायक गजेंद्र यादव से, जिन्हें हाल ही में प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। यह संयोग स्वर्गीय हेमचंद यादव के बाद पहली बार आया है जब दुर्ग शहर विधानसभा का कोई विधायक मंत्री पद से सुशोभित हुआ है।
  जनता को विश्वास है कि गजेंद्र यादव के मंत्री बनने से शहर के विकास की नई गाथा लिखी जाएगी। बड़े पद के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है और अब नागरिकों की अपेक्षा है कि मंत्री गजेंद्र यादव गुटबाजी और राजनीतिक खींचतान से ऊपर उठकर दुर्ग के लिए ठोस कार्य करेंगे।

दुर्ग की जनता चाहती है कि—
सड़कों और नालों की तत्काल मरम्मत हो,
अतिक्रमण पर कड़ी कार्रवाई की जाए,
स्वच्छता और प्रकाश व्यवस्था को प्राथमिकता मिले,
और जिला मुख्यालय के रूप में दुर्ग का विकास पूरे प्रदेश में मिसाल बने।
  आज दुर्ग की जनता जिस अव्यवस्था और उपेक्षा से गुजर रही है, उससे निकलने का रास्ता केवल मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवेदनशील नेतृत्व ही दिखा सकता है। ऐसे में शहरवासियों की निगाहें एक बार फिर अपने विधायक और अब मंत्री बने गजेंद्र यादव पर टिकी हैं कि वे दुर्ग की तकदीर बदलने की दिशा में निर्णायक कदम उठाएँ।

?? विश्लेषण बॉक्स

राजनीतिक समीकरण:दुर्ग महापौर चुनाव में विजय बघेल की भूमिका ने भाजपा की स्थानीय राजनीति में हलचल मचाई थी। महापौर पर सवाल खड़े होने से उनकी साख भी प्रभावित हो रही है। गजेंद्र यादव की सक्रियता अब भाजपा के भीतर संतुलन साधने में अहम साबित हो सकती है।

मुख्य चुनौतियाँ:
नगरीय निकाय में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था पर अंकुश लगाना
सफाई व्यवस्था और जलभराव की स्थायी समस्या का समाधान
शहर में अवैध अतिक्रमण और यातायात अव्यवस्था पर सख्त कार्रवाई
जनता की उम्मीदों को जल्द ठोस कामों में बदलना

संभावनाएँ:यदि गजेंद्र यादव अपने मंत्री पद का प्रभाव शहर के विकास में दिखा पाते हैं तो वे न केवल दुर्ग बल्कि प्रदेश स्तर पर भी एक मजबूत नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर सकते हैं। वहीं, यदि अव्यवस्था जस की तस रही तो इसका सीधा राजनीतिक असर आगामी चुनावों पर पड़ सकता है।

कोंडागांव / शौर्यपथ /
कोंडागांव जिला मुख्यालय से महज 7–8 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत ककोडी में स्थित दंतेश्वरी मक्का प्लांट इन दिनों ग्रामीणों के लिए काल साबित हो रहा है। मंगलवार सुबह ग्रामवासियों ने प्लांट परिसर में घुसकर जोरदार प्रदर्शन किया और तत्काल इसे बंद करने की मांग की। मौके पर पहुंची प्रशासनिक टीम ने समझाइश देकर स्थिति को काबू में किया, लेकिन ग्रामीणों का गुस्सा और भय अभी भी बरकरार है।

ग्रामीणों का आरोप है कि जो प्लांट किसानों और पशुपालकों के हित में लगाया गया था, वही अब ज़हर उगल रहा है। वेटकेक सड़ने से दुर्गंध फैल रही है, मवेशियों की मौत हो रही है, पेड़ सूख रहे हैं और खेत बर्बाद हो रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि लोगों का सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों का कहना है—"आज मवेशी मर रहे हैं, कल हमारी बारी होगी।"

आंतरिक सूत्रों के अनुसार, यह स्थिति प्लांट में लगा डायर मशीन बंद होने के कारण बनी है। मजदूरों ने बताया कि डायर चालू होता तो वेटकेक को पशु और पक्षियों के उत्तम आहार में बदल दिया जाता—मुर्गी, मछली, कछुआ और मवेशियों के लिए चारा तैयार होता। लेकिन मशीन के ठप होने से वेटकेक सड़ रहा है, जिससे कीटाणु और जहरीली बदबू फैल रही है।

मामले में कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं—

  • डायर चालू क्यों नहीं किया गया?

  • मक्का से एथनॉल बनाने का दावा कर चावल (कनकी) से उत्पादन क्यों हो रहा है?

  • पानी निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?

  • क्या यह प्लांट प्रदूषण नियंत्रण के मानकों का पालन कर रहा है?

  • ग्रामीणों की जान-माल की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक कदम कब उठेंगे?

ग्रामीणों की मांग है कि जब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक प्लांट को बंद किया जाए। वहीं, प्रशासन ने जांच का भरोसा दिया है, लेकिन अब देखना यह है कि ज़िला प्रशासन इस लापरवाही पर क्या ठोस कार्रवाई करता है, क्योंकि मामला सीधे-सीधे पर्यावरण, पशुधन और मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ा है।

बड़ेकनेरा के स्वास्थ्य केंद्र की एम्बुलेंस जून 2024 से सीएमएचओ दफ्तर में खड़ी, कागजों में फंसी जनसेवा
ग्रामीणों ने विधायक, कलेक्टर से लेकर सीएमएचओ तक लगाई गुहार, लेकिन ‘सुधार’ के नाम पर मिली सिर्फ तारीखें
स्वास्थ्य मंत्री के दावे हकीकत से कोसों दूर, मरीज अब भी खुद का ‘रोगी वाहन’ बनने को मजबूर

    कोंडागांव / शौर्यपथ / एक तरफ प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल बड़े गर्व से कह रहे हैं कि “स्वास्थ्य सुविधाओं में तेजी से सुधार हो रहा है”, वहीं हकीकत यह है कि ग्राम पंचायत बड़ेकनेरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डेढ़ साल से एम्बुलेंस नाम की कोई चीज नहीं है।
   2019-20 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय रूर्बन मिशन योजना के तहत बड़ेकनेरा को मिली एम्बुलेंस जून 2024 में आरटीओ, इंश्योरेंस और सर्विसिंग के नाम पर सीएमएचओ कार्यालय कोंडागांव में जमा कर दी गई। तब से अब तक यह "कागजों की गाड़ी" वहीं अटकी पड़ी है।
   ग्रामीण और पंचायत प्रतिनिधि थक-हारकर कभी विधायक से, कभी सीएमएचओ से और कभी कलेक्टर से गुहार लगाते रहे, लेकिन फाइलें आगे बढ़ने की रफ्तार घोंघे की चाल से भी धीमी रही। आखिरकार बड़ेकनेरा के सरपंच प्रकाश चुरगियां और प्रतिनिधि मंडल ने सीएमएचओ कार्यालय पहुंचकर सीधे पूछा—

अगर आरटीओ, इंश्योरेंस और फिटनेस पूरी है तो एम्बुलेंस क्यों नहीं लौटा रहे?
अगर पूरी नहीं है तो जिम्मेदार कौन है?
और उन पर कार्रवाई कब होगी, जिन्होंने लोगों की जान के साथ खिलवाड़ किया?

  प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं ‘तेजी से सुधार’ के दावे कर रही हैं, लेकिन कोंडागांव में यह ‘तेज रफ्तार’ इतनी धीमी हो गई कि डेढ़ साल में भी एक एम्बुलेंस बड़ेकनेरा वापस नहीं पहुंच पाई।
अब सवाल सीधा है—क्या यह स्वास्थ्य विभाग का सुधार है या लोगों की जान को भगवान भरोसे छोड़ देने की नई सरकारी नीति?
"लगता है स्वास्थ्य विभाग के लिए एम्बुलेंस भी ‘आपातकालीन’ नहीं, बस एक लंबी दूरी की सरकारी कहानी है—जिसका गंतव्य कभी आता ही नहीं!"

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