August 01, 2026
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    चीन की सेवा में हुए कुर्बान

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    नजरिया /शौर्यपथ / भारत भावुक इंसानों से भरा हुआ है। किसी का दुख-दर्द मन को जरा-सा छू जाए, तो नमी अंदर से उमड़ती है और आंखों से छलक आती है। कोई अचरज नहीं कि चीर-फाड़ और कड़वी दवाओं की पढ़ाई करके नया-नया निकला वह डॉक्टर अंदर से सिसक रहा था। हाथों में कुछ कागज थे, जिन पर ऐसे शब्द नुमाया थे, जो एक समाजसेवी के बलिदान की कहानी बखान रहे थे। कुछ देर ही कागज पर निगाह टिकती और फिर भावुकता कागजों से परे बहा ले जाती। कुछ संभलकर कागज पर लौटना होता और फिर शब्द भावनाओं का ज्वार उठा देते थे। मन सवाल करता कि ऐसे भी कोई करता है क्या? अपना देश यहां है और कहां दूर जाकर सेवा में लगे हैं? सेवा भी ऐसी कि दिन-रात रोम-रोम रमा हुआ है। विधि का विधान देखिए, करीब 600 कुष्ठ रोगियों की सेवा करते-करते खुद में भी रोग लग गया है। अरे पगले सेवक, अब तो छुट्टी ले, बहुत हुई सेवा। अब तो तुझे खुद रोग लग आया है, अब तू खुद बचे, न बचे? लौट जा अपने देश बेल्जियम, हवाई में कौन तेरा है? पर डेमियन नाम का वह सेवक सेवा का मोर्चा नहीं छोड़ता। सेवा से ऐसी श्रद्धा है कि हिम्मत कभी जवाब नहीं देती। तकलीफ बढ़ती है, तो सेवा की हिम्मत भी अगले पायदान चढ़ जाती है। वह बेमिसाल सेवक रोग से गलने-गलने तक दूसरों की सेवा करता है और फिर एक दिन थककर बिस्तर पर जा लेटता है हमेशा के लिए। उस दिन इंसानियत मुल्कों की सरहदों को ढहाकर जमीं से आसमां तक गूंज उठती है कि सब देख लो, ऐसा होता है इंसान।
    ऐसी अनुपम सेवा कथा से गुजरते हुए ही डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस ने यह निश्चय किया था कि दुनिया में उन्हें भी कहीं मिले सेवा का मौका, तो कुछ कर गुजरें। वाकई, खूब चाहने से ही राह निकलती है। उन्हीं दिनों चीनी क्रांतिकारियों के कॉमरेड सैन्य जनरल झो दे की चिट्ठी आई थी, पंडित नेहरू के पास कांग्रेस और भारत के नाम। जापानी हमले का जवाब देते चीनी क्रांतिकारियों ने मदद की गुहार लगाई थी। तब अपना देश आजाद नहीं हुआ था। उस चिट्ठी में गुहार के चंद लफ्ज चीन के भावी पितामह माओ ने भी जोडे़ थे। उन्होंने लिखा था, ‘हमारी मुक्ति, भारतीयों और चीनियों की मुक्ति, सभी दलितों और उत्पीड़ितों की मुक्ति का संकेत होगी’। गुहार थी कि भेज सको, तो डॉक्टर भेजो, बड़ी संख्या में हम मारे जा रहे हैं। पंडित नेहरू से लेकर नेताजी बोस तक सभी कांग्रेसी नेता भावुक हो उठे थे। जगह-जगह अपील प्रसारित की गई। कौन डॉक्टर चीन सेवा के लिए जाना चाहता है?
    अच्छा मौका डॉक्टर कोटनिस के हाथ लग गया। बहुत खुश हुए कि इंसानियत और अपनी योग्यता साबित करने का सुनहरा मौका आया है। भारत और भारतीयों की सेवा भावना को परदेशी जमीन पर साकार करना है। यही देश की परंपरा है, इंसान से इंसान का भाईचारा बढ़ाना है। पिता शांताराम कोटनिस तो बेटे के लिए दवाखाना खोलने की तैयारी में थे, लेकिन बेटे ने पत्र लिख भेजा कि चीन जाऊंगा, मंजूरी दीजिए। पिता कुछ निराश हुए, पर खुश भी थे कि बेटा देश की पुकार पर जा रहा है। उसके चर्चे होंगे, जय-जयकार होगी और फिर वह कोई हमेशा के लिए थोड़ी न जा रहा है, एक-दो साल में लौट आएगा। सेवा का स्वप्न लिए कोटनिस 2 सितंबर, 1938 को भारत से चीन के लिए जहाज से रवाना हुए। उनके साथ अन्य चार डॉक्टर भी थे- एम अटल, एम चोलकर, डी मुखर्जी और बी के बासु। डॉक्टरों में सबसे युवा 28 वर्ष के कोटनिस ही थे। चीन पहुंचने पर दिग्गज नेताओं, माओ और एन लाई ने भी बहुत सम्मान से इस्तकबाल किया। कोटनिस वहां सेवा में ठीक वैसे ही डूब गए, जैसे हवाई में डेमियन डूबे थे। वह चीनी जवानों की ऐसी ममता के साथ सेवा करते थे कि चीनी उन्हें लाड़ में ‘ब्लैक मदर’ कहते थे।
    चीन की मुक्ति और नए वाम राष्ट्र के निर्माण के लिए भयानक लड़ाई चल रही थी। किसी दिन तो 800 के करीब घायल इलाज के लिए आ जाते थे। दो-दो, तीन-तीन दिन तक जगते हुए लगातार ऑपरेशन करने पड़ते थे। असह्य दबाव पड़ा, पर सेवा जारी रही। मिरगी के दौरे पड़ने लगे और 9 दिसंबर, 1942 को कोटनिस दुनिया से चले गए। महज 32 के थे। साथ आए डॉक्टर एक-एक कर स्वदेश लौटे, लेकिन कोटनिस न लौट सके, जैसे डेमियन भी नहीं लौट सके थे।
    अपने पीछे चीनी पत्नी और पुत्र यिनहुआ (अर्थात भारत-चाइना) के साथ ही वह सेवा की ऐसी विरासत छोड़ गए कि चीन चाहकर भी उन्हें अर्थात अपने के दिहुआ को नहीं भुला सकता। डॉक्टर कोटनिस को विदा करते हुए चीन के पितामह माओ ने कहा था, ‘सेना ने एक मददगार हाथ खो दिया है; राष्ट्र ने एक दोस्त खो दिया है। आइए, हम हमेशा उनकी अंतरराष्ट्रीय भावना को ध्यान में रखें’।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय द्वारकानाथ शांताराम कोटनिस विश्व प्रसिद्ध चिकित्सक

     

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