July 24, 2026
Hindi Hindi

Login to your account

Username *
Password *
Remember Me

    बड़ी ताकतों से संतुलन साधने के निहितार्थ

    • rounak group

    नजरिया / शौर्यपथ / भारत और चीन के बीच 15 जून की झड़प ने आखिरकार हिमालयी सीमा पर शांति के चार दशक के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। चीन द्वारा हड़पी गई जमीन को खाली कराने से लेकर शीत युद्ध के आह्वान तक प्रतिक्रियाएं तीखी रही हैं। साल 1950 से न सही, इधर दो दशकों से चीन की बढ़त की चर्चा चल रही है। भारत-चीन संबंधों ने बहुत कुछ देखा है, जुड़ाव से लेकर वर्ष 1959 के नाटकीय अलगाव तक। 1962 में एक छोटा, पर घातक युद्ध हुआ और उसके बाद के दशकों में न युद्ध-न शांति की स्थिति रही। आखिरकार 1988 में दोनों देशों को कूटनीतिक सफलता मिली और संबंधों में एक सलीका बना, जिसके तहत सीमा विवादों को सुलझाए बिना आगे बढ़ने की राह बनी। मूल आधार यह था कि शांतिपूर्ण दायरे में संबंधों में विकास की रफ्तार रहेगी, मगर 15 जून की झड़प से दोनों देशों के बीच रही सहमति पर चोट पड़ी है।
    स्पष्ट है, रिश्ते का अगला चरण एक शांतिपूर्ण सीमा पर निर्भर है, मगर इसका अर्थ सिर्फ यथास्थिति की बहाली नहीं होनी चाहिए। यदि यथास्थिति से हमारा आशय दो परमाणु संपन्न बड़े देशों से है, जो फिर से आक्रामक कवायद शुरू कर रहे हैं, तो यह स्थिति ज्यादा नहीं टिकने वाली। अब समीक्षा और एक नए संघर्ष-प्रबंधन ढांचे को लागू करने का समय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस विवाद को क्यों नहीं सुलझा सकते? चीनी विद्वान यूं सन ने समाधान में बाधा डालने वाली प्रमुख समस्या का एक सारांश पेश किया, ‘चीन के साथ सीमा समाधान में भारत जो रियायतें चाहता है, वे कठोर प्रतिबद्धताएं हैं, जिन्हें बाद में पलटा नहीं जा सकता। इसके विपरीत, चीन अमेरिका-चीनी रणनीतिक प्रतिस्पद्र्धा में भारत की तटस्थता चाहता है, जो अल्पकालिक और आसानी से समायोज्य है।’
    रणनीतिक इरादों में अनिश्चितता की इस समस्या का निकट भविष्य में कोई कारगर समाधान नहीं है। हालांकि नए मानदंडों के जरिए सीमा स्थिर करना दोनों देशों के हित में संभव है। सबसे विवादास्पद है सीमा पर अनेक स्थानों पर बफर जोन में रचनात्मक दृष्टि रखना और हिंसक झड़पों से बचने के लिए समन्वय के साथ गश्ती की व्यवस्था करना। नई व्यवस्था बनाने के लिए यह जरूरी है। उत्साह या बड़बोलेपन में कई लोगों ने भारत-चीन संबंधों के टूटने की घोषणा तक कर दी। हमें ऐसे अतिरेक या आक्रामकता से बचना है। दोनों देशों के बीच रिश्ते कोई अचानक मुश्किल में नहीं पड़े हैं, इसके संकेत कुछ समय से स्पष्ट मिल रहे थे।
    वास्तव में, हमारी चीन नीति असम्मत रही है। बेल्ट रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से नौसेना सुरक्षा और 5-जी की उच्च तकनीक तक, दिल्ली अपनी बयानबाजी व कार्यों में मुखर रही है। यहां तक कि भू-राजनीतिक क्षेत्र में अमेरिका को जोड़ने में भी भारत नाकाम ही हुआ है। एशिया में भी दिल्ली चीन के पड़ोसियों को भविष्य की बाधा के रूप में आंकती रही है। पारंपरिक सहयोगी रूस के साथ भी हाल के वर्षों में सरकार की नीति पुरानी भू-रणनीति की याद दिलाती है। हमारे नीति-निर्माताओं की इस बात के लिए आलोचना की जा सकती है कि वे विश्वसनीय रणनीति के बिना ही चीन के संदर्भ में प्रतिस्पद्र्धात्मक कदम उठाते रहे। नई दिल्ली की असली नाकामी यह है कि व्यापक विदेश नीति के ढांचे में उसकी नीतिगत कथनी और करनी मेल नहीं खा रही हैं। चीन के साथ निरंतर जुड़ाव बहुध्रुवीय दुनिया में अग्रणी शक्ति के रूप में उभरने की एक भव्य रणनीति का हिस्सा था। इसकी बजाय, दिल्ली ने खुद को खाली खजाने व अप्रत्याशित साझीदारों के साथ चीन के खिलाफ कर लिया है। इतिहास बताता है, जब बड़ी ताकतों के साथ भारत के सकारात्मक व सशक्त संबंध थे, तब उसे चीन गंभीरता से लेता था। इतिहास यह भी दर्शाता है कि भारत के लिए शक्ति का संतुलन किस हद तक फायदेमंद हो सकता है।
    भारत-अमेरिका और भारत-सोवियत (रूस) संबंधों ने भारत-चीन संबंधों को स्थिर रखने का काम किया और तभी भारत अपने हितों को पहचानने व आगे बढ़ाने में मजबूती से बना रहा। ऐसा तभी हुआ, जब स्थितियां भारत के अनुकूल थीं और वह चीन के साथ परस्पर लाभप्रद संबंधों को आकार देने में सक्षम था। तभी अंतरराष्ट्रीय माहौल का चतुराई से लाभ उठाने और एक परिष्कृत चीन नीति बनाए रखने में भी भारत ज्यादा सक्षम था।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) जोरावर दौलत सिंह, फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, दिल्ली

     

    Rate this item
    (0 votes)

    Leave a comment

    Make sure you enter all the required information, indicated by an asterisk (*). HTML code is not allowed.

    हमारा शौर्य

    हमारे बारे मे

    whatsapp-image-2020-06-03-at-11.08.16-pm.jpeg
     
    CHIEF EDITOR -  SHARAD PANSARI
    CONTECT NO.  -  8962936808
    EMAIL ID         -  shouryapath12@gmail.com
    Address           -  SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
    LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
    © 2015 Shouryapath. All Rights Reserved. Designed By Global Vision