July 23, 2026
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    दिल्ली की चिंता

    • rounak group

    सम्पादकीय / शौर्यपथ / देश के जिस चमकदार हिस्से को आदर्श बनकर चमकना था, वहां कोरोना संक्रमण का सबसे ज्यादा फैल जाना दुखद और चिंताजनक है। किसी भी देश की राजधानी में आबादी ज्यादा होती है, लेकिन इसके बावजूद उसे खुद को तमाम कमियों से बचना-बचाना पड़ता है, ताकि उस पर विश्वास कायम रहे। राजनीति से परे भी राजधानी का अपना महत्व है और यह महत्व वहां मौजूद सुविधाओं-संसाधनों की वजह से ही आकार लेता है। यह दुखद तथ्य है कि दिल्ली ने कोरोना के मामलों में उस मुंबई को पछाड़ दिया है, जो विगत लगभग दो महीने से सबसे आगे चल रही थी। मुंबई में जहां रोज आ रहे मामलों की संख्या में भारी कमी आई है, वहीं दिल्ली में एक दिन में 3,788 मामलों का सामने आना चिंता को बहुत बढ़ा देता है। यह दिल्ली के लिए पहले से कहीं ज्यादा ईमानदारी और मुस्तैदी से सोचने-करने का वक्त है। आने वाले दिनों में कई देशों से हवाई उड़ानें शुरू हो जाएंगी और एक राजधानी के रूप में दिल्ली की जो व्यापक जिम्मेदारियां हैं, उनसे बचना नामुमकिन है। कोरोना की चेन तोड़ने के लिए सरकार को युद्ध स्तर पर प्रयास करने चाहिए। अर्थव्यवस्था के लिए लॉकडाउन खुलना जरूरी है, पर ऐसा न हो कि संक्रमण इतनी तेजी से फैले कि अनलॉक होने का नुकसान ज्यादा और फायदे कम हो जाएं। उधर, लॉकडाउन खोलने के बाद महानगर चेन्नई की भी हालत खराब हो गई थी, तो वहां फिर 12 दिन का संपूर्ण लॉकडाउन लगाना पड़ा है। कोलकाता में भी राहत नहीं है, पश्चिम बंगाल सरकार ने लॉकडाउन को 31 जुलाई तक के लिए बढ़ा दिया है। दिल्ली में अभी लॉकडाउन का इरादा किसी नेता ने नहीं जताया है, पर संक्रमण को नहीं संभाला गया, तो कोरोना व लॉकडाउन की राजनीति शुरू करने का इंतजार करने वाले भी कम नहीं होंगे। राजनीति का अपना मिजाज है, जिसमें एक दोषी या आरोपी खोजा जाता है, लेकिन कोरोना के समय ऐसा कोई प्रयास करने की बजाय सकारात्मक ढंग से सोचना चाहिए।
    अव्वल तो दिल्ली में परस्पर समन्वय बढ़ाना सबसे जरूरी है। निर्णायक नेताओं को रोष, राजनीति छोड़कर फैसले लेने होंगे। जनता देख रही है कि कौन क्या कर रहा है। अत: नेताओं को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी का एहसास गहराई से होना चाहिए। मरीज घर में रहे या अस्पताल आए, जैसे विषय पर विवाद का समय नहीं है। बहुत से लोग होंगे, जिनके घर में जगह या सुविधाएं नहीं होंगी, तो उनका अस्पताल आना विवशता है। अत: दोनों ही तरह कर सुविधाओं के साथ सरकार को चलना होगा। यह मरीजों के अनुकूल राह निकालने का समय है।
    बहरहाल, दिल्ली सरकार ने घर-घर जांच का जो बीड़ा उठाया है, वह सराहनीय है। 15,000 से ज्यादा टीमें बन रही हैं, जिनमें 55 हजार से ज्यादा चिकित्सा सेवक शामिल होंगे, जो 34 लाख से अधिक घरों में जाकर लोगों की जांच करेंगे। ऐसे बड़े अभियान के समय लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वे स्वयं आगे बढ़कर जांच कराएं। संभव है, घर-घर जांच से कोरोना के मामलों की संख्या बढ़ जाए, पर तब भी 6 जुलाई तक स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और उसके बाद की रणनीतियों के साथ भी दिल्ली को तैयार रहना चाहिए। इस तैयारी की बुनियाद निर्णायकों के परस्पर समन्वय पर निर्भर है और जो थोड़े-बहुत मतभेद रह भी जाएं, तो उनका असर जांच या चिकित्सा टीमों पर नहीं पड़ना चाहिए।

     

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