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मेलबॉक्स / शौर्यपथ / आज की युवा पीढ़ी काफी ऊर्जावान है। वह न केवल सपने देखती है, बल्कि उनको पूरा करने का हौसला भी रखती है। मगर दुख की बात यह है कि वह बहुत जल्दी विफलताओं के आगे घुटने टेक देती है और अपना जीवन खत्म कर लेती है। नौजवानों को समझना चाहिए कि विफलता तो सफलता की पहली सीढ़ी है। जीवन रहेगा, तो उन्नति के अवसर भी मिलेंगे। जिस प्रकार चलते-चलते थकने पर हम विश्राम कर लेते हैं और फिर नई ऊर्जा के साथ चलना आरंभ करते हैं, उसी प्रकार असफलता भी इंसान के जीवन का विश्राम है, अंत नहीं। आज के महानायक ने भी लगातार अपनी ग्यारह फिल्मों की असफल वैतरणी को पार किया है। बस, हमें खुद पर विश्वास रखकर सब्र और धैर्य के साथ बुरे वक्त के गुजरने का इंतजार करना चाहिए। सामने आई मुश्किलों का हंसकर स्वागत करना ही जीवन है।
विभा गुप्ता, बेंगलुरु
रोकना होगा विस्तार
वैश्विक स्तर पर आज चीन जिस गति से विस्तार कर रहा है, उससे दुनिया परेशान है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, जापान, अमेरिका जैसे देश अब गंभीरता से उसकी नीतियों के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में चीन ने जो दबदबा हासिल कर लिया है, वह अन्य देशों की संप्रभुता और निजता के लिए खतरा बनकर उभरा है। आज कई देशों के बाजार पर चीन का कब्जा है। चिंता की बात यह भी है कि कई देशों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चीन पर निर्भर हो गई है। ऐसे में, चीन की चुनौतियों का मिलकर मुकाबला करना होगा। समय रहते अगर उसकी चाल पर लगाम नहीं लगाई गई, तो दुनिया गहरे संकट में फंस सकती है।
रोहित गुप्ता, मयूर विहार, दिल्ली
घरेलू कामगारों का दर्द
बेशक हम अनलॉक-2 में अब प्रवेश कर चुके हैं। रोज कमाने-खाने वाले लोगों की जिंदगी पटरी पर आने लगी है। ज्यादातर मजदूर अपने कामों पर लौट चुके हैं। मगर अब भी कुछ वर्ग ऐसे हैं, जिनकी मुसीबतें कम नहीं हुई हैं। जैसे, घरों में काम करने वाले कामगार। इन्हें अब भी लोग बुलाने से हिचक रहे हैं। लोगों में अब भी उनको लेकर डर पसरा हुआ है। इसलिए घरेलू कामगार काफी तंगी से जूझ रहे हैं। जहां वे पहले औसतन चार-पांच घरों में काम करके गुजारा कर लिया करते थे, आज उन्हें दोनों वक्त का खाना भी बमुश्किल नसीब हो पा रहा है। लोगों को सतर्कता और सावधानी बरतते हुए इन लोगों को भी काम पर बुला लेना चाहिए। कोरोना से बचना आवश्यक है, पर कोई जान-बूझकर यह बीमारी नहीं फैलाता।
अंकिता प्रकाश, रुड़की
अपनी-अपनी राजनीति
प्रधानमंत्री के संबोधन से अपेक्षा थी कि वह कोरोना के कारण आए संकट और सीमा पर बढ़ते तनाव से निपटने में सरकार के प्रयासों की जानकारियां साझा करेंगे, परंतु उनका पूरा भाषण पीएम गरीब कल्याण योजना नवंबर तक बढ़ाने और जन-धन खातों में नकदी जमा कराने तक सीमित रहा। दूसरी ओर, राहुल गांधी कह रहे हैं कि सरकार के पास धन की कोई कमी नहीं है, गरीबों को कमाने की जरूरत नहीं होगी, यदि उनके खाते में प्रतिमाह 7.5 हजार रुपये जमा कराए जाएं। मगर जहां-जहां कांग्रेस सत्ता में है, वहां भी राहुल ऐसी योजना शायद ही लागू करा पाए हैं। हालांकि इसमें यह सवाल शेष रह गया कि शेष 30 करोड़ राशनकार्ड विहीन लोगों और ईमानदार करदाताओं ने आखिर कौन सा गुनाह किया है कि उन्हें इस तरह के लाभों से वंचित कर दिया गया है? यदि सरकारों के पास पैसे हैं, तो आधारभूत ढांचे के निर्माण, राष्ट्र के सशक्तीकरण, विकास-कार्य आदि तेज गति से चलाए जाने चाहिए। क्या यह वक्त नीतियों को बदलने का नहीं है?
राधेश्याम ताम्बटकर, इंदौर, मध्य प्रदेश
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
