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शौर्यपथ / उनके सामने दो विकल्प थे- किसी पुरअम्न मुल्क में एक खुशहाल जिंदगी और दूसरा, अपने गरीब व नाकाम देश (सोमालिया) में लौटकर खौफ व दुश्वारियों के बीच जीना। डॉक्टर हौवा अब्दी ने अपने वतन से वफा का रास्ता चुना। और बड़ी बात यह कि उन्हें अपने इस फैसले पर कभी अफसोस नहीं हुआ। तब भी नहीं, जब एक आतंकी समूह के सैकड़ों गुर्गों ने उनके अस्पताल पर हमला कर दिया था।
सन 1947 में मोगादिशु के एक खाते-पीते परिवार में हौवा पैदा हुईं। पिता खुद शिक्षित थे, इसलिए उन्होंने अपनी बेटियों को स्कूल भेजने में कभी कोताही नहीं की। मगर जब हौवा 12 साल की थीं, प्रसव के दौरान उनकी मां की मौत हो गई। वेदना से छटपटाती मां का चेहरा हौवा के भीतर जैसे नक्श हो गया। काश! उनकी मां को कोई डॉक्टर बचा लेता।
महज 12 साल की हौवा पर अचानक चार छोटी बहनों की देखरेख की जिम्मेदारी आ पड़ी। दादी थीं, मगर उम्रदराज होने के कारण जल्दी ही थक जाती थीं। ऐसे में, हौवा ने सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए खुद से एक वादा किया कि वह पढ़-लिखकर डॉक्टर ही बनेंगी, ताकि किसी की मां को यूं मरने से बचा सकें। पढ़ने में तो वह शुरू से ही जहीन थीं, अब उसके साथ एक बड़ा मकसद आ जुड़ा था।
सन 1964 की बात है। हौवा तब 17 साल की थीं। हायर सेकेंडरी की तालीम मुकम्मल हो रही थी और यहीं से उन्हें अपने सपने की तरफ मुुड़ना था। संयोग से उसी वक्त उन्हें तत्कालीन सोवियत संघ का वजीफा मिल गया और वह मास्को पहुंच गईं। और फिर वहां से कीव। कीव अब यूके्रन की राजधानी है। वहां पर मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात अदन मोहम्मद से हुई। अदन भी सोमाली थे। वहीं पढ़ रहे थे। दोनों ने 1973 में शादी कर ली।
कीव से स्नातक और स्त्री रोग में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद हौवा वापस अपने मुल्क लौट आईं और यहां सरकारी अस्पतालों में उन्होंने काम करना शुरू कर दिया। इस दौरान वह दो बेटी और एक बेटे की मां बन चुकी थीं। जिंदगी ठीक गुजर रही थी, मगर देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हालत देख हौवा बहुत दुखी रहती थीं। सोमालिया में अस्पताल बहुत कम थे और मरीज ज्यादा। गरीबी, भूख, कुपोषण ने तो जैसे इस भूखंड से गहरी नातेदारी पाल ली है। खैर, जब भी किसी महिला के प्रसव के दौरान मरने की खबर सुनतीं, तो हौवा बेचैन हो उठतीं। लगता, जैसे मां तड़प रही हैं।
लिहाजा 1983 में उन्होंने अपनी पैतृक जमीन पर एक कमरे का क्लिनिक शुरू किया। सोमालिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ने खुद उन्हें इसकी इजाजत दी थी। हौवा अब आसपास की खानाबदोश, कबाइली औरतों को प्रेरित करने लगीं कि वे उनके पास सुरक्षित प्रसव के लिए आएं। मुफ्त, किफायती इलाज और काबिलियत ने हौवा को दूर-दूर तक मशहूर कर दिया। मगर 1991 में सोमालिया गृह युद्ध की चपेट में आ गया। इसके बावजूद हौवा मानव सेवा से नहीं डिगीं। 5 मई, 2010 की सुबह लगभग 750 लड़ाकों ने हौवा अब्दी अस्पताल पर धावा बोल दिया। हौवा कुछ समझ पातीं, उसके पहले ही उनकी कनपटी से बंदूक सटाकर एक आतंकी गरज उठा- ‘तुम क्यों अस्पताल चला रही हो? अव्वल तो तुम औरत हो, और फिर बूढ़ी भी। इसे फौरन बंद करो।’
हौवा ने गौर किया, किशोरवय के ये गुर्गे उस समूह के थे, जो हाथ काट डालने और व्यभिचार के आरोपियों को पत्थर मार-मारकर मौत के घाट उतार देने के लिए कुख्यात है। फिर भी उन्होंने पूरे साहस के साथ कहा, ‘मैं अपना अस्पताल नहीं छोड़ूंगी। अगर मरूंगी भी, तो अपनों के बीच और पूरी गरिमा के साथ।’ आतंकियों ने कई दिनों तक अस्पताल को अपने कब्जे में रखा। इस बीच कई बच्चे इलाज के अभाव में मर गए। फिर तो आस-पास की सैकड़ों औरतें हौवा के समर्थन में अस्पताल के इर्द-गिर्द जमा हो गईं। बढ़ते जन-आक्रोश और वैश्विक दबाव के आगे आतंकियों को झुकना पड़ा। वे न सिर्फ अस्पताल छोड़कर भागने को बाध्य हुए, बल्कि उन्होंने डॉक्टर हौवा से लिखित में माफी भी मांगी।
सन् 1983 में एक कमरे से शुरू हुए हौवा अब्दी अस्पताल में आज चार सौ बेड और तीन-तीन ऑपरेशन थिएटर हैं, उनकी दोनों बेटियां भी डॉक्टर बन चुकी हैं और हाथ बंटाती हैं। आधा दर्जन से अधिक डॉक्टरों और चालीस से अधिक नर्सों के साथ यह अस्पताल हजारों लोगों की खिदमत कर रहा है। इसके साथ ही गृह युद्ध में यतीम हुए बच्चों व बेवा औरतों के लिए भी हौवा ने पनाहगाह और स्कूल शुरू किए हैं। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह अब तक करीब 90 हजार सोमाली लोगों की जिंदगी में उम्मीद की किरण लेकर आई हैं। इसके लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है।
एक सफल या सार्थक जिंदगी में से हौवा ने अपने लिए सार्थक जीवन चुना है। और उनके इस फैसले पर पूरी मानवता को फख्र होगा। सोमाली लोगों की ‘मामा हौवा’को काफी सारे लोग सोमालिया की मदर टेरेसा भी कहते हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह हौवा अब्दी, डॉक्टर व मानवाधिकारवादी
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
