July 24, 2026
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    सुधार के लिए खर्च करे सरकार

    • rounak group

    ओपिनियन / शौर्यपथ /खबर अमेरिका से आई है। मगर चिंता पूरी दुनिया की है। कोरोना का हाल सुधरते-सुधरते अचानक बिगड़ता नजर आया। अनिश्चितता बढ़ रही है कि यह बीमारी काबू में आती दिखे, तब भी चैन से नहीं बैठा जा सकता। इसी तरह, अमेरिका में बेरोजगारी भत्ता मांगने वालों की गिनती भी पिछले हफ्ते अचानक तेजी से उछली है। जुलाई के पहले हफ्ते में करीब 3.20 करोड़ अमेरिकियों ने यह भत्ता लिया है। कोरोना की वजह से हरेक बेरोजगार के खाते में 600 डॉलर अलग से पहुंचते हैं। सरकार पर दबाव बन रहा है कि कोरोना थम नहीं रहा है और इस मदद की मीयाद भी बढ़ाई जाए। इधर, 18 जुलाई को जो हफ्ता खत्म हुआ, उसमें करीब 14 लाख नए लोगों ने बेरोजगारी भत्ते की अर्जी लगाई है। यह पिछले हफ्ते से करीब एक लाख नौ हजार ज्यादा है। ऐसी बढ़त पिछले चार महीने में पहली बार हुई है। इससे यह आशंका मजबूत हो रही है कि रोजगार के मोर्चे पर अमेरिका में हालत खराब है।
    इसके उलट भारतीय रोजगार बाजार में धीरे-धीरे सुधार दिख रहा है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार, शहरी इलाकों में रोजगार का आंकड़ा अप्रैल के 26 प्रतिशत से बढ़ते-बढ़ते जुलाई में करीब 38 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। शहरी इलाकों में लोगों के काम पर लौटने की रफ्तार तेज है और इसमें ज्यादातर वे लोग हैं, जो मध्यमवर्गीय घरों में जरूरी काम करते हैं। जैसे बाई, रसोइए, ड्राइवर या सफाईकर्मी। इस तरह के लोग ही सबसे तेजी से काम पर लौटे हैं और इसका नतीजा है कि मध्यवर्ग के लिए अब लॉकडाउन शायद उतना कष्टकारी नहीं रह गया है।
    हालांकि सीएमआईई के ही एक सर्वे में पता चला है कि लोगों के बजट टाइट हो रहे हैं। खासकर अप्रैल से जून के बीच बहुत से परिवारों की कमाई पर भारी असर पड़ा है। जहां पिछले साल इस दौरान 33 प्रतिशत परिवारों ने कहा था कि उनकी कमाई बढ़ गई है, वहीं इस साल ऐसा कहने वालों की गिनती छह प्रतिशत के आसपास है। हालांकि कई और आंकड़े हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि कामकाज वापस पटरी पर आ रहा है। दोपहिया बेचने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनियों की बिक्री में तेज उछाल दिख रहा है। जून में हीरो मोटो ने साढ़े चार लाख गाड़ियां बेचीं, मई से चार गुना ज्यादा। हालांकि, पिछले साल के जून के मुकाबले यह 26 प्रतिशत कम है। कंपनी के चेयरमैन सुनील मुंजाल के अनुसार, सबसे अच्छी मांग गांव और कस्बों से आ रही है। इसकी वजह सरकार के आर्थिक पैकेज से निकली रकम का इन इलाकों तक पहुंचना है। सामान्य मॉनसून और रबी की बंपर पैदावार के बाद उन्हें लग रहा है कि अब अगर कोई नया झटका नहीं लगा, तो साल खत्म होते-होते बिक्री में इतनी तेजी आ चुकी होगी कि दो महीने की बंदी से हुआ नुकसान भी धुल जाएगा।
    रोजमर्रा की चीजें बनाने वाली कंपनियों का हाल भी अलग नहीं है। जिस दौरान पूरा देश लॉकडाउन की सबसे गंभीर मार झेल रहा था, उसी समय यानी अप्रैल से जून के बीच ब्रिटैनिया का मुनाफा पिछले साल से दोगुने से भी ज्यादा हो गया। यही हाल कुछ अन्य कंपनियों का है।
    दूसरी तरफ, कोरोना के आंकड़े देखिए, जो डरावनी रफ्तार से बढ़ रहे हैं। इसके बावजूद शेयर बाजार को देखिए, तो लगता ही नहीं कि कहीं कोई मुसीबत है। भारी गिरावट के बाद सेंसेक्स और निफ्टी फिर से नई ऊंचाई की ओर रेस लगा रहे हैं। छोटी और मंझोली कंपनियों में भी तेजी दिख रही है। बाजार में इस तेजी के कई कारण बताए जा रहे हैं। एक तो नए लोगों को बताया जा रहा है कि भारी गिरावट के बाद बाजार में तेजी आती है और ऐसी गिरावट ही पैसा बनाने के लिए सबसे अच्छा समय होता है। इस चक्कर में बहुत से नए लोग शेयर बाजार में आ गए हैं। लेकिन 23 मार्च की तेज गिरावट के बाद उछाल की शुरुआत इन लोगों के भरोसे नहीं हुई थी। दरअसल, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में सरकारों ने बहुत बड़ी रकम लोगों के हाथों में खर्च करने के लिए दी है। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा उन देशों के म्यूचुअल फंड के रास्ते भारत पहुंचा है। यह रकम कुछ गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों में ही लगती है, लेकिन इससे आई तेजी से दूसरे निवेशक आकर्षित होते हैं।
    एक समस्या यह है कि बैंकों में पैसा रखना करीब-करीब बेकार लगने लगा है। ऐसे में, अगर कोई शेयर बाजार का लालच दिखा दे, तो मन मचलना स्वाभाविक है। कुछ लोग हिम्मत कर रहे हैं और कूद रहे हैं। जनवरी से मई के बीच देश में करीब 29 लाख नए डीमैट अकाउंट खुले हैं और शेयर बाजार में कैश सेगमेंट में जो कारोबार हो रहा है, अप्रैल से जून के बीच उसका आधे से ज्यादा हिस्सा छोटे निवेशकों से ही आया है। पिछले साल से मुकाबला करें, तो इस दौरान रिटेल निवेशकों का कारोबार 78 प्रतिशत बढ़ा है और उन्होंने 33 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का लेन-देन किया है।
    बाजार में इस तेजी से सबको मजा आ रहा है, लेकिन यह खतरनाक स्थिति है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भी शुक्रवार को जारी फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट में चिंता जताई है कि बाजार और बाजार के सूचकांक जिस तरह चल रहे हैं, उनका देश की आर्थिक स्थिति या जमीनी सच्चाई से कोई रिश्ता नहीं दिखता। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि बैंकों के डूबे कर्ज दोगुने हो सकते हैं और उस स्तर पर पहुंच जाएंगे, जहां पिछले 20 साल में कभी नहीं रहे। साफ है, जमीनी तकलीफ दूर किए बिना इस समस्या से पार नहीं पाया जा सकता। आर्थिक विशेषज्ञ शोभना सुब्रमण्यम कहती हैं कि सरकार को बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर खर्च करना होगा। इसके लिए कम से कम चार-पांच लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेना होगा। सवाल है कि इस वक्त सरकार कर्ज लेगी, तो चुकाएगी कब और कैसे? क्या कमाई का कोई दूसरा रास्ता है? काम-धंधे बिगड़ते रहे, तो टैक्स की कमाई भी घटेगी। रास्ता एक ही है कि सरकार खर्च करे। इसके लिए पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का सुझाव है कि सरकार को सारी हिचक और रेटिंग वगैरह की चिंता छोड़ नए नोट छापने चाहिए और उसे प्रोजेक्ट्स में भी लगाने चाहिए और जनता की जेब में भी पैसा डालना चाहिए। इससे इकोनॉमी में वह रफ्तार आ सकेगी, जो इस आपदा को अवसर में बदल पाएगी।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

     

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