July 24, 2026
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    जब उफ करने पर ताले थे

    • rounak group

    मेरी कहानी / शौर्यपथ / वह स्याह दौर ऐसा था, जब घोड़े भी गुलामों से ज्यादा खुश नजर आते थे। घोडे़ कभी-कभी ही काम में लगते थे, खूब खाते थे, गुलामों के हाथों नहाने-सहलाने की सेवा पाते थे, पर गुलामों के लिए क्या दिन-क्या रात? लगे रहो मशीन की तरह। ऊपर से मालिक की नजर टेढ़ी हो जाए, तो खैर नहीं। उस दिन अस्तबल में 16 साल का गुलाम डगलस अपने मालिक के घोड़ों की सेवा में लगा था। पीछे से उसका श्वेत मालिक दबे पांव दाखिल हुआ। हाथों में रस्सी लिए आते ही डगलस का एक पैर पकड़ लिया। डगलस चौंका, अगले ही पल समझ गया कि मालिक उसे बांधने वाला है, फिर पीटेगा और हो सकता है, जान ही ले ले।
    लड़के का अपराध था कि उसने अपने मूल मालिक से जाकर अत्याचार की शिकायत की थी। हालांकि वहां भी सुनवाई नहीं हुई थी। सब जानते थे कि कोवे नाम का यह खेत मालिक अश्वेतों का मनोबल तोड़ने के लिए कुख्यात है। गुलामों के शौकीन घटिया लोग कहते थे, जब किसी गुलाम के पर निकलने लगें, तो उसे कोवे के हवाले कर दो। कोवे की बड़ी दहशत थी। पिछली बार मालिक ने बीमार होने के बावजूद पैरों से ठोकर मार-मारकर अधमरा कर दिया था। जब पांच घंटे तक घिसटते हुए डगलस अपने मूल मालिक के पास पहुंचा, तो सिर से पैर तक सूखे, ताजा खून से सना हुआ था। फिर भी मूल मालिक ने कोवे को बढ़िया इंसान बताकर बचाव किया। वह हैवानियत का ऐसा दौर था, जब ज्यादातर श्वेत आपस में मिले होते थे। अश्वेतों के विलाप पर कान न देना उनकी आदत में शुमार था।
    जाहिर है, डगलस को लौटना पड़ा और आते ही पैरों में रस्सी बांधकर जानवरों से भी बुरे बर्ताव की तैयारी नुमाया हो गई। उसने तत्काल कूदकर पैर को छुड़ाया। न जाने कहां से ताकत उमड़ आई कि नहीं, अब अपने को बचाना है, अब मार खाए, तो मर ही जाएंगे। डगलस अपनी चुस्त कद-काठी के साथ तनकर खड़ा हो गया, कोवे घूरकर झपटा, लेकिन उसके गिरेबां पर दो मजबूत हाथ आ लगे। कोवे चिल्लाया, ‘तो तुमने तय कर लिया है, तुम लड़ना चाहते हो?’ उसे उम्मीद थी कि डगलस इतना सुनते ही गिरेबां छोड़ देगा, पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाएगा। लेकिन इस बार वक्त एक नई कहानी लिख रहा था।
    दर्द से भरे डगलस ने कोवे के गिरेबां को और कसते हुए अपनी मंशा का इजहार कर दिया। कोवे के बुलाने पर एक आदमी दौड़ा-दौड़ा आया, उसने डगलस को जैसे ही पीछे से पकड़ा, छाती के ठीक नीचे पसलियों पर कोहनी का जोरदार वार पड़ा। चोट खाने वाला अपना दर्द थामे जमीन पर गोल हो गया। अब तो कोवे की हालत और बिगड़ी। एक और गुलाम दौड़कर आया, लेकिन यह कहते हुए मदद करने से मुकर गया कि वह यहां काम करने के लिए भेजा गया है, लड़ाई में भाग लेने के लिए नहीं। अब अस्तबल में रह गए कोवे और डगलस। गुत्थमगुत्था। कोवे सोच रहा था कि यह 16 साल का लड़का ही तो है, शुरुआती ताकत दिखा रहा है, पकड़ ढीली पड़ते ही इसे रगड़ दूंगा। यह बात डगलस भी जानता था कि कोवे को मौका नहीं देना है। एक भी मौका दिया, तो शामत टूट पड़ेगी। अब जब पकड़ ही लिया है, तो जोर आजमाइश हो ही जाए। कब तक इस गोरे का अत्याचार सहते रहेंगे? पिछले छह महीनों में इसने मार-मारकर शरीर को घाव बना दिया है। हमें भी दर्द होता है भाई, जैसे तुम्हें अभी मेरी जकड़न में हो रहा है।
    जकड़ने-रगड़ने में दोनों जमीन पर गिर गए। कोवे ने जब नाखून गड़ाने की कोशिश की, तो उसे और ज्यादा प्यासे नाखूनों को भुगतना पड़ा। छोटी थप्पड़ का जवाब बड़ी थप्पड़ से और हल्के मुक्के का जवाब भारी मुक्के से मिला। कोवे को यह भी चिंता हो रही थी कि इलाके के लोग कहीं यह लड़ाई न देख लें। वह सिर घुमाकर इधर-उधर देख लेता था और कोशिश करता था कि किसी आड़ में ही लड़ाई हो। पूरे दो घंटे लड़ाई के बाद कोवे की हिम्मत टूट गई, पर वह पुलिस के पास नहीं गया। वह नहीं चाहता था, लोग जानें कि उसकी पिटाई हुई है, वह भी एक लड़के के हाथों। फायदा यह हुआ कि डगलस अत्याचार से बच गए।
    मनोबल एकदम से बढ़ गया और बस चार साल लगे, गुलामी दूर हो गई। फ्रेडरिक डगलस (1818-1895) ने गुलामों को आजाद कराने, समाज सुधारने, नस्लभेद, रंगभेद से लड़ने, खूब लिखने और भाषण देने में अपना जीवन लगा दिया। फ्रेडरिक डगलस अमेरिका में उप-राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल होने वाले पहले अश्वेत थे। आज उन्हें पूरा अमेरिका सम्मान देता है। वह आज भी प्रेरणास्रोत हैं, तन, मन, धन से बलवान बनो, क्योंकि बल न काला होता है, न गोरा। बल से कोई तुम्हें गुलाम बना सकता है और बल से ही तुम गुलाम बनने से बच सकते हो।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय फ्रेडरिक डगलस समाज सुधारक नेता

     

     

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