July 24, 2026
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    सजगता बढ़ी, पर परमाणु हथियारों का खतरा भी

    • rounak group

    नजरिया / शौर्यपथ / आज हिरोशिमा दिवस है। साल 1945 में 6 अगस्त के दिन ही दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने इस जापानी शहर पर ‘लिटिल ब्यॉय’ नामक परमाणु बम गिराए थे। और इसके तीन दिनों बाद 9 अगस्त को जापान के ही नागासाकी में ‘फैट मैन’ नामक एक अन्य परमाणु बम गिराया गया था। इन बमों की तबाही ऐसी मची कि दोनों शहरों में लगभग साढ़े तीन लाख लोग झटके में मारे गए, जबकि विकिरण का प्रभाव ऐसा फैला कि बाद की कई पीढ़ियां विकलांग पैदा होती रहीं। आज विश्व में परमाणु हथियारों की संख्या लगभग 13,450 हो गई है, जिनकी मारक क्षमता इन दोनों बमों से कई गुना ज्यादा है। ये हथियार अपने अल्पकालीन और दीर्घकालीन प्रभाव से मानव सहित पृथ्वी के अधिकांश जीवन को समाप्त करने की विध्वंसक क्षमता रखते हैं। बेशक शीत युद्ध के चरम के समय की तुलना में आज परमाणु हथियारों के खिलाफ जागरूकता बढ़ी है, फिर भी तमाम विशेषज्ञ यही मानते हैं कि परमाणु हथियारों से जुड़ा खतरा कम नहीं हुआ है, बल्कि बढ़ गया है।
    इसके अनेक कारण दिखाई देते हैं। पहली वजह तो यह है कि उस समय अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों के नियंत्रण की जो संधियां या समझौते थे, उनका असर तेजी से कम होता जा रहा है। इनमें से एक संधि ‘द इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस’ (आईएनएफ) 2019 में टूट चुकी है, जबकि दूसरी बड़ी संधि ‘न्यू स्टार्ट’ के अगले साल फरवरी में नवीनीकरण की संभावना बहुत कम है, क्योंकि इसकी तैयारी बहुत धीमी नजर आ रही है। दूसरा कारण यह है कि परमाणु शस्त्र कम करने के समझौते समय के साथ-साथ कई कमियों के शिकार हो गए। वर्ष 1987, 1991 और 1993 में अमेरिका और सोवियत संघ (या रूस) के बीच तीन महत्वपूर्ण समझौते हुए थे, जिनका व्यापक स्तर पर स्वागत किया गया था और यह माना गया था कि अब इन दोनों देशों में बडे़ पैमाने पर परमाणु शस्त्र नष्ट किए जाएंगे, पर वास्तविक स्थिति मानव विकास रिपोर्ट 1994 बताती है, जिसके मुताबिक, ‘इन संधियों से तनाव कम तो हुआ, लेकिन इनकी अपनी सीमाएं हैं। इनमें यह निर्देश नहीं दिया गया है कि ‘वारहेड’ को ही नष्ट कर दिया जाए।’
    एक समय था, जब परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का खतरा मुख्य रूप से दो बड़ी ताकतों अमेरिका और रूस की ओर से था, पर अब परमाणु हथियार नौ देशों के पास हैं। इतना ही नहीं, आतंकवादियों के पास भी छोटे परमाणु हथियार पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। फिर, चार-पांच ऐसे देश भी हैं, जो निकट भविष्य में परमाणु हथियार प्राप्त कर सकते हैं। एक अनुमान यह भी जताया गया है कि अमेरिका से संबंध अधिक तनावपूर्ण होने के बाद चीन तेजी से अपने परमाणु शस्त्र बढ़ा सकता है। हाल ही में स्टॉकहोम पीस रिसर्च संस्थान ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जिन देशों के पास परमाणु हथियार हैं, वे सभी इनके आधुनिकीकरण की दौड़ में हैं। इसके अलावा, युद्ध में परमाणु हथियारों के ‘टैक्टिकल’ हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की आशंका भी जताई जा रही है। इसका अर्थ है कि किसी देश की बढ़ती सेना को रोकने के लिए रणभूमि में इसका इस्तेमाल हो सकता है।
    इन्हीं तमाम कयासों को ध्यान में रखते हुए कई विशेषज्ञ यह मानने लगे हैं कि परमाणु हथियारों का खतरा बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त, जिस तरह से अंतरिक्ष क्षेत्र का सैन्यीकरण तेजी से बढ़ रहा है, वह भी चिंता का विषय है। दुनिया में अमन-शांति बहाल करने की दिशा में काम करने वाले कई संस्थानों का मानना है कि किसी भी हालत में अंतरिक्ष क्षेत्र में किसी परमाणु हथियार का प्रवेश नहीं होना चाहिए। ऐसे में, मौजूदा वक्त की मांग यही है कि परमाणु हथियारों की विध्वंसकता के अभिशाप से धरती को मुक्त किया जाए। इसके लिए विश्व स्तर पर सभी अमनपसंद नागरिकों और संस्थाओं को एक बड़ा वैश्विक अभियान चलाना चाहिए।
    इसमें कोई दोराय नहीं कि संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य देश भी परमाणु हथियारों से मुक्त धरती के पैरोकार हैं। हम भी परमाणु हथियार विहीन धरती के उद्देश्य का समर्थन करते हैं, जबकि हम एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हैं। हम इसलिए इसमें मुखर हैं, क्योंकि परमाणु शक्ति होने के बावजूद एक जिम्मेदार राष्ट्र का अपना दायित्व बखूबी समझते हैं।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) भारत डोगरा, सामाजिक कार्यकर्ता

     

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