July 24, 2026
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    जगे राष्ट्र में पूरे हो रहे काम

    • rounak group

    ओपिनियन / शौर्यपथ /अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के शुभारंभ को समूचे भारत और विश्व भर में फैले भारतीय मूल के लोगों और भारत प्रेमियों ने जी भरकर देखा। अगणित लोगों को यह दृश्य एक स्वप्नपूर्ति का अनुभव और आनंद दे गया। लंबे संघर्ष के बाद यह महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त हुई है। असंख्य भारतीयों के चेहरों पर समाधान का तेज और आंखों में हर्ष के आंसू भी देखने को मिले। कई लोगों के लिए यह कार्य-पूर्ति का क्षण था, परंतु वास्तव में यह कार्यारंभ का क्षण है।
    भारत में धर्म और सामाजिक जीवन एक-दूसरे से भिन्न नहीं देखे गए हैं। सभी समान हैं। ऐसी भारतीय मान्यता है, और इसे भारत जीता भी आया है। ‘युबांतु’ एक अफ्रीकी संकल्पना है। उसका अर्थ है, ‘मैं हूं, क्योंकि हम हैं’। मैं, मेरा परिवार, ग्राम, राज्य, राष्ट्र, मानवता, मानवेतर जीव सृष्टि, निसर्ग, ये सभी परस्पर जुड़ी हुई क्रमश: विस्तारित होने वाली विभिन्न इकाइयां हैं, यही एकात्म है। इनमें परस्पर संघर्ष नहीं, समन्वय है; स्पद्र्धा नहीं, संवाद है। इन सभी इकाइयों का समुच्चय हमारा जीवन है। ये सब हैं, इसीलिए हम सब हैं। इनके बीच का संतुलन धर्म है और यह संतुलन बनाए रखना ही धर्म स्थापना है। सैकड़ों वर्षों तक भारत सर्वाधिक समृद्ध देश था। सामथ्र्य संपन्न होने पर भी भारत ने अन्य देशों पर युद्ध नहीं लादे। व्यापार के लिए दुनिया के सुदूर कोनों तक जाने के बावजूद भारत ने न उपनिवेश बनाए, न उनका शोषण किया; न उन्हें लूटा, न ही उनका धर्म-परिवर्तन किया और न उन्हें गुलाम बनाकर उनका सौदा किया। भारत में मंदिर आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ श्रेष्ठ लोकाचार और आर्थिक समृद्धि के कारण रहे हैं और केंद्र भी।
    1951 मे सोमनाथ मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा करते समय भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के भाषण में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वह कहते हैं, ‘इस पुनीत अवसर पर हम सबके लिए यही उचित है कि हम आज इस बात का व्रत लें कि जिस प्रकार हमने आज अपनी ऐतिहासिक श्रद्धा के इस प्रतीक में फिर से प्राण-प्रतिष्ठा की है, उसी प्रकार हम अपने देश के जन-साधारण के उस समृद्धि मंदिर में भी प्राण-प्रतिष्ठा पूरी लगन से करेंगे, जिस समृद्धि मंदिर का एक चिन्ह सोमनाथ का पुराना मंदिर था।... साथ ही सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण तब तक मेरी समझ में पूरा नहीं होगा, जब तक कि इस देश की संस्कृति का स्तर इतना ऊंचा न हो जाए कि यदि कोई आज का अलबरूनी हमारी वर्तमान स्थिति को देखे, तो हमारी संस्कृति के बारे मे दुनिया को वही बताए, जो भाव उसने उस समय प्रकट किए थे’। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर स्वदेशी समाज में लिखते हैं, ‘हम वास्तव में जो हैं, वही बनें। ज्ञानपूर्वक, सरल और सचल भाव से, संपूर्ण रूप से हम अपने आपको प्राप्त करें।’
    वर्ष 1987 में राम-जानकी रथ यात्रा चल रही थी, तब सरसंघचालक बालासाहब देवरस से एक कार्यकर्ता ने पूछा- गौ हत्या प्रतिबंध का आंदोलन, कश्मीर के 370 में सुधार आदि विषय, मांग करके हमने छोड़ दिए, ऐसा लगता है। क्या राम मंदिर के विषय में भी वैसा ही होगा? तब बालासाहब देवरस का उत्तर था, ‘हम इसी निमित्त राष्ट्रीय जागरण करते हैं। यह जागरण सतत किसी न किसी निमित्त से करते रहना चाहिए। आज हिंदू समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर बहुत नीचा है। इसी कारण ये सारी समस्याएं हैं। जिस दिन संपूर्ण समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर पर्याप्त उन्नत होगा, तब हो सकता है, इन सभी विषयों के समाधान एक साथ हो जाएं’।
    मैल्कॉम ग्लेडवेल की पुस्तक टिपिंग प्वॉइंट : हाउ लिटिल थिंग कैन मेक अ बिग डिफरेंस की व्याख्या वह यूं करते हैं, ‘टिपिंग प्वॉइंट वह बिंदु है, जिस पर छोटे परिवर्तन या घटनाओं की एक शृंखला पर्याप्त महत्वपूर्ण हो जाती है, जिससे बडे़, अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं’। आज बालासाहब के शब्दों का स्मरण करते हुए लगता है कि उस भाव को व्यक्त करते समय क्या उनका संकेत टिपिंग प्वॉइंट की ओर था?
    संघ के ज्येष्ठ प्रचारक और चिंतक दत्तोपंत ठेंगड़ी एक बात हमेशा कहा करते थे, ‘समाज में कुछ लोगों का राष्ट्रीय दृष्टि से जागृत और खूब सक्रिय होना शाश्वत परिवर्तन नहीं लाता है। जब सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर थोड़ा भी ऊंचा उठता है, तब बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं। इसलिए समय-समय पर कुछ मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय जागरण के प्रयास सतत करते रहने से ही धीरे-धीरे सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर ऊंचा उठेगा। इन सबके सम्मिलित प्रभाव से राष्ट्रहित के अनेक छोटे-बड़े महत्व के अन्य आवश्यक कार्य सहज होते जाएंगे’।
    लगता है, बालासाहब देवरस और ठेंगड़ी जी द्वारा वर्णित वह ‘टिपिंग प्वॉइंट’ निकट आ रहा है, रवींद्रनाथ ठाकुर का वह स्वदेशी समाज सक्रिय हो रहा है। राष्ट्र जीवन के अनेक क्षेत्रों में, अनेक वर्षों से लंबित राष्ट्रहित के मूलभूत परिवर्तन एक के बाद एक हो रहे हैं। देश की रक्षा नीति और विदेश नीति में मूलभूत परिवर्तन विश्व अनुभव कर रहा है। विकेंद्रित और कृषि आधारित अर्थ नीति के आधार पर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का संकल्प प्रकट हो रहा है। भारत की जड़ों से जुड़कर विश्व के आकाश को आगोश में लेने के लिए ऊंची उड़ान भरने वाले पंख देने वाली नई शिक्षा नीति की घोषणा हुई है। समाज के स्वयं के उद्यम और नवाचारों को प्रोत्साहन मिलने का वातावरण बन रहा है। यह सारा एक साथ होता नजर आ रहा है। इस परिवर्तन को 2014 से हुए केंद्रीय सत्ता परिवर्तन के साथ जोड़कर देखना स्वाभाविक है। 16 मई, 2014 के दिन चुनाव परिणामों की घोषणा होने का बाद 18 मई रविवार के संडे गार्जियन के महत्वपूर्ण संपादकीय में एक मूलभूत और गहरी बात कही गई थी, ‘यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारतीय समाज में अंतर्निहित परिवर्तनों की वजह से ही नरेंद्र मोदी आए हैं, किसी दूसरे तरीके से नहीं’। राष्ट्रीय चेतना के सामान्य स्तर के ऊंचा उठने के कारण ही सभी प्रकार के इष्ट परिवर्तन शुरू हुए हैं और सत्ता परिवर्तन भी उसी का भाग है।
    अपना दायित्व निभाने के लिए भारत वर्ष अपनी चिर-परिचित शक्ति के साथ खड़ा हो रहा है। अब तक रुके हुए या रोके गए सभी आवश्यक कार्य होना शुरू हो गए हैं। संपूर्ण समाज को सजग रहकर सक्रिय होना होगा। यह वही आत्म-आभास है, जिससे जरूरी आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता अवश्यंभावी है। एक संघ गीत में कहा गया है, अरुणोदय हो चुका वीर, अब कर्मक्षेत्र में जुट जाएं, अपने खून-पसीने द्वारा नवयुग धरती पर लाएं।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) मनमोहन वैद्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह

     

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