July 24, 2026
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    संपत्ति या सुरक्षा

    • rounak group

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / शीर्ष अदालत ने अपने फैसले से एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि वह पिता की संपत्ति में बेटियों को भी बराबर का अधिकारी मानती है। इससे निश्चय ही बेटियों और बेटों में होने वाला भेदभाव कुछ हद तक कम हो सकेगा। सवाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नहीं, बल्कि यह है कि जब बेटियां सुरक्षित ही नहीं रहेंगी, तो संपत्ति का भला क्या लाभ? जिस तरह से आए दिन बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवेश में बेटियों को संपत्ति से ज्यादा सुरक्षा की जरूरत है। छोटे शहर हों या महानगर, ग्रामीण इलाके हों या शहरी क्षेत्र, हर जगह बेटियों पर जुल्म बढ़े हैं। दिल्ली में 12 वर्षीया बच्ची के साथ दरिंदगी होती है, तो बुलंदशहर में राह चलते छेड़खानी, ये घटनाएं बताती हैं कि बेटियों को सुरक्षा देने में हमारी सरकार, समाज और कानून बुरी तरह विफल रहे हैं। विधायिका, न्यापालिका और कार्यपालिका को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए और बेटियों के अनुकूल समाज बनाना चाहिए।
    प्रत्यूष आनंद, नवादा, बिहार

    जिम्मेदार बनें हम
    देश के दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मंगलवार की अपनी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अधिक से अधिक जांच पर जोर दिया। यह बताता है कि कोरोना महामारी से निपटने में यह कदम किस हद तक कारगर है। उन्होंने उन राज्यों को खासतौर से जांच की रफ्तार और दायरा बढ़ाने की अपील की, जहां संक्रमण-दर और मृत्यु-दर अधिक हैं। सरकार की गंभीरता जनहित में उचित है, लेकिन हम भारतीयों को जैसे ही छूट मिलती है, हमारा ‘इम्यून सिस्टम’ उछल-कूद मचाने लगता है और हम पाबंदियों की परवाह किए बिना अपने पुराने ढर्रे पर आकर आस-पड़ोस और मोहल्ले में कोरोना का ‘निमंत्रण-पत्र’ बांटने लगते हैं। इसीलिए सरकारों व प्रशासन को उन पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, जो दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हैं। ऐसा करने पर ही हम इस महामारी का मुकाबला कर सकेंगे।
    सुभाष बुड़ावन वाला
    रतलाम, मध्य प्रदेश

    अलविदा इंदौरी साहब
    ‘सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है...’ इस तरह की वीरोचित और न्यायपरक पंक्तियां लिखने वाले राहत इंदौरी साहब अब हमारे बीच नहीं हैं। वह हमेशा के लिए रुखसत हो गए। उनका पूरा जीवन एक ऐसे आदमी की अत्यंत संघर्षमय कहानी है, जो अपने अदम्य साहस और जीवटता से शून्य से शिखर तक पहुंचता है। उन्होंने अपनी बेखौफ अभिव्यक्ति से देश के आमजन, मजदूर, किसान, गरीब आदि को आवाज दी। यही वजह है कि वह हर किसी के अजीज बन गए। उनका यूं जाना इसलिए ज्यादा खलता है, क्योंकि अभी देश पर भय और दहशत की एक विचित्र धुंध छाई हुई है। निश्चय ही, वह अपनी शायरी से हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।
    निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

    सख्त कार्रवाई हो
    दुनिया कितनी आगे निकल गई है, किंतु हम अब भी छोटी-छोटी बातों पर सौहार्द बिगाड़ देते हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त कर देते हैं। समाज के समझदार लोगों को ऐसे वक्त में तुरंत आगे आना चाहिए और नासमझों को समझाने के प्रयास कर उद्वेलित भावनाएं शांत करनी चाहिए। सरकार तो कानून-व्यवस्था के जरिए अमन स्थापित करती ही है। सवाल यह है कि क्या मिला उन लोगों को, जिन्होंने कतिपय लोगों की भावनाएं उद्वेलित कर शांत बेंगलुरु को अशांत कर डाला? एक गलती करे और पूरा शहर उसे भुगते, यह किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं। भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसका ख्याल समाज के जिम्मेदार लोगों और सरकार, दोनों को रखना होगा। देशहित व जनहित में यह जरूरी है।
    महेश नेनावा, इंदौर, मध्य प्रदेश

     

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