
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
Google Analytics —— Meta Pixel
नजरिया / शौर्यपथ /नब्बे वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त, 1947 को हमारे देश को आजादी मिली थी। अंगे्रजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए जो कीमत और कुर्बानी हमारे पुरखों ने चुकाई है, वह हमारे लिए पे्ररणा का स्रोत है। लेकिन इस मौके पर यह जानना भी जरूरी है कि जो देश धर्म, दर्शन, कला और विज्ञान के क्षेत्र में शताब्दियों तक विश्व के मानचित्र पर चमकता रहा, वह गुलाम कैसे हो गया? आपसी फूट, विशेषकर यहां के शासकों तथा राजवंशों में पारस्परिक ईष्र्या, ऊंच-नीच के भेद, जनसमूह में राजनीतिक ज्ञान के अभाव, अर्थ-संचय, वैज्ञानिक उन्नति के प्रति उदासीनता, और इन सबसे बढ़कर हर स्थिति में चुपचाप बैठे रहने की प्रवृत्ति ने हमें पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों का गुलाम बना दिया। इसलिए गुलामी के इन कारणों को समझना जरूरी है, ताकि भविष्य में कभी देश गुलाम न हो।
स्वाधीनता कभी-कभी भौतिक दुर्बलता के कारण हाथ से निकल जाती है, परंतु पराधीनता राष्ट्रीय चरित्र की दुर्बलता से उत्पन्न होती है। और जब पराधीन राष्ट्र में ठोकर खाते-खाते सोई हुई ऊंची भावनाएं जागती हैं, तब वह स्वतंत्रता का अधिकारी बनता है और उसकी प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। उसकी ऊंची भावनाएं त्याग और तपस्या के रूप में व्यक्त होती हैं। हमारा स्वाधीनता दिवस उन्हीं उदात्त भावनाओं, देशभक्तों के त्याग, तपस्या और बलिदान की वृत्ति का प्रतीक है। पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वाधीनता को प्राप्त करना कठिन होता है, उसको खो देना नहीं। इसलिए निरंतर सतर्कता स्वाधीनता का मूल्य है। अपनी स्वतंत्रता कायम रखने के लिए निरंतर सतर्क रहने की आवश्यकता है और स्वाधीनता का भार हरेक नागरिक पर है। चरित्र में कहीं भी दुर्बलता आना ‘स्वार्थ बुद्धि का बलवती होना, सत्य से डिग जाना’ यह सब व्यक्ति व राष्ट्र, दोनों के लिए घातक है।
यह सच है कि स्वतंत्रता मिलने पर अपनी कमियों का पता चलता है। आज हमारा देश इस बात का अनुभव कर रहा है। प्राय: उन सभी चीजों की कमी है, जिनके सहारे कोई देश सम्मान पाता है। चीजों को खरीदने और बनाने के लिए संसाधन नहीं, विशेषज्ञ नहीं। आज जो राष्ट्र संपन्न हैं, वे और उन्नत होते जाएंगे और यदि हम शीघ्र उनके बराबर नहीं आ जाते, तो फिर हमारी स्वंतत्रता दबाव में रहेगी। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति ऐसी है कि नहीं कहा जा सकता कि शांति कब तक बनी रहेगी। राष्ट्रों में लोभ और भय के कारण इतनी तनातनी है कि किसी भी दिन, किसी भी कोने में लड़ाई छिड़ सकती है और जिस प्रकार, 1914 में सर्बिया की एक घटना ने महायुद्ध शुरू करा दिया था, उसी प्रकार एक चिनगारी आज महायुद्ध को जन्म दे सकती है, और अब जो महायुद्ध होगा, वह पहले से कहीं भीषण होगा। तात्पर्य यह कि हमें थोडे़ समय में अपने घर को संभालना है। यह काम असाधारण धैर्य, साहस और त्याग बुद्धि से ही हो सकता है। यदि भविष्य में राष्ट्र को कष्ट से मुक्त रखना है, तो आज प्रत्येक भारतीय को कष्ट सहने के लिए तैयार रहना होगा।
हमारे यहां कई तरह की विचारधाराएं हैं, कई राजनीतिक दल हैं। लोगों को अपने विचारों के अनुसार समुदाय बनाने का पूरा अधिकार है। विचारों के विनिमय से सत्य का परिचय होता है। अपने विचारों से राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित करने का अधिकार भी सबको है। बिना ऐसी स्वतंत्रता के लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं चल सकती। परंतु हमें दो बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। एक, हममें सहिष्णुता होनी चाहिए। हमें यह मानना चाहिए कि जितना विचार स्वातंत्र्य हमको है, उतना ही दूसरों को है। दूसरी, विचार-विनिमय में विरोधी के व्यक्तित्व पर आक्षेप करना ऐसी कटुता उत्पन्न कर देता है, जो राष्ट्रीय जीवन को विषाक्त कर देता है।
हमारी निजी स्वतंत्रता वहीं तक है, जहां तक वह राष्ट्र की स्वतंत्रता को बाधा नहीं पहुंचाती। हमारे आपसी मतभेदों से राष्ट्र की उन्नति में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़नी चाहिए। चाहे जो भी दल शासनारूढ़ हो, उसको अपने सिद्धांतों के अनुसार काम के संचालन में तभी सुविधा होगी, जब देश संपन्न और बलवान होगा। प्रत्येक नागरिक और दल को इस संक्रमण काल में संकीर्ण घेरों से ऊपर उठना होगा। इस स्वतंत्रता दिवस के दिन हम यह संकल्प करें कि अपने राष्ट्र को सुखी, संपन्न और शक्तिशाली बनाने में हम अपनी ओर से हर प्रयास करेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) निरंकार सिंह, पूर्व सहायक संपादक, हिंदी विश्वकोश
Make sure you enter all the required information, indicated by an asterisk (*). HTML code is not allowed.
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
