July 24, 2026
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    दबाव में बचपन

    • rounak group

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / ‘चिंता रहित खेलना-खाना, वह फिरना निर्भय स्वच्छंद, कैसे भूला जा सकता है, बचपन का अतुलित आनंद...’ सुभद्रा कुमारी चौहान की इन पंक्तियों में बचपन को बेहद खूबसूरती से पिरोया गया है। मगर आधुनिक युग के बच्चे इन सुखमय पलों का पूरी तरह से कहां आनंद ले पाते हैं। प्रतिस्पद्र्धा के इस दौर में साधन तो अधिक हैं, लेकिन बच्चे रेस के घोडे़ की तरह अंधी दौड़ में शामिल हैं। उनका बचपन कहीं खो सा गया है। शुरुआत से ही उनके दिमाग में यह बात डाल दी जाती है कि उन्हें सबसे अधिक नंबर लाना है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वे जीवन में सफल नहीं हो पाएंगे। बेशक उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए, मगर उनकी क्षमता का आकलन किए बिना उन पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ डालना बिल्कुल गलत है। बच्चों को अपनी रुचि के मुताबिक ही विषय और क्षेत्र का चुनाव करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। यही आज की जरूरत है।
    आस्था मुकुल, झारखंड

    कब सीखेंगे हम
    लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था के जाम हो चुके चक्कों को गति देने के लिए औद्योगिक गतिविधियों में रियायतें जारी हैं। इसके कारण एक ओर जहां कोरोना संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो वहीं दूसरी ओर सड़कों पर वाहनों की गति अनियंत्रित होती दिख रही है। तीन महीने से अधिक चले लॉकडाउन और अनलॉक किए जाने के दौरान कई लोगों की आदतें नहीं बदलीं और वे बाजार एवं सार्वजनिक जगहों पर बिना मास्क लगाए व शारीरिक दूरी के नियमों का उल्लंघन करते देखे जा सकते हैं। सड़कों पर घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं, जबकि लॉकडाउन के दौरान ऐसे हादसे नाममात्र के होते थे। साफ है कि लॉकडाउन के सबक को हम सबने अब भुला दिया है।
    शिवम सिंह, बिंदकी, उत्तर प्रदेश

    बीमार होते अस्पताल
    देश में एक तरफ जहां कोविड-19 से जंग गंभीर होती जा रही है, तो कुछ अस्पतालों द्वारा मरीजों से बेहिसाब फीस वसूलने की खबरें भी आम होने लगी हैं। अच्छी बात है कि कई सरकारों ने अब इसके खिलाफ कदम उठाने की शुरुआत कर दी है। महाराष्ट्र इस अभियान से जुड़ने वाला नया राज्य है। उसने अपने अस्पतालों को साफ-साफ शब्दों में चेता दिया है कि अगर किसी अस्पताल ने कोविड-19 मरीज की मजबूरी का फायदा उठाया, तो उस पर पांच गुना तक का जुर्माना ठोका जा सकता है। यहां तक कि उसका पंजीयन भी रद्द हो सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह कुछ हद तक अस्पतालों पर लगाम लगाएगा। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में आबादी के लिहाज से सुविधाएं और मानव संसाधन नहीं हैं, इसलिए शहरी इलाकों में 80 प्रतिशत से अधिक लोग निजी अस्पतालों पर भरोसा करने लगे हैं। आबादी को देखते हुए निजी अस्पताल जरूरी हैं, पर उनके कामकाज पर निगरानी तंत्र की भी जरूरत है। सरकारों को इस दिशा में जरूर सोचना चाहिए।
    अरविंद पाराशर, मकनपुर, उत्तर प्रदेश

    जांच अंजाम तक पहुंचे
    गुरुवार को प्रकाशित संपादकीय ‘एक जरूरी जांच’ सुशांत सिंह राजपूत मामले की व्यथा उजागर करता लगा। बिहार और महाराष्ट्र की पुलिस में इसको लेकर जो उलझन पैदा हुई, वह वाकई चिंता का विषय है। महाराष्ट्र पुलिस द्वारा बिहार पुलिस के अधिकारियों के साथ किया गया व्यवहार भी कतई शोभनीय नहीं था। दोनों की लड़ाई के बीच कभी-कभी तो मूल मुद्दा ही गायब होता दिखा। निश्चय ही, इस तरह के घटनाक्रम से पुलिस-प्रशासन के व्यवहार पर उंगलियां उठती हैं। इसीलिए, जरूरत दोनों में आपसी सहयोग की थी, जिससे सच्चाई सामने आ पाती। मगर ऐसा नहीं हुआ, और अब सारा दारोमदार सीबीआई पर है।
    अमृतलाल मारू, धार, मध्य प्रदेश

     

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