
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
Google Analytics —— Meta Pixel
ओपिनियन / शौर्यपथ / भारत में कोरोना वायरस से जान गंवाने वालों की संख्या 55 हजार से अधिक हो चुकी है, और यह आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है, हालांकि मृत्यु-दर में अब गिरावट दिखने लगी है। रिकवरी रेट, यानी कोरोना की जंग जीतने वाले मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत तक इसका टीका आम लोगों के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इन सबसे ऐसा लगता है कि महामारी का बुरा दौर बीत चुका है। जाहिर है, अब वह वक्त आ गया है कि अर्थव्यवस्था को गति दी जाए।
2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में एक से 15 फीसदी तक की गिरावट का अनुमान लगाया गया है। मेरा मानना है कि इसमें पांच प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। दरअसल, अप्रैल-जून की तिमाही कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुई थी। साल-दर-साल उत्पादन बेशक घट रहा है, पर इसकी गति काफी धीमी है। चौथी तिमाही तक संभवत: यह गति थमने लगेगी, जिससे उत्पादन फिर से लय पकड़ने लगेगा। इस सुधार का दायरा दूसरे क्षेत्रों में भी फैल सकता है। गैर-खाद्य ऋण (खेती व इससे जुड़ी गतिविधियों, उद्योग, सेवा और पर्सनल लोन जैसे कर्ज), ऊर्जा खपत, औद्योगिक उत्पादन, रोजगार और जीएसटी संग्रह जैसे प्रमुख संकेतकों के आंकड़ों का भी यही संकेत है। सिर्फ यह साल और अगला वर्ष सुखद नहीं है। 2021-22 के अंत में हमारा उत्पादन उस स्तर पर आ जाएगा, जिस स्तर पर 2019-20 के अंत में था। इसके बाद भारत की विकास-गाथा उन नीतियों पर निर्भर करेगी, जो अगले डेढ़ साल में अपनाई जाएंगी। तमाम विकल्प इसी बात पर निर्भर करते हैं कि हम आज कहां खडे़ हैं।
इस साल संयुक्त राजकोषीय घाटा जीडीपी का 10.5 प्रतिशत हो सकता है, या फिर इसमें राज्यों को अतिरिक्त उधार की मिली अनुमति को भी शामिल कर लें, तो यह 12.5 फीसदी तक जा सकता है। सार्वजनिक क्षेत्रों की उधार आवश्यकता, जिसमें सार्वजनिक उपक्रम भी शामिल हैं, जीडीपी की करीब 14-15 फीसदी हो सकती है। जीडीपी का करीब नौ प्रतिशत तरलता या नकदी बढ़ाने में लगाया गया है, यह राशि भी बड़े पैमाने पर मांग को प्रोत्साहित करेगी। अब इसका कितना हिस्सा उत्पादन की रिकवरी में मददगार होगा और महंगाई कितनी बढ़ाएगा, यह आपूर्ति की रुकावटें तय करेंगी। अधिकांश विश्लेषक मौजूदा मंदी पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं, जबकि कुछ ने कीमतों में सामान्य स्तर से भी अधिक की गिरावट की आशंका जताई है। मगर मैं स्टैगफ्लेशन यानी मुद्रास्फीति जनित मंदी (बढ़ती महंगाई के साथ आने वाली मंदी) के खतरों का जिक्र करता रहा हूं, जो दुर्भाग्य से सही साबित हुआ है। जीडीपी में तेज गिरावट के साथ हमारी मुद्रास्फीति लगभग सात फीसदी तक बढ़ गई है और खाद्य मुद्रास्फीति भी 10 प्रतिशत के करीब है।
इसीलिए 2022-23 तक देश की राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों को धीरे-धीरे नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना होगा। महामारी की वजह से आई वैश्विक मंदी और गहराता भू-राजनीतिक तनाव जब तक शांत नहीं होंगे, यह उम्मीद फिजूल है कि अंतरराष्ट्रीय कारक हमारे विकास में मददगार होंगे। हमारा चालू खाता तात्कालिक रूप से इसलिए बढ़ गया था, क्योंकि तेल की कीमतों में कमी के साथ-साथ जीडीपी में गिरावट से आयात में कमी आई थी। हालांकि, जैसे-जैसे हालात सुधरेंगे, आयात में तेजी आएगी, जिससे व्यापार घाटा बढ़ेगा और कुल मांग पर नकारात्मक असर होगा। इस सूरतेहाल में, अगर हम चाहते हैं कि हमारी विकास दर सात फीसदी या इससे अधिक हो, तो अच्छी रणनीति यही होनी चाहिए कि लंबित संरचनात्मक सुधारों को फिर से आगे बढ़ाते हुए निवेश और उद्योग का भरोसा जीता जाए।
इस तरह के सुधारों में वित्तीय क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकारी बैंकों को रिजर्व बैंक की विशेष निगरानी में लाया जाना चाहिए और उस पर सरकार का स्वामित्व 50 फीसदी से कम किया जाना चाहिए। हालांकि, यह सुधार अपने-आप में पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यस बैंक, आईएल ऐंड एफएस जैसे निजी बैंकों में फर्जीवाड़े हुए हैं। ऐसे में, बैंकों और गैर-बैंकों, दोनों तरह के वित्तीय संस्थानों पर कड़ी निगरानी जरूरी है, ताकि गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां यानी डूबत कर्ज की समस्या पर काबू पाया जा सके।
दूसरा, राजकोषीय सुधार किए जाएं, जिसके तहत कर रियायतों और छूट में भारी कमी जरूरी है। इसके साथ-साथ भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में दी जा रही सब्सिडी को छोड़कर बाकी सभी रियायतों को बंद करना भी जरूरी है। इसके अलावा, केंद्र व राज्य सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचों के विकास पर अतिरिक्त खर्च करना चाहिए।
तीसरा सुधार ऊर्जा क्षेत्र में होना चाहिए। इसमें वितरण का काम निजी कंपनियों के हवाले कर देना चाहिए। दिल्ली जैसे राज्य उदाहरण हैं। चौथा, हमें उन नियमों को खत्म कर देना चाहिए, जो लघु व मध्यम उद्योगों के विकास में रोडे़ अटकाते हैं। फैक्टरी ऐक्ट इसका एक उदाहरण है। ऐसा किया जाना इसलिए जरूरी है, ताकि उद्योग व सेवाओं में रोजगार-सृजन हो।
पांचवां, सार्वजनिक उपक्रमों में सुधार जरूरी है। यह काम अब तक कठिन साबित हुआ है। सरकार-संचालित कंपनियों को या तो निजी उद्यमों से उचित स्पद्र्धा करनी चाहिए या फिर उनसे जीतना चाहिए, क्योंकि इनमें करदाताओं का पैसा लगाया जाता है। छठा सुधार कृषि क्षेत्र में होना चाहिए। इसमें मार्केटिंग सिस्टम को ठीक करना जरूरी है, क्योंकि उपभोक्ताओं के भुगतान का उचित हिस्सा किसानों को आज भी नहीं मिल पाता।
ध्यान रखें, हमारे सरकारी संस्थानों, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की गुणवत्ता भी देश के आर्थिक प्रदर्शन को प्रभावित करती है। इसलिए आर्थिक सुधारों के अलावा उच्च विकास के लिए इन संस्थानों को मजबूत करना भी आवश्यक है। हमें सुधारों को एक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए, किसी घटना के रूप में नहीं। और इस प्रक्रिया के प्रभावी होने में एक दशक तक का वक्त भी लग सकता है। चीन, भारत और अन्य देशों का इतिहास यही बताता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) सुदीप्तो मंडल, फेलो, नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च
Make sure you enter all the required information, indicated by an asterisk (*). HTML code is not allowed.
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
