July 24, 2026
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    वह गिड़गिड़ाया, मैं नहीं दौड़ पाऊंगा

    • rounak group

    मेरी कहानी / शौर्यपथ /आराम की जिंदगी का कोई मुकाबला नहीं। बहुत आनंद होता है, जब जिंदगी का एक ढर्रा तय हो जाता है, कोई जोखिम नहीं, रोज घर से फैक्टरी और फैक्टरी से घर। वही काम, वही लोग, वही जिंदगी। सब कुछ तय समय पर अपनी मर्जी से, तो और क्या चाहिए? उस 18 साल के युवा के साथ भी ऐसा ही था। वह बहुत खुश था, लेकिन किस्मत में कुछ और दर्ज था। उसकी वैसी खुशी कुदरत को मंजूर नहीं थी। एक दिन फैक्टरी का खेल कोच फैक्टरी के खुले अहाते में दहाड़ रहा था। कारखाने में काम करने वाले लड़कों को एक प्रतिस्पद्र्धा में भेजने के लिए चुन रहा था। सब लड़कों को देखने के बाद कड़क कोच ने चार लड़कों को चुना। तीन तो खुश थे, लेकिन चौथा गिड़गिड़ा रहा था, ‘सर, मैं दौड़ नहीं पाऊंगा। सर, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे नहीं होगा।’
    कोच ने फटकारा, ‘तुमसे क्यों नहीं होगा?’
    युवा ने नरमी से अपनी दाल गलाने की कोशिश की, ‘सर, मैं कभी नहीं दौड़ता। मुझे याद नहीं, मैं पिछली बार कब दौड़ा था, मेरी जगह किसी और को ले लीजिए। मैं दौड़ नहीं पाऊंगा, तो कंपनी का नाम खराब होगा।’
    कोच कुछ गंभीर हुआ, ‘लेकिन मुझे लगता है, तुम दौड़ सकते हो।’
    अपनी जिंदगी से संतुष्ट युवा सोच रहा था कि कैसे दौड़ने से बचा जाए। खामखा क्यों मुसीबत मोल लें, दौड़ने की जरूरत क्या है? दौड़कर समय और शरीर, दोनों खराब ही होना है। कोच ने कहा, ‘तुम्हें मैंने चुन लिया है। यह सम्मान की बात है। अब चलो, दौड़ो, तुम दौड़ सकते हो और दौड़ना ही है।’
    युवा ने फिर बहाना बनाया, ‘सर, मैं दौड़ नहीं सकता, क्योंकि मैं दौड़ने के लिए फिट नहीं हूं। मुझे छोड़ दीजिए सर, आपको और लड़के मिल जाएंगे।’
    कोच ने समझाया, ‘तुम्हें क्या हुआ है? अच्छे-खासे तो दिख रहे हो। तुम्हारे पास एक धावक का शरीर है।’नई मेहनत, नवाचार से बचने के लिए युवा ने फिर गुहार लगाई, ‘कृपया, मुझे माफ कर दीजिए सर, मैं अनफिट हूं।’
    लेकिन कोच भी अपने फन का पक्का इंसान था, उसे लग रहा था कि उसने कैसे गलत चयन कर लिया। उसने तत्काल कहा, ‘ऐसा करो, तुम अभी जाओ डॉक्टर के पास, वह अगर बोल दे कि तुम अनफिट हो, तो मैं तुम्हारी बात सुन लूंगा।’
    युवा मजबूर हो गया। डॉक्टर ने उसकी जांच करके बताया कि वह दौड़ने के लिए फिट है। जिंदगी में आ गई स्थिरता और आरामतलबी को बचाने के लिए की जा रही उसकी कवायद वहीं ढेर हो गई। कोच के सामने कोई नया बहाना नहीं सूझा। भारी मन लिए भागना पड़ा। ऐसा लगा, जैसे खुद को ही नहीं, दूसरे की जिद और फरमान को भी ढो रहे हैं। अभी भी कोई बहाना चल जाए, तो दौड़ना छोड़ किनारे हो लें। खैर, उस कोच ने दौड़ा ही दिया और बता दिया कि पीछे मुडे़, तो पिछड़ जाओगे। आगे देखने वाला ही अव्वल आता है। तो जैसे-तैसे दौड़ना शुरू हुआ, लेकिन जैसे-जैसे पोर-पोर खुलता गया, वैसे-वैसे भारीपन कम होता चला गया। कहीं खडे़ रहो और हवा तेज चले, तो ही हवा से बात होती है, पर दौड़ पड़ो, तो शांत हवा से भी बात होने लगती है। रगों में ताकत बनती है और जज्बा बढ़ता है। शरीर में ताकत और सांस का एक क्रम है, जब दौड़ना शुरू होता है, तो यह क्रम अपने आप सहज होता जाता है।
    जब असली दौड़ शुरू हुई, तो उस युवा अर्थात एमिल जाटोपेक को एहसास हुआ- वाह, दौड़ना तो लाजवाब है! मेरा तो जन्म ही दौड़ने के लिए हुआ है। मैं अभी तक क्या कर रहा था, 18 की उम्र तक खुद को दौड़ से बचा रहा था? उस स्पद्र्धा में जाटोपेक कुल 100 धावकों के बीच दूसरे स्थान पर आए थे। यह खुद उनके लिए आश्चर्य की बात थी, बिना अनुभव इतने सारे लड़कों को पछाड़ देना, कुछ ही दिन पहले ख्वाब से भी परे था। उस कोच की जिद और उस पहली दौड़ से जाटोपेक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। मात्र चार साल बाद वह लंबी दौड़ के मुकाबलों में अपने देश चेकोस्लोवाकिया की नुमाइंदगी करने लगे।
    1952 ओलंपिक से पहले तो डॉक्टर ने कह दिया था कि तुम फिट नहीं हो, ओलंपिक में भाग मत लो, लेकिन दौड़ने का जुनून ऐसा था कि एमिल जाटोपेक (1922-2000) नहीं माने। उस ओलंपिक में वह 5,000 व 10,000 मीटर दौड़ में स्वर्ण जीत चुके थे। मैराथन दौड़ शुरू होने जा रही थी, किसी ने सुझाव दिया कि बैठे तो हो, इसमें भी दौड़ लो। मैराथन उनका खेल नहीं था, पर जाटोपेक दौड़ गए और पुराना रिकॉर्ड तोड़कर स्वर्ण पाने में कामयाब रहे। तीन स्वर्ण का वह खास रिकॉर्ड आज भी नहीं टूटा है। वह आज रोचक प्रेरणास्रोत हैं। जो इंसान कभी दौड़ना नहीं चाहता था, वह ऐसा दौड़ा कि 18 रिकॉर्ड अपने नाम कर गया।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय एमिल जाटोपेक विश्व प्रसिद्ध धावक

     

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