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May 25, 2026
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पिम्स के चिकित्सकों को मिली बड़ी सफलता, लेजर से ठीक कि प्रीमेच्योर बच्चों की आंखें

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शौर्यपथ / पंजाब इंस्टीच्यूट आफ मेडिकल साइंसिज (पिम्स) के चिकित्सकों ने लेज़र तकनीक से 26 और 28 सप्ताह के प्रीमेच्योर बच्चों की आंखों के आप्रेशन कर पदोर्ं को ठीक करने में सफलता पाई है।
शिशु विशेषज्ञ प्रोफेसर डा. जतिंदर सिंह ने मंगलवार को बताया कि कोरोना काल के दौरान अगस्त महीने में जालंधर और होशियारपुर के दो परिवारों के 28 और 26 हफ्तों के प्रीमेच्योर बच्चों को अत्यंत गंभीर हालात में अथक प्रयास से बचाने में कामयाबी हासिल हुई है। उन्होंने बताया कि अगस्त माह में जालंधर निवासी अंजू के घर 28 सप्ताह की दो प्रीमेच्योर बच्चियों ने जन्म लिया।
जन्म के समय यह बच्चे 68० ग्राम और 89० ग्राम के थे जबकि समान्य नवजात बच्चे का भार ढाई से चार किलो होता है। इसी प्रकार होशियारपुर निवासी रशपाल कौर के घर में भी 26 हफ्तों की एक प्रीमेच्योर बच्ची ने जन्म लिया। जिसका उस समय भार 63० ग्राम था। इस तीनो बच्चों के फेफड़े तक नहीं बने हुए थे। बहुत ही गंभीर हालत में इन तीन बच्चियों को पिम्स के निकू वार्ड में दखिल किया गया।
डॉ सिंह ने बताया कि अंजु की बच्चियों को सांस नहीं ले पाने के कारण नौ दिन तक वेंटलेटर पर रखा गया उसके बाद उसे 5 दिन सीपेप स्पोर्ट पर रखा गया। सात ग्राम खून होने कारण बच्चे बहुत ही कमजोर थे। इन बच्चों को तीन बार खून चढ़ाया गया और काफी समय तक आक्सीजन पर भी रहे। इसके अलावा थायरेड नहीं बन रहा था और बच्चे दूध भी नहीं पचा रहे थे। इसके बाद इस बच्चियों की आंख के पीछे वाला पदार् भी नहीं बन रहा था। लेजर तकनीक के द्वारा इनकी आंख का आप्रेशन किया गया।
इसके अलावा होशियारपुर की रशपाल कौर के घर 18 साल बाद एक प्रीमेच्योर बच्ची ने जन्म लिया। लेकिन जन्म के समय उसकी हालत भी काफी गंभीर थी। बच्ची को पिम्स में इलाज के लिए भतीर् किया गया। निकू में दाखिल करने के बाद इसका भी इलाज शुरू किया गया।
इस बच्ची को एक महीने तक सीपेप स्पोर्ट पर रखा गया। बच्ची को इंफेक्शन काफी ज्यादा थी। इसका भी खून सात ग्राम था। खून नहीं बन रहा था। सांस रुक-रुक कर आ रही थी। डा. जतिंदर ने कहा कि इन तीनो बच्चों का तुरंत इलाज किया गया। इलाज के बाद इन बच्चों के फेफड़े भी बनने शुरु हो गये हैं। तीनों अब पूरे तरह स्वस्थ्य हैं। तीनो को जल्द ही पिम्स से छुट्टी देकर घर भेज दिया जाएगा।

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